बिहार चुनाव से पहले बीजेपी को बड़ा झटका- अररिया के चार बार विधायक जनार्दन यादव ने थामा जन सुराज का दामन

जनार्दन यादव बिहार के अररिया जिले के नारपतगंज विधानसभा क्षेत्र से चार बार विधायक रह चुके हैं। उनका राजनीतिक सफर 1990 के दशक से शुरू हुआ। पहली बार 1995 में वे ज

Oct 2, 2025 - 11:29
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बिहार चुनाव से पहले बीजेपी को बड़ा झटका- अररिया के चार बार विधायक जनार्दन यादव ने थामा जन सुराज का दामन
बिहार चुनाव से पहले बीजेपी को बड़ा झटका- अररिया के चार बार विधायक जनार्दन यादव ने थामा जन सुराज का दामन

दो अक्टूबर 2025 को बिहार की राजनीति में एक और बड़ा उलटफेर देखने को मिला। अररिया जिले के वरिष्ठ भाजपा नेता और चार बार के विधायक जनार्दन यादव ने भारतीय जनता पार्टी का साथ छोड़ दिया। उन्होंने प्रशांत किशोर के नेतृत्व वाली जन सुराज पार्टी का दामन थाम लिया। प्रशांत किशोर ने पटना में एक सादे समारोह में उन्हें औपचारिक रूप से पार्टी की सदस्यता दिलाई। यह घटना बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले आई है, जहां जन सुराज सभी 243 सीटों पर लड़ने की तैयारी में है। जनार्दन यादव की नारपतगंज विधानसभा सीट भाजपा का गढ़ रही है, लेकिन अब यह जन सुराज के लिए महत्वपूर्ण बन गई है। यादव के इस फैसले से सीमांचल क्षेत्र की राजनीति में हलचल मच गई है। विपक्षी दल इसे भाजपा के लिए झटका बता रहे हैं, जबकि जन सुराज इसे अपनी मजबूती का प्रमाण मान रही है। आइए इस घटना की पूरी पृष्ठभूमि, जनार्दन यादव के राजनीतिक सफर और बिहार की बदलती राजनीति को विस्तार से समझें।

जनार्दन यादव बिहार के अररिया जिले के नारपतगंज विधानसभा क्षेत्र से चार बार विधायक रह चुके हैं। उनका राजनीतिक सफर 1990 के दशक से शुरू हुआ। पहली बार 1995 में वे जनता दल से विधायक बने। उसके बाद 2000 में भी जनता दल से जीते। 2010 में भाजपा के टिकट पर जीत हासिल की। 2015 में फिर भाजपा से विधायक बने। वे यादव समुदाय से आते हैं, जो बिहार में एक प्रमुख पिछड़ा वर्ग है। नारपतगंज सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है, लेकिन यादव समुदाय का यहां अच्छा प्रभाव है। जनार्दन यादव ने हमेशा स्थानीय मुद्दों जैसे सड़क, बिजली और सिंचाई पर जोर दिया। वे अररिया जिले के विकास के लिए कई योजनाओं का श्रेय लेते रहे। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से भाजपा में उनकी असंतोष बढ़ रहा था। पार्टी नेतृत्व से टिकट न मिलने और संगठन में हाशिए पर धकेले जाने की शिकायतें थीं। स्रोतों के अनुसार, 2020 के चुनाव में उन्हें टिकट नहीं मिला, जिससे वे नाराज हो गए। उसके बाद वे चुपचाप जन सुराज अभियान से जुड़ गए।

प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी बिहार की राजनीति में नया विकल्प बनकर उभरी है। किशोर ने 2022 में जन सुराज पादयात्रा शुरू की, जो 2024 में औपचारिक पार्टी बनी। इसका लक्ष्य बिहार को जाति-धर्म की राजनीति से ऊपर उठाकर विकास पर केंद्रित करना है। किशोर ने कहा है कि वे नितीश कुमार की जदयू और लालू प्रसाद की आरजेडी दोनों की वैकल्पिक ताकत बनेंगे। जन सुराज ने 2024 के उपचुनावों में चार सीटों पर लड़ी, लेकिन हार गई। फिर भी, पार्टी ने युवाओं और प्रवासी मजदूरों को लक्षित किया। जनार्दन यादव का शामिल होना जन सुराज के लिए सीमांचल में मजबूती लाएगा। अररिया, पूर्णिया और किशनगंज जैसे जिलों में मुस्लिम और यादव वोट बैंक महत्वपूर्ण है। किशोर ने यादव को सदस्यता देते हुए कहा कि वे अनुभवी नेता हैं, जो पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूत करेंगे। यह शामिल होना पटना के बापू भवन में हुआ, जहां किशोर ने खुद स्वागत किया।

बिहार की राजनीति हमेशा से जाति और गठबंधनों पर टिकी रही है। भाजपा-जदयू की एनडीए सरकार सत्ता में है, लेकिन महागठबंधन यानी आरजेडी-कांग्रेस गठजोड़ मजबूत विपक्ष है। जन सुराज तीसरा विकल्प बनने की कोशिश कर रही है। पिछले महीनों में जन सुराज ने कई बड़े नाम जोड़े हैं। मई 2025 में पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह शामिल हुए। जुलाई में यूट्यूबर मनीष कश्यप ने भाजपा छोड़कर जन सुराज जॉइन की। मई में ही पूर्णिया के पूर्व सांसद उदय सिंह को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया। चंद्रशेखर सिंह बबन जैसे नेता भी आए। ये सभी हाशिए पर पड़े नेता हैं, जो जन सुराज को मजबूत बना रहे हैं। किशोर ने कहा है कि पार्टी बिहार के बदलाव के लिए है। शिक्षा, रोजगार और बुजुर्गों की सुरक्षा पर फोकस है। वे प्रवासी बिहारियों को वापस लाने का वादा कर रहे हैं।

