Sambhal: रमज़ान से पहले खजूर बाज़ार सजा, मगर खरीदार गायब: महंगाई की मार, आधी रह गई बिक्री।
रमज़ान उल मुबारक से पहले खजूर का बाज़ार तो सज चुका है, लेकिन रौनक नदारद है। नगर पालिका क्षेत्र के मोहल्ला चमन सराय में पिछले
उवैस दानिश, सम्भल
रमज़ान उल मुबारक से पहले खजूर का बाज़ार तो सज चुका है, लेकिन रौनक नदारद है। नगर पालिका क्षेत्र के मोहल्ला चमन सराय में पिछले 10–12 वर्षों से खजूर का कारोबार कर रहे मौहम्मद रियाजुद्दीन बताते हैं कि इस साल महंगाई के बावजूद बिक्री में भारी गिरावट आई है। हालात ऐसे हैं कि बीते साल के मुकाबले इस बार कारोबार लगभग आधा रह गया है।
विक्रेता के मुताबिक, थोक मंडियों से खजूर महंगे दामों पर आ रही है, लेकिन ग्राहक अब भी पुराने रेट पर ही खरीदना चाहते हैं। उनका कहना है, “पहले चार रुपये का मुनाफ़ा हो जाता था, अब दो रुपये में ही गुज़ारा करना पड़ रहा है।” इस साल खजूर के किलो भाव में औसतन साढ़े तीन से चार रुपये तक की बढ़ोतरी हुई है। जो किस्में पहले ₹120 प्रति किलो मिलती थीं, वे अब ₹140 तक पहुँच गई हैं। दुकान पर इस समय अजवा, कलमी, अंबर, मरियम, दाल, आलू, ईरानी और चॉकलेट समेत करीब 50 किस्म की खजूर मौजूद हैं। सबसे सस्ती: ईरानी और आलू खजूर ₹100 से ₹120 प्रति किलो (कुछ किस्में ₹140–₹150 तक)
मौहम्मद रियाजउद्दीन, विक्रेता
सबसे महंगी: अजवा खजूर ₹550 आधा किलो, यानी ₹1100 प्रति किलो है। अजवा खजूर की खासियत बताते हुए विक्रेता कहते हैं कि इसकी धार्मिक और सेहत से जुड़ी मान्यताएं हैं। पारंपरिक तौर पर इसे शुगर कंट्रोल में मददगार माना जाता है और इसकी गुठली तक उपयोगी बताई जाती है। विदेशी खजूर की आवक पर पूछे गए सवाल पर उन्होंने बताया कि ईरान जैसे देशों में हालात के चलते मंडियों में कुछ किस्मों की सप्लाई प्रभावित हुई है। जब मंडी में माल नहीं आता, तो हम भी कहाँ से बेचें। रमज़ान में रोज़ा इफ्तार की शुरुआत खजूर से होने के कारण इसकी मांग स्वाभाविक तौर पर बढ़ जाती है। विक्रेता का कहना है कि अब गैर-मुस्लिम ग्राहक भी सेहत के चलते खजूर खरीद रहे हैं, लेकिन महंगाई के कारण लोग सस्ती किस्मों को ही तरजीह दे रहे हैं। ठंड के मौसम में भी इस साल खजूर की बिक्री उम्मीद के मुताबिक नहीं रही। अब जबकि रमज़ान शुरू होने में महज़ एक-दो दिन बाकी हैं, व्यापारी आस लगाए बैठे हैं कि आने वाले दिनों में बाज़ार में रौनक लौटेगी। फिलहाल महंगाई और मंदी के बीच खजूर कारोबारी कम मुनाफ़े में काम चलाने को मजबूर हैं।
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