Special on 14th January:  सृष्टि में ऊर्जा का नवसंचार करने वाला पर्व - मकर संक्रांति 

शीत ऋतु के मध्य जब सूर्यदेव  धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं और उनकी उत्तरायण गति प्रारम्भ होती है, तब मकर संक्रांति

By INA News Desk
Jan 14, 2026 - 14:53
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Special on 14th January:  सृष्टि में ऊर्जा का नवसंचार करने वाला पर्व - मकर संक्रांति 
 सृष्टि में ऊर्जा का नवसंचार करने वाला पर्व - मकर संक्रांति 

लेखक- मृत्युंजय दीक्षित 

शीत ऋतु के मध्य जब सूर्यदेव  धनु राशि को छोड़कर मकर राशि में प्रवेश करते हैं और उनकी उत्तरायण गति प्रारम्भ होती है, तब मकर संक्रांति होती है। यह पर्व सृष्टि में उर्जा का नवसंचार करने वाला पर्व है। मकर संक्रांति के दिन जप, तप, दान, स्नान, श्रद्धा, तर्पण आदि धार्मिक विधि विधान व कर्मों का विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन दिया गया दान सौ गुना बढ़कर प्राप्त होता है। इस दिन उड़द, चावल, तिल, गौ, स्वर्ण, ऊनी, वस्त्र, कम्बल आदि दान करने का विशेष महत्व है। । इस दिन गंगा स्नान एवं गंगातट पर दान का विशेष महत्व है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगा सागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गयी है। इस संक्रांति से सूर्य सभी राशियों को प्रभावित करते हैं।

इस पर्व का का सम्बन्ध हमारे पौराणिक इतिहास से भी है। इस दिन भगवान भास्कर अपने पुत्र शनि से मिलने स्वयं उसके घर जाते हैं। महाभारत काल में इसी दिन भीष्म पितामह ने अपनी देह का त्याग किया था। आज ही के दिन गंगाजी भगीरथ के पीछे- पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होती हुई सागर में जाकर मिली थीं। इसी दिन भगवान विष्णु ने असुरों का अंत कर युद्ध समाप्ति की घोषणा की थी और यही कारण है कि इस पर्व को बुराइयों और नकारात्मकता समाप्त करने का पर्व कहा जाता है। 

वैज्ञानिक मान्यता है कि इस दिन से रातें छोटी एवं दिन बड़े होने लगते हैं तथा सूर्य का ताप बढ़ने लगता है। दिन बड़ा होने से प्रकाश का वातावरण अधिक होता है अतः सूर्य की राशि में हुए परिवर्तन को अंधकार से प्रकाश की ओर अग्रसर होना माना गया है। प्रकाश अधिक होने से प्राणियों की चैतन्यता  एवं कार्यशक्ति में वृद्धि होती हैं । 

इस अवसर पर सम्पूर्ण भारत में सूर्य देव की उपासना, आराधना एवं पूजन करने का विधि-विधान है। हरियाणा और पंजाब में यह पर्व लोहड़ी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन अंधेरा होते ही आग जलाकर अग्निदेव की पूजा करते हुए तिल गुड़ चावल और भुने हुए मुक्के की आहुति दी जाती है। इस सामग्री को तिल चौली कहा जाता है। इस दिन पारम्परिक मक्के की रोटी व सरसों के साग का आनंद भी उठाया जाता है। उत्तर प्रदेश में यह पर्व दान का पर्व है। तीर्थराज प्रयाग  में गंगा, यमुना व सरस्वती के संगम पर विशाल मेला लगता है, जिसे माघ मेले के नाम से जाना जाता है। इसी दिन से मांगलिक कार्यों भी आरम्भ हो जाते  है। माघ मेला स्नान पौष पूर्णिमा से  शिवरात्रि तक चलता है।

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले में गोरखनाथ मंदिर में विशाल मेला लगता है जो खिचड़ी मेले के नाम  से प्रसिद्ध है। इस अवसर पर नेपाल के राज परिवार की ओर से गोरक्षनाथ को प्रथम खिचड़ी अर्पित होती है। राज्य की सभी  नदियों के तट पर स्नान तथा  व दान पर्व  होता है। इस दिन दान के उपरांत खिचड़ी खाने एवं खिलाने का बड़ा महत्व है। तमिलनाडु में इस पर्व को पोंगल के रूप में चार दिन तक मनाया जाता है। पोंगल मनाने के लिये स्नान करके खुले आंगन में मिट्टी के बर्तन में खीर बनायी जाती है। जिसे पोंगल कहते हैं। इसके बाद सूर्यदेव को भोग लगाया जाता है। कर्नाटक, केरल व आंध्रप्रदेश में इसे संक्रांति  ही कहते हैं। बिहार में भी इस पर्व को खिचड़ी नाम से ही जाना जाता हैं। महाराष्ट्र में भी यह पर्व बड़े धूमधाम व उमंग के साथ मनाया जाता है यहाँ इस दिन महिलाएं आपस में तिल, गुड़ एवं रोली और हल्दी बांटती है। वहीं बगाल में इस पर्व पर तिल दान करने की प्रथा है। यहां गंगासागर में प्रतिवर्ष विशाल मेला लगता है। असोम में मकर संक्रांति को माघ बिहु अथवा भोगाली बिहू के नाम से मनाया जाता हैं । गुजरात में मकरसंक्रांति पर दान स्नान के साथ साथ पतंग उड़ाने का भी प्रचलन है जिसमें भारी संख्या में देशी और विदेशी पर्यटक तथा बड़ी- बड़ी हस्तियां हिस्सा लेती हैं।

मकर सक्रांति का पर्व पूरे भारत को एक सूत्र में जोड़ने वाला  उत्साह, उमंग और उल्लास का पर्व है। यह समाज को सकारात्मक विचार प्रदान करने वाला पर्व है। सामाजिक एकीकरण का पर्व है। हिन्दुओं की साझी परंपरा का पर्व है।
हमें इस आध्यात्मिक उर्जा से भरे पर्व की राष्ट्रीय सार्थकता  को समझते हुए इसके मूल स्वरूप को बचाए रखने का प्रण लेकर इसे उपभोक्तावाद से संरक्षित करना होगा। 

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