जनार्दन यादव के फैसले से भाजपा को सीमांचल में चुनौती मिली है। नारपतगंज सीट पर भाजपा का दबदबा था, लेकिन अब जन सुराज मजबूत दावेदार बन सकती है। स्रोतों के अनुसार, अजय झा जैसे अन्य नेता भी भाजपा से नाराज हैं। अमित शाह का हालिया दौरा इसी क्षेत्र पर केंद्रित था। राहुल गांधी, तेजस्वी यादव और असदुद्दीन ओवैसी के दौरे से माहौल गरम है। ओवैसी की एआईएमआईएम सीमांचल में मुस्लिम वोट काट सकती है। जन सुराज का आगमन इसे और दिलचस्प बना रहा है। भाजपा नेता ने कहा कि यादव का जाना व्यक्तिगत फैसला है, पार्टी मजबूत है। लेकिन आंतरिक स्रोत बताते हैं कि यह झटका है। यादव समुदाय में भाजपा की पकड़ कमजोर हो सकती है।

प्रशांत किशोर का राजनीतिक सफर रोचक रहा है। वे 2014 में भाजपा के लिए रणनीतिकार बने। 2015 में बिहार में महागठबंधन को जिताया। उसके बाद पश्चिम बंगाल में तृणमूल को मदद की। 2022 से बिहार पर फोकस किया। उनकी पादयात्रा ने लाखों लोगों को जोड़ा। जन सुराज ने कहा है कि वे किसी गठबंधन में नहीं जाएंगे। सभी सीटों पर लड़ेंगे। किशोर ने नितीश को निशाना बनाया, कहा कि उनकी सरकार ब्यूरोक्रेट्स का जंगल राज है। आरजेडी को भी पुरानी राजनीति बताया। जन सुराज युवाओं को आकर्षित कर रही है। सोशल मीडिया पर सक्रिय है। लेकिन चुनौतियां भी हैं। आरजेडी ने किशोर को भाजपा का बी-टीम कहा। मनीष कश्यप पर हमला बोला। जन सुराज ने जवाब दिया कि वे सच्चे मुद्दों पर हैं।

यह घटना बिहार चुनाव 2025 को त्रिकोणीय बना रही है। एनडीए, महागठबंधन और जन सुराज। किशोर का दावा है कि वे सबसे लोकप्रिय मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार हैं। सर्वे में उनकी लोकप्रियता नितीश से ज्यादा बताई गई। लेकिन बिहार की जाति राजनीति जटिल है। यादव, कुशवाहा, कोइरी जैसे वोट बैंक निर्णायक हैं। जनार्दन यादव का अनुभव जन सुराज को फायदा देगा। अररिया में सड़क और बाढ़ के मुद्दे प्रमुख हैं। यादव ने कहा कि वे जन सुराज के विकास एजेंडे से प्रेरित हुए। भाजपा में अवसर नहीं मिला। किशोर ने स्वागत करते हुए कहा कि ऐसे नेता पार्टी को मजबूत करेंगे।

बिहार की राजनीति में ऐसे बदलाव आम हैं। 2020 चुनाव से पहले भी कई नेता बदले। लेकिन जन सुराज का उदय नया है। पार्टी ने उपचुनावों में सीख ली। अब 2025 में बड़ा दांव है। सीमांचल में मुस्लिम-यादव समीकरण महत्वपूर्ण। ओवैसी और किशोर दोनों मुकाबले को तीखा बना रहे। भाजपा को रणनीति बदलनी पड़ेगी। नितीश कुमार ने कहा कि जन सुराज वोट काटेगी। तेजस्वी यादव ने किशोर पर निशाना साधा। लेकिन किशोर अडिग हैं। वे बिहार को नई दिशा देंगे।

जनार्दन यादव का शामिल होना स्थानीय स्तर पर असर डालेगा। नारपतगंज में उनके समर्थक अब जन सुराज की ओर मुड़ेंगे। अररिया जिला नेपाल सीमा से सटा है, यहां प्रवासी मुद्दे प्रमुख हैं। जन सुराज ने रोजगार पर वादा किया। यादव ने कहा कि वे क्षेत्र के विकास के लिए लड़ेंगे। यह घटना मीडिया में छाई रही। नई दुनिया और नवभारत टाइम्स ने प्रमुखता दी। सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई। कई ने इसे भाजपा के लिए खतरा बताया।

बिहार को बदलाव की जरूरत है। बेरोजगारी, प्रवासन और शिक्षा के मुद्दे गंभीर हैं। जन सुराज इन पर फोकस कर रही है। जनार्दन यादव जैसे नेता जमीनी हैं। उनका अनुभव चुनाव में काम आएगा। भाजपा को नुकसान, लेकिन लोकतंत्र में यह स्वाभाविक है। किशोर की रणनीति सफल हो, यह समय बताएगा। बिहार की जनता फैसला करेगी। विकास ही असली मुद्दा है। जन सुराज का सफर जारी है।

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