Bajpur : यशपाल आर्य ने उत्तराखंड सरकार पर ऊर्जा सुरक्षा से खिलवाड़ का आरोप लगाया
आर्य ने कहा कि यह भूमि कोई आम संपत्ति नहीं है, बल्कि अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय से जल विद्युत परियोजनाओं के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए संरक्षित रणनीतिक
ब्यूरो चीफ : आमिर हुसैन
नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य ने कहा कि उत्तराखंड सरकार जल विद्युत परियोजनाओं से जुड़ी बहुमूल्य भूमि को एनपीसीसी के जरिए निजी क्षेत्र को सौंपने का फैसला प्रदेश की ऊर्जा सुरक्षा, राज्य के हित और राष्ट्रीय हितों के खिलाफ खतरनाक कदम है। यह फैसला उत्तराखंड की ऊर्जा आत्मनिर्भरता को कमजोर करने और सार्वजनिक संपत्ति को निजी मुनाफाखोरों के हाथों में देने की साजिश जैसा लगता है।
आर्य ने बताया कि तीन दिसंबर दो हजार पच्चीस के शासनादेश के तहत उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड की डाकपत्थर और ढालीपुर वाली परियोजनाओं से जुड़ी 76.7348 हेक्टेयर भूमि को एनपीसीसी को हस्तांतरित करने के निर्देश जारी हुए हैं। जिला प्रशासन को इस भूमि का दाखिल-खारिज, सीमांकन और अधिग्रहण करने के आदेश दिए गए हैं, जो दिखाता है कि सरकार जनहित की चिंता किए बिना इस फैसले को थोपने पर तुली है।
आर्य ने कहा कि यह भूमि कोई आम संपत्ति नहीं है, बल्कि अविभाजित उत्तर प्रदेश के समय से जल विद्युत परियोजनाओं के भविष्य को सुरक्षित रखने के लिए संरक्षित रणनीतिक संपत्ति है। इसी इलाके से यमुना स्टेज-1, यमुना स्टेज-2, व्यासी, लखवाड़, किशाऊ और टौंस जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाओं का संचालन और निर्माण जुड़ा है। भौगोलिक हालात के कारण इन परियोजनाओं के लिए दूसरी भूमि उपलब्ध कराना लगभग नामुमकिन है और सरकार इस बात से अच्छी तरह वाकिफ है।
आर्य ने चेतावनी दी कि अगर यह भूमि निजी हाथों में चली गई तो प्रदेश की ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा खतरा मंडराएगा, बिजली उत्पादन की भविष्य की योजनाएं रुक सकती हैं और भारत सरकार की यमुना पुनर्जीवन योजना के तहत लखवाड़ व किशाऊ जैसी राष्ट्रीय परियोजनाओं पर बुरा असर पड़ेगा। यह सिर्फ प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि राज्य के रणनीतिक संसाधनों को कमजोर करने की गंभीर कोशिश है।
आर्य ने मांग की कि सरकार इस जनविरोधी और राष्ट्रविरोधी फैसले को तुरंत रद्द करे। अगर सरकार ने फैसला वापस नहीं लिया तो वे जन आंदोलन शुरू करेंगे, सड़क से सदन तक और हर संवैधानिक मंच पर विरोध करेंगे। उत्तराखंड की ऊर्जा संपत्तियों को निजी हाथों में लूटने की इजाजत किसी भी हाल में नहीं दी जाएगी। यह लड़ाई सिर्फ भूमि की नहीं, बल्कि उत्तराखंड के भविष्य, ऊर्जा सुरक्षा और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों की रक्षा की है।
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