Sitapur : आस्था की जीत और ब्रिटिश हुकूमत की चुनौती की मिसाल है खैराबाद का चराइन परिक्रमा मेला

रामदयाल ने जब यह बात अपने साथियों को बताई, तो सात परिवारों ने मिलकर देवी मां की इच्छा पूरी करने का फैसला किया। वैशाख महीने के पहले शनिवार को इसकी योजना बनी और अगले दिन रविवार को सभी लोग

Apr 6, 2026 - 22:15
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Sitapur : आस्था की जीत और ब्रिटिश हुकूमत की चुनौती की मिसाल है खैराबाद का चराइन परिक्रमा मेला
Sitapur : आस्था की जीत और ब्रिटिश हुकूमत की चुनौती की मिसाल है खैराबाद का चराइन परिक्रमा मेला

Report :  संदीप चौरसिया INA NEWS सीतापुर।

सीतापुर के खैराबाद कस्बे में आयोजित होने वाला तीन दिवसीय चराइन परिक्रमा मेला केवल भक्ति का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह उस ऐतिहासिक साहस की याद दिलाता है जब लोगों की श्रद्धा ने अंग्रेजी शासन के कड़े नियमों को भी नहीं माना था। करीब डेढ़ सदी पुरानी इस परंपरा की कहानी बेहद दिलचस्प है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, खैराबाद के रहने वाले रामदयाल को सपने में देवी मां ने दर्शन दिए और अपनी परेशानी बताई। देवी ने कहा कि शीतलन तालाब के पास बने मंदिर के पास गंदगी और पशु वध होने के कारण वह जगह अशुद्ध हो गई है, इसलिए उन्हें वहां से ले जाकर भुइंया ताली तीर्थ में स्थापित किया जाए।रामदयाल ने जब यह बात अपने साथियों को बताई, तो सात परिवारों ने मिलकर देवी मां की इच्छा पूरी करने का फैसला किया। वैशाख महीने के पहले शनिवार को इसकी योजना बनी और अगले दिन रविवार को सभी लोग शीतलन तालाब मंदिर पहुंचे। कहा जाता है कि सात बार परिक्रमा और प्रार्थना करने के बाद देवी की प्रतिमा उनके हाथों में आ गई। जब ब्रिटिश पुलिस को इसकी खबर लगी तो उन्होंने मूर्ति ले जाने से रोकने की कोशिश की, लेकिन श्रद्धालु डरे नहीं। वे पुलिस से बचते हुए बागों और खेतों के रास्ते करीब पांच किलोमीटर दूर सरायन नदी पहुंचे, जहां प्रतिमा को स्नान कराया गया। इसके बाद सोमवार को गुप्त रूप से भुइंया ताली तीर्थ पहुंचकर देवी की स्थापना की गई।

इस घटना की याद में आज भी हर साल चराइन परिक्रमा मेला लगता है। पहले दिन श्रद्धालु भुइंया ताली तीर्थ पर जुटते हैं, दूसरे दिन पुराने मंदिर की परिक्रमा होती है और तीसरे दिन मुख्य पूजा के साथ मेले का समापन होता है। लोग उसी रास्ते से प्रभात फेरी निकालते हैं जिससे होकर प्रतिमा ले जाई गई थी। रास्ते में जगह-जगह भंडारे आयोजित किए जाते हैं। आज भी भुइंया ताली तीर्थ, शीतलन तालाब और सरायन नदी इस कथा के गवाह के रूप में मौजूद हैं। हालांकि इस घटना का कोई पुराना कागजी रिकॉर्ड नहीं है, लेकिन स्थानीय लोग पीढ़ी दर पीढ़ी इस कहानी को कहते और सुनते आ रहे हैं, जो उनकी गहरी आस्था को दर्शाता है।

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