Lucknow : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने UP के 5000 स्कूलों के मर्जर पर रोक से इनकार किया, सीतापुर में यथास्थिति का आदेश
सीतापुर जिले के 51 छात्रों ने अपने अभिभावकों के माध्यम से इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनकी याचिका में दावा किया गया कि स्कूलों का मर्जर संवि
UP सरकार द्वारा 50 से कम छात्रों वाले सरकारी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों को बड़े स्कूलों में मिलाने (मर्जर) के फैसले पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया है। हालांकि, कोर्ट ने सीतापुर जिले में 210 स्कूलों में से केवल 14 स्कूलों के लिए मौजूदा स्थिति (यथास्थिति) बनाए रखने का आदेश दिया है। इस मामले की अगली सुनवाई 21 अगस्त 2025 को होगी। यह फैसला शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने और संसाधनों के उपयोग को बढ़ाने के लिए सरकार की नीति को समर्थन देता है, लेकिन सीतापुर में कुछ स्कूलों के लिए विशेष राहत भी प्रदान करता है। 16 जून 2025 को UP बेसिक शिक्षा विभाग ने एक आदेश जारी किया था, जिसमें 50 से कम छात्रों वाले सरकारी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों को पास के बड़े स्कूलों में मिलाने की बात कही गई थी। सरकार का तर्क था कि कई स्कूलों में छात्रों की संख्या बहुत कम है, कुछ में तो कोई छात्र ही नहीं है। उदाहरण के लिए, 58 स्कूलों में कोई छात्र नहीं था, और कई स्कूलों में 15 से कम छात्र थे। इस मर्जर से शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने और शिक्षकों, बुनियादी सुविधाओं, और संसाधनों का बेहतर उपयोग करने का लक्ष्य रखा गया था।
सीतापुर जिले के 51 छात्रों ने अपने अभिभावकों के माध्यम से इस आदेश को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। उनकी याचिका में दावा किया गया कि स्कूलों का मर्जर संविधान के अनुच्छेद 21ए और शिक्षा का अधिकार कानून (RTE) 2009 का उल्लंघन करता है। अनुच्छेद 21ए 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है, और RTE नियमों के अनुसार, 300 की आबादी वाले गांव में एक किलोमीटर के दायरे में स्कूल होना चाहिए। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि मर्जर से बच्चों को स्कूल जाने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ेगी, जिससे खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों की पढ़ाई प्रभावित होगी और ड्रॉपआउट की संभावना बढ़ेगी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में इस मामले की सुनवाई दो चरणों में हुई। पहले, जस्टिस पंकज भाटिया की एकल पीठ ने 3 और 4 जुलाई 2025 को सुनवाई की और 7 जुलाई को याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि मर्जर नीति संविधान के अनुच्छेद 21ए का उल्लंघन नहीं करती, क्योंकि यह शिक्षा के अधिकार को खत्म नहीं करती, बल्कि संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि अनुच्छेद 21ए में यह जरूरी नहीं कि स्कूल हर 300 की आबादी के लिए एक किलोमीटर के दायरे में हो। UP जैसे बड़े राज्य में जमीन और संसाधनों की कमी को देखते हुए, 1-2.5 किलोमीटर की दूरी को उचित माना गया।
याचिकाकर्ताओं ने इस फैसले को चुनौती देते हुए डिवीजन बेंच में अपील की, जिसमें मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और जस्टिस जसप्रीत सिंह शामिल थे। 24 जुलाई 2025 को डिवीजन बेंच ने सुनवाई की और सरकार के मर्जर आदेश पर पूरे राज्य के लिए अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया। हालांकि, कोर्ट ने सीतापुर जिले के 210 स्कूलों में से 14 स्कूलों के लिए यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया, क्योंकि इन स्कूलों के मर्जर में कुछ अनियमितताएं पाई गईं। कोर्ट ने सरकार से इन अनियमितताओं को स्पष्ट करने के लिए जवाब मांगा और अगली सुनवाई के लिए 21 अगस्त 2025 की तारीख तय की।
