जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में CJI गवई ने खुद को सुनवाई से हटाया, सुप्रीम कोर्ट जल्द गठित करेगा नई बेंच।

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े मामले की सुनवाई से खुद को अलग....

Jul 24, 2025 - 12:30
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जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में CJI गवई ने खुद को सुनवाई से हटाया, सुप्रीम कोर्ट जल्द गठित करेगा नई बेंच।
जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में CJI गवई ने खुद को सुनवाई से हटाया, सुप्रीम कोर्ट जल्द गठित करेगा नई बेंच।

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। उन्होंने कहा कि वह पहले इस मामले की जांच प्रक्रिया का हिस्सा रहे हैं, इसलिए उनके लिए इसकी सुनवाई करना उचित नहीं होगा। सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस वर्मा की याचिका पर सुनवाई के लिए जल्द ही एक नई बेंच गठित करने का भरोसा दिया है। यह मामला जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर भारी मात्रा में नकदी बरामद होने से जुड़ा है, जिसके बाद उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई है।

14 मार्च 2025 को जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली में लुटियंस जोन स्थित सरकारी आवास के स्टोररूम में आग लगने की घटना हुई थी। आग बुझाने के दौरान अग्निशमन कर्मचारियों ने वहां से भारी मात्रा में जली हुई नकदी बरामद की। इस घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट ने तीन जजों की एक आंतरिक जांच समिति गठित की, जिसमें पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के जज जी.एस. संधावालिया, और कर्नाटक हाई कोर्ट की जज अनु शिवरामन शामिल थीं। इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा को कदाचार का दोषी ठहराया।

इसके बाद तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने जस्टिस वर्मा से इस्तीफा देने या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने का सुझाव दिया, जिसे उन्होंने खारिज कर दिया। इसके परिणामस्वरूप, उनके खिलाफ संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया। 21 जुलाई 2025 को लोकसभा में 145 और राज्यसभा में 63 सांसदों ने इस प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए, जिनमें राहुल गांधी, अनुराग ठाकुर, रविशंकर प्रसाद, सुप्रिया सुले, और के.सी. वेणुगोपाल जैसे प्रमुख नेता शामिल थे।

जस्टिस वर्मा को इस विवाद के बाद दिल्ली हाई कोर्ट से इलाहाबाद हाई कोर्ट स्थानांतरित कर दिया गया, और उनसे सभी न्यायिक कार्य वापस ले लिए गए। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर आंतरिक जांच समिति की रिपोर्ट को चुनौती दी, जिसमें कहा गया कि उन्हें अपना पक्ष रखने का उचित मौका नहीं दिया गया और समिति ने पक्षपातपूर्ण तरीके से काम किया।

  • सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और CJI का फैसला

23 जुलाई 2025 को जस्टिस वर्मा की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, मुकुल रोहतगी, राकेश द्विवेदी, और सिद्धार्थ लूथरा ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका का जिक्र करते हुए तत्काल सुनवाई की मांग की। कपिल सिब्बल ने मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई, जस्टिस के. विनोद चंद्रन, और जस्टिस जोयमाल्या बागची की बेंच के सामने कहा कि इस मामले में कई महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल शामिल हैं, इसलिए इसे जल्द सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाए।

मुख्य न्यायाधीश गवई ने जवाब में कहा, “मैं इस मामले की सुनवाई नहीं कर सकता, क्योंकि मैं पहले इसकी प्रक्रिया का हिस्सा रहा हूं।” उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वह उस कॉलेजियम का हिस्सा थे, जिसने जस्टिस वर्मा के मामले पर चर्चा की थी। हालांकि, उन्होंने भरोसा दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट जल्द ही एक नई बेंच गठित करेगा, जो इस याचिका पर सुनवाई करेगी। सूत्रों के अनुसार, इस मामले में अगले हफ्ते नई बेंच गठित होने और सुनवाई शुरू होने की संभावना है।

