शशि थरूर मानहानि केस- सुप्रीम कोर्ट ने कहा, नेताओं और जजों की चमड़ी मोटी होनी चाहिए।
New Delhi News: कांग्रेस सांसद शशि थरूर के खिलाफ 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में दिए गए एक बयान को लेकर चल रहे...
New Delhi News: कांग्रेस सांसद शशि थरूर के खिलाफ 2018 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में दिए गए एक बयान को लेकर चल रहे मानहानि मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 1 अगस्त 2025 को महत्वपूर्ण टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि नेताओं, प्रशासकों और जजों को मोटी चमड़ी का होना चाहिए और ऐसे बयानों को लेकर ज्यादा संवेदनशील नहीं होना चाहिए। यह मामला थरूर के उस बयान से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने एक आरएसएस नेता के हवाले से कहा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तुलना "शिवलिंग पर बैठे बिच्छू" से की गई थी। इस बयान पर बीजेपी नेता राजीव बब्बर ने मानहानि का मुकदमा दायर किया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को खत्म करने का सुझाव देते हुए सुनवाई को स्थगित कर दिया और निचली अदालत की कार्यवाही पर लगी रोक को बरकरार रखा।
यह विवाद अक्टूबर 2018 में शुरू हुआ, जब शशि थरूर ने बेंगलुरु लिटरेचर फेस्टिवल में अपनी किताब द पैराडॉक्सिकल प्राइम मिनिस्टर: नरेंद्र मोदी एंड हिज इंडिया पर चर्चा के दौरान एक बयान दिया। उन्होंने कहा कि एक अनाम आरएसएस नेता ने 2012 में कारवां पत्रिका के एक लेख में नरेंद्र मोदी की तुलना "शिवलिंग पर बैठे बिच्छू" से की थी, जिसे उन्होंने "अत्यंत प्रभावशाली रूपक" बताया। थरूर ने इस बयान को दोहराते हुए कहा कि यह उपमा मोदी की अपराजेयता को दर्शाती है, क्योंकि "न तो इसे हाथ से हटाया जा सकता है और न ही चप्पल से मारा जा सकता है।"
इस बयान पर बीजेपी नेता राजीव बब्बर ने आपत्ति जताई। उन्होंने दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में थरूर के खिलाफ आपराधिक मानहानि की शिकायत दर्ज की, जिसमें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 499 और 500 (मानहानि) के तहत कार्रवाई की मांग की गई। बब्बर ने दावा किया कि थरूर का बयान न केवल प्रधानमंत्री की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला था, बल्कि यह भगवान शिव के प्रति उनकी धार्मिक भावनाओं का भी अपमान करता है। उन्होंने कहा, "मैं भगवान शिव का भक्त हूं, और थरूर के बयान ने देश-विदेश के करोड़ों शिवभक्तों की भावनाओं को ठेस पहुंचाई।"
27 अप्रैल 2019 को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने थरूर को इस मामले में आरोपी के रूप में समन जारी किया। थरूर ने इस आदेश को चुनौती देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की, जिसमें मानहानि की कार्यवाही को रद्द करने की मांग की गई। 29 अगस्त 2023 को दिल्ली हाई कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी और कहा कि प्रथम दृष्टया थरूर का बयान "घृणित और निंदनीय" है, और यह प्रधानमंत्री व आरएसएस की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाला है। हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि निचली अदालत के समक्ष कार्यवाही को रद्द करने का कोई आधार नहीं है।
हाई कोर्ट के फैसले के बाद थरूर ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। 10 सितंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए निचली अदालत की कार्यवाही पर अंतरिम रोक लगा दी और दिल्ली पुलिस व शिकायतकर्ता राजीव बब्बर को नोटिस जारी कर जवाब मांगा।
- सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई
1 अगस्त 2025 को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस एम. एम. सुंदरेश और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। कोर्ट ने शिकायतकर्ता राजीव बब्बर के वकील से सवाल किया, "आप इतने संवेदनशील क्यों हैं?" पीठ ने कहा, "नेता, प्रशासक और जज एक ही समूह में आते हैं, और इनकी चमड़ी मोटी होती है। इन चीजों को लेकर इतना भावुक होने की क्या जरूरत है? चलिए, इस मामले को खत्म करते हैं।"