UP सरकार ने कोर्ट में अपनी नीति का बचाव करते हुए कहा कि मर्जर का उद्देश्य शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर बनाना और संसाधनों का सही उपयोग करना है। सरकार के वकील, अतिरिक्त महाधिवक्ता अनुज कुडेसिया और मुख्य स्थायी अधिवक्ता शैलेंद्र कुमार सिंह ने बताया कि राज्य में 1.40 लाख सरकारी प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूल हैं, जिनमें से 29,000 स्कूलों में 50 से कम छात्र हैं। इन स्कूलों में 89,000 शिक्षक तैनात हैं, लेकिन कम छात्रों के कारण शिक्षकों और संसाधनों का सही उपयोग नहीं हो पा रहा है। सरकार ने यह भी कहा कि मर्जर के बाद बच्चों को बड़े स्कूलों में बेहतर सुविधाएं, जैसे पुस्तकालय, खेल के मैदान, और डिजिटल शिक्षा, मिलेंगी।
सरकार ने यह भी तर्क दिया कि मर्जर का मतलब स्कूल बंद करना नहीं है, बल्कि छोटे स्कूलों को पास के बड़े स्कूलों के साथ जोड़ना (पेयरिंग) है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 भी स्कूलों के समूहीकरण और संसाधनों के बेहतर उपयोग की सिफारिश करती है। सरकार ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि मर्जर के बाद बच्चों को परिवहन सुविधा दी जाएगी और कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित नहीं होगा।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एल.पी. मिश्रा और गौरव मेहरोत्रा ने कोर्ट में दलील दी कि मर्जर से बच्चों को स्कूल जाने के लिए 2-2.5 किलोमीटर तक की दूरी तय करनी पड़ेगी, जो ग्रामीण क्षेत्रों में खासकर लड़कियों के लिए मुश्किल और असुरक्षित है। उन्होंने कहा कि यह नीति शिक्षा का अधिकार कानून और संविधान के अनुच्छेद 21ए का उल्लंघन करती है, क्योंकि यह बच्चों की शिक्षा तक पहुंच को सीमित करती है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि सरकार ने मर्जर से पहले कोई सर्वेक्षण नहीं किया और न ही बच्चों और अभिभावकों की राय ली।
इस मर्जर नीति का शिक्षक संगठनों और विपक्षी दलों, जैसे समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी, ने कड़ा विरोध किया है। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ने कहा कि यह नीति ग्रामीण और गरीब बच्चों, खासकर लड़कियों, की शिक्षा को प्रभावित करेगी और ड्रॉपआउट की दर बढ़ाएगी। उन्होंने इसे शिक्षा के अधिकार को छीनने की साजिश बताया। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी इस नीति की आलोचना की और कहा कि यह ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की पहुंच को कमजोर करेगी।
शिक्षक संगठनों का कहना है कि छोटे स्कूलों की गुणवत्ता बढ़ाने के बजाय, सरकार उन्हें बंद करने की राह चुन रही है। कई शिक्षकों ने चिंता जताई कि मर्जर से उनकी नौकरी पर भी असर पड़ सकता है। सीतापुर में मर्जर के खिलाफ याचिका में कुछ अनियमितताएं सामने आईं, जैसे 50 से अधिक छात्रों वाले स्कूलों को भी मर्जर की सूची में शामिल करना। कोर्ट ने इन अनियमितताओं को गंभीरता से लिया और 14 स्कूलों के लिए यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया। इसका मतलब है कि इन स्कूलों को अगली सुनवाई तक मर्ज नहीं किया जाएगा और वे अपनी पुरानी जगह पर चलते रहेंगे। यह सीतापुर के बच्चों और अभिभावकों के लिए अस्थायी राहत है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने UP सरकार की 5000 स्कूलों के मर्जर की नीति पर अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया है, लेकिन सीतापुर जिले के 14 स्कूलों के लिए यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है।
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