Saharanpur : अल्लाह के अलावा किसी को पूजनीय नहीं मानते, मर जाना कबूल है लेकिन... वंदे मातरम गाना मजबूरी नहीं- मौलाना अरशद मदनी

मदनी ने कहा कि वंदे मातरम का अनुवाद शिर्क से जुड़ी मान्यताओं पर टिका है। इसके चार छंदों में देश को देवता की तरह देखा गया है, दुर्गा माता से तुलना की गई है और पूजा के

Dec 11, 2025 - 21:43
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Saharanpur : अल्लाह के अलावा किसी को पूजनीय नहीं मानते, मर जाना कबूल है लेकिन... वंदे मातरम गाना मजबूरी नहीं- मौलाना अरशद मदनी
Saharanpur : अल्लाह के अलावा किसी को पूजनीय नहीं मानते, मर जाना कबूल है लेकिन... वंदे मातरम गाना मजबूरी नहीं- मौलाना अरशद मदनी

देवबंद। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने वंदे मातरम पर स्पष्ट रुख अपनाते हुए कहा कि किसी के इसे पढ़ने या गाने पर कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन मुसलमान केवल एक अल्लाह की इबादत करता है और अपनी इबादत में अल्लाह के सिवा किसी और को शामिल नहीं कर सकता।

मदनी ने कहा कि वंदे मातरम का अनुवाद शिर्क से जुड़ी मान्यताओं पर टिका है। इसके चार छंदों में देश को देवता की तरह देखा गया है, दुर्गा माता से तुलना की गई है और पूजा के शब्दों का इस्तेमाल हुआ है। इसका मतलब है 'मां, मैं तेरी पूजा करता हूं'। यह किसी भी मुसलमान की धार्मिक आस्था के विरुद्ध है। इसलिए किसी को अपनी आस्था के खिलाफ कोई नारा या गीत गाने को मजबूर नहीं किया जा सकता।

उन्होंने संविधान का हवाला देते हुए कहा कि भारत का संविधान हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता (अनुच्छेद 25) और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19) प्रदान करता है। वतन से प्यार अलग बात है, उसकी पूजा करना अलग। मुसलमानों की देशभक्ति पर कोई प्रमाण-पत्र जरूरी नहीं, क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम में उनकी बलिदान इतिहास में दर्ज हैं।

मदनी ने जोर देकर कहा कि हम एक अल्लाह को मानते हैं, अल्लाह के अलावा किसी को पूजनीय नहीं मानते और न ही किसी के आगे झुकते हैं। मर जाना कबूल है, लेकिन शिर्क कभी कबूल नहीं।

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