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि सार्वजनिक जीवन में रहने वाले लोगों को ऐसे बयानों को दिल पर नहीं लेना चाहिए। जस्टिस सुंदरेश ने कहा, "यह एक रूपक है, जो उस व्यक्ति की अपराजेयता को दर्शाता है। मुझे नहीं पता कि इस पर किसी ने आपत्ति क्यों की।" कोर्ट ने यह संकेत दिया कि यह मामला ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दों से कम प्राथमिकता वाला है और इसे बंद कर देना चाहिए। हालांकि, शिकायतकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता पिंकी आनंद ने कहा कि मामले की सुनवाई होनी चाहिए। इस पर कोर्ट ने सुनवाई को 15 सितंबर 2025 के लिए स्थगित कर दिया और अंतरिम रोक को बरकरार रखा।
- थरूर का पक्ष
थरूर ने अपनी याचिका में दलील दी कि उनका बयान मानहानिकारक नहीं था, क्योंकि यह उनका मूल कथन नहीं था। उन्होंने कहा कि यह बयान गोवर्धन झड़फिया नामक एक आरएसएस नेता का था, जिसे 2012 में कारवां पत्रिका में प्रकाशित एक लेख में उद्धृत किया गया था। थरूर के वकील अभिषेक जेबराज ने तर्क दिया कि यह बयान सद्भावना में दिया गया था और यह मानहानि कानून के छूट वाले खंड के तहत संरक्षित है। उन्होंने यह भी कहा कि न तो शिकायतकर्ता और न ही बीजेपी के अन्य सदस्यों को इस मामले में पीड़ित पक्ष माना जा सकता है।
थरूर ने यह भी दावा किया कि उनका बयान प्रधानमंत्री की छवि को नुकसान पहुंचाने के इरादे से नहीं दिया गया था, बल्कि यह एक पत्रिका के लेख का हवाला मात्र था। उन्होंने कहा कि इस उपमा को बाद में एक न्यूज चैनल पर भी दोहराया गया था, और 2012 में इसे मानहानिकारक नहीं माना गया था।
- बीजेपी और शिकायतकर्ता का पक्ष
बीजेपी नेता राजीव बब्बर ने अपनी शिकायत में कहा कि थरूर का बयान न केवल प्रधानमंत्री की छवि को नुकसान पहुंचाने वाला था, बल्कि यह धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला भी था। उन्होंने दावा किया कि "शिवलिंग पर बैठे बिच्छू" की उपमा भगवान शिव और उनके भक्तों का अपमान करती है। बब्बर ने कहा कि इस बयान ने देश-विदेश के शिवभक्तों की भावनाओं को आहत किया।
इस मामले ने 2018 में खूब सुर्खियां बटोरी थीं। बीजेपी नेताओं ने थरूर के बयान की कड़ी निंदा की थी। केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से माफी मांगने की मांग की थी। वहीं, थरूर ने सफाई देते हुए कहा था कि उन्होंने स्वयं यह बयान नहीं दिया, बल्कि एक पत्रिका के लेख का जिक्र किया था। इस मामले ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक भावनाओं के बीच संतुलन को लेकर बहस छेड़ दी थी।
हाल के समय में थरूर ने प्रधानमंत्री मोदी की कुछ नीतियों की तारीफ भी की है, खासकर पहलगाम हमले के बाद उनके कदमों की। इससे कुछ बीजेपी नेताओं ने थरूर की आलोचना की, जबकि उनकी पार्टी के कुछ नेताओं ने उन्हें पार्टी लाइन का पालन करने की नसीहत दी।
- सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कि "नेताओं और जजों की चमड़ी मोटी होनी चाहिए" न केवल इस मामले के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, बल्कि यह सार्वजनिक जीवन में आलोचना और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के व्यापक मुद्दे को भी रेखांकित करती है। कोर्ट ने यह संदेश दिया कि सार्वजनिक हस्तियों को आलोचना को सहन करने की क्षमता विकसित करनी चाहिए, और छोटे-मोटे बयानों को लेकर कानूनी कार्रवाई करने से बचना चाहिए। यह टिप्पणी हाल के वर्षों में बढ़ते मानहानि मामलों के संदर्भ में भी प्रासंगिक है, जहां राजनेता और सार्वजनिक हस्तियां एक-दूसरे के खिलाफ अदालतों का सहारा ले रही हैं।
शशि थरूर के खिलाफ मानहानि का यह मामला सात साल बाद भी चर्चा में है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को खत्म करने का सुझाव देकर यह संकेत दिया है कि छोटे-मोटे बयानों को लेकर लंबी कानूनी लड़ाई अनावश्यक है। कोर्ट की "मोटी चमड़ी" वाली टिप्पणी न केवल इस मामले को हल्के-फुल्के अंदाज में देखने की सलाह देती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि सार्वजनिक जीवन में आलोचना और बहस का सामना करना सामान्य है। अगली सुनवाई 15 सितंबर 2025 को होगी, और तब तक निचली अदालत की कार्यवाही पर रोक बरकरार रहेगी। यह मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक भावनाओं और कानूनी प्रक्रिया के बीच संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है।
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