Special Article: अमेरिका की दादागिरी के माएने। 

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प नोबेल शांति पुरस्कार पाने के लालायित थे और  बार- बार अपनी यह इच्छा सार्वजनिक कर रहे थे। इसके लिए उन्होंने विश्व के तमाम

Jan 12, 2026 - 21:53
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Special Article: अमेरिका की दादागिरी के माएने। 
विशेष लेख: अमेरिका की दादागिरी के माएने। 

लेखक: मृत्युंजय दीक्षित 

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प नोबेल शांति पुरस्कार पाने के लालायित थे और  बार- बार अपनी यह इच्छा सार्वजनिक कर रहे थे। इसके लिए उन्होंने विश्व के तमाम संघर्षों के विराम का श्रेय लेने का प्रयास किया, रूस -यूक्रेन युद्ध समाप्त करवाने का प्रयास करते दिखे किन्तु नोबेल नहीं मिला।अब ट्रम्प इसकी खीझ विश्व  के तमाम देशों पर उतार रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति का विभिन्न देशों के शासनाध्यक्षों के प्रति व्यवहार और दिए गए वक्तव्य अत्यंत हैरान करने वाले हैं। अमेरिका की दादागिरी वाली हरकतों से पूरे विश्व में उथल -पुथल होनी स्वाभाविक है। वेनेजुएला पर हमला कर वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरै और उनकी पत्नी का अपहरण कर, अमेरिका लाकर वहां की  अदालत में  पेश करना नैतिक मापदंडों के पूर्णतया विरुद्ध है। 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एशिया, यूरोप और लैटिन अमेरिकी देशों को धमका रहे हैं। उन्होंने  कहा है कि अगर कोलंबिया, मैक्सिको, क्यूबा तथा ईरान ने रवैया न सुधारा तो कार्रवाई करेंगे, ग्रीनलैंड अमेरिका को अपने लिए चाहिए। यह भी समाचार आ रहे हैं कि वेनेजुएला के समुद्र से जो रूसी जहाज तेल लेकर आ रहे हैं उन पर अमेरिकी सेनाएं कब्जा कर रही हैं जिसके कारण क्षेत्र में व्याप्त  तनाव गहरा गया है। सैन्यशक्ति के मद में चूर ट्रम्प शासनाध्यक्षों का मजाक उड़ा रहे हैं। ट्रम्प ने अपने फ्रांसीसी समकक्ष इमैनुअल मैक्रो का मजाक उड़ाते  हुए कहा कि वह (मैक्रॉन)  अधिक टैरिफ लगाने की बात पर गिड़गिड़ाने लगे थे। भारत -अमेरिका रक्षा सहयोग के विषय में बड़ा झूठ बोलते हुए कहा कि भारत द्वारा 68 अपाचे हेलीकाप्टर  की खरीद में पांच साल की देरी हुई। उनका कहना था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुझे फोन पर कहा सर क्या मैं आपसे मिल सकता हूं ? स्पष्ट है कि अमेरिका एक राष्ट्र की तरह नहीं वरन अपने आपको विश्व का मालिक और सबसे बड़ा  व्यापारी तथा दूसरे देशों को अपना पिछलग्गू समझ रहा है। 

इस घटनाक्रम में एक बड़ी बात यह दिख रही है कि अमेरिका के धुर विरोधी व विस्तारवादी प्रवृत्ति वाले चीन और रूस जैसे देश केवल अमेरिका की निंदा करने तक ही सीमित हो गए हैं या फिर यह भी कहा जा सकता है कि अमेरिकी विरोधी गुट के नेता अभी बहुत सावधानी व सतर्कता बरत रहे हैं ताकि तृतीय विश्वयुद्ध न छिड़ जाए। आज अमेरिका जिस मानसिकता से वैश्विक जगत को धमका रहा है उसी मानसिकता से उसने हिरोशिमा और नागासकी पर परमाणु बम गिरा दिए थे। आज वह विश्व को टैरिफ वार के सहारे अपने चरणों में गिराना चाहता है।  
अमेरिका की हरकतों से विश्व अचंभित है। उसने रूस के साथ मित्रता रखने वाले ब्रिक्स देशों पर 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी है जिसके कारण भारत सहित विश्व के कई देशों का शेयर बाजार टूट रहा है । ट्रम्प ने सैक्शनिंग रशिया एक्ट ऑफ- 2025 के मंजूरी दी है जो रूस से पेट्रोलियम उत्पादों का आयात करने वाले देशों पर भारी -भरकम  टैरिफ लगाने की अनुमति देता है। यह टैरिफ उन देशों  पर लगाए जाएंगे जो रूस से यूरेनियम और पेट्रोलियम उत्पादों के आदान -प्रदान में जानबूझकर शामिल होते हैं। यह बिल भारत और चीन जैसे देशों से आयातित  सामानों पर कम से कम 500 प्रतिशत टैरिफ लगाने की अनुमति देता है। 