  • जस्टिस वर्मा की याचिका और दलीलें

जस्टिस वर्मा ने अपनी याचिका में दावा किया कि आंतरिक जांच समिति ने उनके खिलाफ एकतरफा और पक्षपातपूर्ण तरीके से फैसला लिया। उन्होंने कहा कि समिति ने यह साबित करने का भार उन पर डाल दिया कि बरामद नकदी उनकी नहीं थी, और उन्हें अपनी सफाई पेश करने का उचित मौका नहीं दिया गया। उनकी याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि उनके आवास के बाहरी हिस्से में नकदी मिलने से यह साबित नहीं होता कि वह उनकी थी, क्योंकि समिति ने नकदी के स्रोत या उसके वहां पहुंचने के तरीके की जांच नहीं की।

जस्टिस वर्मा ने समिति की रिपोर्ट और उनके खिलाफ शुरू की गई महाभियोग प्रक्रिया को रद्द करने की मांग की है। उनकी याचिका में कई संवैधानिक सवाल उठाए गए हैं, जैसे कि जजों की जवाबदेही, आंतरिक जांच की प्रक्रिया की निष्पक्षता, और महाभियोग की प्रक्रिया की वैधता।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124, 217, और 218 के तहत किसी हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने के लिए महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। इसके लिए लोकसभा में कम से कम 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं। जस्टिस वर्मा के खिलाफ 208 सांसदों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया, जिसमें बीजेपी, कांग्रेस, टीडीपी, जेडीयू, और सीपीएम जैसे दलों के सांसद शामिल हैं।

यह प्रस्ताव अब लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति के पास विचार के लिए है। अगर इसे स्वीकार किया जाता है, तो संसद द्वारा एक जांच समिति गठित की जाएगी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट का एक जज, हाई कोर्ट का एक मुख्य न्यायाधीश, और एक प्रतिष्ठित कानूनविद शामिल होंगे। यह समिति मामले की जांच करेगी और अपनी रिपोर्ट संसद को सौंपेगी।

इस मामले में वकील मैथ्यूज नेदुमपारा ने भी सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी, जिसमें जस्टिस वर्मा के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की गई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज कर दिया, यह कहते हुए कि पहले उचित प्राधिकरणों के पास शिकायत दर्ज करानी होगी। कोर्ट ने नेदुमपारा को जस्टिस वर्मा को केवल “वर्मा” कहकर संबोधित करने पर भी फटकार लगाई थी।

इसके अलावा, देश के छह हाई कोर्ट्स (इलाहाबाद, अवध, गुजरात, केरल, कर्नाटक, और मध्य प्रदेश) के बार एसोसिएशन के अध्यक्षों ने मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम से मुलाकात कर जस्टिस वर्मा के खिलाफ सख्त कार्रवाई और FIR दर्ज करने की मांग की थी। उन्होंने कहा कि इस घटना ने न्यायपालिका की छवि को धक्का पहुंचाया है, और जजों की जवाबदेही तय करने के लिए नियमों को और सख्त करना चाहिए।

जस्टिस वर्मा का मामला न्यायपालिका की स्वतंत्रता और जवाबदेही पर एक गंभीर बहस छेड़ गया है। सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने इस घटना को न्यायपालिका की साख पर दाग बताया, जबकि कुछ ने जस्टिस वर्मा के पक्ष में बोलते हुए कहा कि बिना ठोस सबूतों के उन्हें दोषी ठहराना जल्दबाजी होगी। एक एक्स पोस्ट में कहा गया, “जस्टिस वर्मा केस में नई बेंच का गठन जरूरी है, ताकि निष्पक्ष जांच हो सके।”

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला भारत में जजों के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया को और स्पष्ट कर सकता है। यह आजादी के बाद पहला मौका है, जब किसी हाई कोर्ट के सिटिंग जज के खिलाफ संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया है। इससे पहले 1993 में सुप्रीम कोर्ट के जज वी. रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया गया था, लेकिन वह संसद में पारित नहीं हुआ था।

जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला न्यायपालिका और संसद दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण चुनौती है। मुख्य न्यायाधीश गवई का खुद को सुनवाई से अलग करना निष्पक्षता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जल्द गठित होने वाली नई बेंच इस मामले में संवैधानिक और कानूनी सवालों का समाधान करेगी।

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