छंदमुक्त : नारी ढूंढ ही लेती है निराशाओं के बीच  एक आशा की डोर....

एक पल जीती ..फिर टूटती अगले ही पल, हताश ....

Oct 14, 2024 - 14:23
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छंदमुक्त : नारी ढूंढ ही लेती है निराशाओं के बीच  एक आशा की डोर....

   अमिता मिश्रा "मीतू"
उपन्यासकार,साहित्यकार

छंदमुक्त 

 नारी
ढूंढ ही लेती है
निराशाओं के बीच 
एक आशा की डोर
थामे टिमटिमाती लौ आस की
बीता देती है जीवन के अनमोल पल
एक धुंधले सुकून की तलाश में
एक पल जीती ..फिर टूटती अगले ही पल
हताश निराश खोजती स्वयं को अपनों के बीच
बिखरती संवारती खुद को अपनों को
पुनः लड़खड़ाती चल पड़ती है थामे एक नई राह
बीता देती है ऐसे ही एक पूरा अध्याय ..
जिंदगी की खोज में ...
जिंदगी बीत जाने तक
स्त्री करती है सृजन स्वयं के अंश से
खुद को निचोड़ कर
बसाती घर संसार स्वयं को निचोड़ कर
करती खोखला निज अस्तित्व
एक झूठे स्वप्नलोक के संग
नारी देती नवजीवन ... बरसाती नेह
खुद के सूख जाने तक
निकाल कर रख देती है कलेजा
धड़कनों के थमने तक
पल पल सहती अपमान पोंछती आंसू
दबाए सिसकियां चलती रहती है सांस रुकने तक
निस्वार्थ करती प्रेम चाहत निश्छल प्रेम की
हृदय में बसाए  सुखद अहसास अपनों के 
जीकर भी मरती है मरकर भी जीती है।

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