अमेरिका यह बिल रूसी सरकार व उनके मित्र राष्ट्रों को दंडित करने के उद्देश्य से लाया है क्योंकि रूस ने यूक्रेन के साथ शांति समझौता करने से इंकार कर दिया है। अमेरिका भारत के खिलाफ  टैरिफ लगाने की जो धमकी दे रहा है उसके पीछे का प्रमुख कारण भारत का तीव्रता के साथ आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर होना है। अमेरिका ने जब भारत पर 50 प्रतिशत टैरिफ लगाया तब भी भारत की अर्थव्यवस्था व ग्रोथ पर कोई बहुत बड़ा असर नहीं हो पाया। अमेरिकी सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने पांच सौ  प्रतिशत टैरिफ वाला बिल ट्रम्प के साथ मिलकर तैयार किया है। ग्राहम का कहना है कि यह बिल उन देशो को दंडित करेगा जो सस्ता रूसी तेल खरीदकर पुतिन को ईंधन दे रहे हैं। इसमें विशेष रूप से चीन, ब्राजील और भारत को निशना बनाया गया है यह सभी देश रूसी तेल के बड़े आयातक हैं। 

विश्लेषकों  का कहना है कि रूस -यूक्रेन युद्ध तो एक बहाना भर है दरअसल अमेरिका को भारत की आर्थिक उन्नति पसंद नहीं आ रही है। आज पूरा विश्व भारत की मजबूत होती अर्थव्यवस्था को देखकर हैरान है। विश्वभर के निवेशक भारत में  निवेश करना चाहते हैं । ऐसा प्रतीत हो रहा है कि ट्रम्प की यह नीति भारत की इस सफलता को कुंद करने की कोशिश है। जारी अनुमानों के अनुसार वित्तीय वर्ष 2025- 26 में भारत की जीडीपी ग्रोथ 7.4 प्रतिशत रहने की संभावना है, यह विगत वर्ष की 6.5 प्रतिशत ग्रोथ से अधिक है।  प्रमुख आर्थिक समाचार पत्रों के अनुसार भारत यह उपलब्धि वैश्विक चुनैतियों जैसे अमेरिकी टैरिफ और मुदा्रस्फीति के बावजूद प्राप्त कर रहा है। यह ग्रोथ भारत को एशिया में ही नहीं वैश्विक जगत में भी मजबूती प्रदान कर रही है। 

ट्रम्प की नीतियों  को सरसरी तौर पर देखा जाए तो यह रूस -यूक्रेन युद्ध से जुड़ी लग सकती हैं किन्तु गंभीरता से देखने पर पता चलता है कि यह भारत की आर्थिक स्वतंत्रता पर हमला है। ट्रम्प ने चुनाव अभियान में भारत  को टैरिफ किंग कहा था और दावा किया था भारत अमेरिका से अधिक टैरिफ वसूलता है।अब रूस से तेल खरीद को बहाना बनाकर ट्रम्प भारत पर दबाव बना रहे हैं लेकिन यदि भारत ने रूस से तेल खरीद कम कर ली है तो फिर धमकी क्यों दी जा रही है ? ट्रम्प की नीति भारत को कमजोर करने की लग रही है। अमेरिका की अर्थव्यवस्था में मुद्रस्फीति और बेरोजगारी है,अमेरिका में महंगाई चरम सीमा पर है। कुछ दिन पूर्व ही वहां  सबसे बड़ा शटडाउन हो चुका है। अमेरिका में नया निवेश आ नहीं रहा है  जबकि भारत में निवेश बढ़ रहा है। एफडीआई में वृद्धि और अब उसमें विदेशी निवेश शत प्रतिशत कर दिया गया है। भारत का स्टॉक मार्केट नई ऊँचाई  की ओर जा रहा। 

यहां पर यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि अमेरिका जिन देशों को धमका रहा है उन सभी देशों का विकास व जन्म अमेरिका के ही कारण हुआ है। अमेरिका जिन देशों को धमका रहा है वह परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र नहीं है। वेनेजुएला जैसे देशो की सत्ताएं भ्रष्टाचार व आर्थिक अव्यवस्था का अड्डा बन चुकी हैं । अमेरिकी राष्ट्रपति जिन देशों  को धमका रहे हैं उन सभी देशों के शासनाध्यक्षों ड्रग्स तस्करी का आरोप  लगा रहे हैं। अगर भारत  परमाणु  शक्ति संपन्न राष्ट्र न होता और उसके पास अपनी ब्रहमोस, पिनाका और प्रलय तथा अग्नि जैसी मारक मिसाइलें न होती तब आज विश्व में भारत की क्या स्थिति होती?

आज भारत आर्थिक और सामरिक रूप से सशक्त और समृद्ध है साथ ही उसके पास नरेंद्र मोदी जैसा वैश्विक पकड़ वाला नेतृत्व है। आज का भारत अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की धमकियों से डरने और झुकने वाला नहीं है। अगर भारत ने आँखें फेर लीं  तो अमेरिका को भी भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है । अमेरिका दादागिरी  दिखा रहा है जबकि भारत, “वसुधैव कुटुम्बकम” की राह अपनाकर चल रहा है । अमेरिकी दादागिरी कुछ समय के लिए तो विश्व को उसके पक्ष में ला सकती है किंतु विश्व के समक्ष अंतिम विकल्प भारत का “वसुधैव कुटुम्बकम” का भाव ही होगा ।  

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