घने कोहरे में मौत का गड्ढा: नोएडा सेक्टर 150 में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की ट्रेजिक मौत, उजागर हुई प्रशासन की क्रूर लापरवाही।

उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा सेक्टर 150 में 16-17 जनवरी 2026 की रात घने कोहरे के कारण 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत

Jan 21, 2026 - 14:35
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घने कोहरे में मौत का गड्ढा: नोएडा सेक्टर 150 में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की ट्रेजिक मौत, उजागर हुई प्रशासन की क्रूर लापरवाही।
घने कोहरे में मौत का गड्ढा: नोएडा सेक्टर 150 में सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की ट्रेजिक मौत, उजागर हुई प्रशासन की क्रूर लापरवाही।
  • उत्तर प्रदेश के नोएडा सेक्टर 150 में घने कोहरे के बीच सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की कार पानी भरे 
  • घटना के बाद रेस्क्यू ऑपरेशन में हुई देरी, कार को चार दिन बाद निकाला गया जो हैप्रशासनिक असफलता का प्रमाण
    नोएडा सेक्टर 150 में अनियंत्रित निर्माण गड्ढा बिना बैरिकेडिंग के खुला छोड़ दिया गया जिससे युवराज मेहता की कार गिरकर मौत हुई
  • उत्तर प्रदेश सरकार ने मामले में विशेष जांच दल गठित किया नोएडा अथॉरिटी सीईओ हटाए गए और बिल्डर को गिरफ्तार किया गया

उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा सेक्टर 150 में 16-17 जनवरी 2026 की रात घने कोहरे के कारण 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की मौत हुई। युवराज मेहता गुरुग्राम से अपनी मारुति सुजुकी ग्रैंड विटारा कार से घर लौट रहे थे। उनका घर टाटा यूरिका पार्क सोसाइटी में था और घटना घर से करीब एक किलोमीटर दूर हुई। घने कोहरे के कारण विजिबिलिटी बहुत कम थी जिससे कार एक तेज मोड़ पर अनियंत्रित हो गई। कार ने क्षतिग्रस्त बाउंड्री वॉल तोड़ी और एक निर्माणाधीन मॉल के बेसमेंट के लिए खोदे गए गहरे गड्ढे में गिर गई। यह गड्ढा लगभग 20 से 30 फीट गहरा था और इसमें पानी भरा हुआ था। गड्ढे के आसपास कोई बैरिकेडिंग या चेतावनी संकेत नहीं थे। युवराज मेहता तैरना नहीं जानते थे लेकिन वे कार से बाहर निकलकर कार की छत पर चढ़ गए। वहां से उन्होंने मदद के लिए चिल्लाना शुरू किया और अपने पिता राजकुमार मेहता को फोन किया जिसमें उन्होंने कहा पापा प्लीज बचाओ। युवराज मेहता ने करीब दो घंटे तक मदद की गुहार लगाई लेकिन रेस्क्यू टीम समय पर नहीं पहुंच सकी। उनकी मौत डूबने से हुई। घटना स्थल पर पहले भी ट्रक गिरने की घटना हो चुकी थी लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई थी। यह गड्ढा एक निर्माण स्थल का हिस्सा था जहां मुकदमेबाजी चल रही थी और निर्माण कार्य रुका हुआ था। सरकारी कुव्यवस्था के तहत ऐसे खतरनाक स्थलों को सुरक्षित नहीं रखा गया जिससे जान जाने की घटना हुई।

घटना के बाद रेस्क्यू ऑपरेशन में काफी देरी हुई। पुलिस फायर ब्रिगेड और एसडीआरएफ मौके पर पहुंचे लेकिन ठंडे पानी लोहे की छड़ों और खराब विजिबिलिटी के कारण रेस्क्यू में असमर्थ रहे। एक डिलीवरी एजेंट मोनिंदर ने पानी में कूदकर युवराज मेहता को बचाने की कोशिश की लेकिन सफल नहीं हो सका। युवराज मेहता का शव निकाल लिया गया लेकिन उनकी कार गड्ढे में डूबी रही। कार को निकालने में चार दिन लग गए। 20 जनवरी 2026 को एनडीआरएफ की टीम ने क्रेन की मदद से कार बाहर निकाली। कार निकालने में लगभग सात घंटे लगे और एनडीआरएफ की 30 सदस्यीय टीम शामिल थी। कार का सनरूफ खुला था और विंडशील्ड क्षतिग्रस्त थी। कार को फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया। यह देरी सरकारी तंत्र की असफलता को दर्शाती है क्योंकि नोएडा जैसे विकसित क्षेत्र में भी रेस्क्यू उपकरण और प्रक्रिया में कमी थी। घटना के समय करीब 80 कर्मचारी मौके पर थे लेकिन कार को तुरंत नहीं निकाला जा सका। सरकारी कुव्यवस्था में ऐसी देरी से जनता की सुरक्षा प्रभावित होती है। निर्माण स्थलों पर सुरक्षा मानकों का पालन नहीं होने से ऐसी घटनाएं होती हैं।

उत्तर प्रदेश सरकार ने मामले में कार्रवाई की। नोएडा अथॉरिटी के सीईओ एम लोकेश को उनके पद से हटा दिया गया। विशेष जांच दल एसआईटी गठित किया गया। पुलिस ने लोटस ग्रीन्स कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड और विजटाउन प्लानर्स के खिलाफ एफआईआर दर्ज की। एमजेड विजटाउन के मालिक अभय कुमार को गिरफ्तार किया गया। अभय कुमार को नॉलेज पार्क थाना पुलिस ने गिरफ्तार किया। यह निर्माण स्थल विवादित था और 2020 में संपत्ति बिक्री हुई थी लेकिन सुरक्षा उपाय नहीं किए गए। सरकारी कुव्यवस्था में निर्माण परियोजनाओं की निगरानी की कमी से ऐसे गड्ढे खुला छोड़ दिए जाते हैं। घटना से पहले भी ट्रक गिरने की सूचना थी लेकिन कोई सुधार नहीं किया गया। यह सरकारी लापरवाही का उदाहरण है जहां जन सुरक्षा के दावे खोखले साबित होते हैं। जांच में गड्ढे की स्थिति और बैरिकेडिंग की कमी पर फोकस किया जा रहा है।

घटना स्थल पर कोई चेतावनी बोर्ड या बैरिकेडिंग नहीं थी जिससे घने कोहरे में कार आसानी से गड्ढे में गिर गई। गड्ढा निर्माणाधीन मॉल का बेसमेंट था जो लंबे समय से खुला था। सरकारी कुव्यवस्था में ऐसे स्थलों को सील या सुरक्षित करने की जिम्मेदारी संबंधित विभागों की है लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। युवराज मेहता घर के बहुत करीब थे और सामान्य परिस्थितियों में सुरक्षित पहुंच जाते लेकिन सरकारी असफलता से मौत हुई। पिता राजकुमार मेहता मौके पर पहुंचे और उन्होंने घटना के दौरान की स्थिति बताई। उन्होंने कहा कि युवराज दो घंटे तक जिंदा थे और मदद मांगते रहे। रेस्क्यू में देरी से मौत हुई। सरकारी तंत्र में आपातकालीन प्रतिक्रिया की कमी स्पष्ट है। नोएडा को शो-विंडो कहा जाता है लेकिन यहां भी सुरक्षा व्यवस्था कमजोर साबित हुई।

मामले में पुलिस ने जांच शुरू की और एसआईटी सक्रिय है। कार निकालने के बाद फोरेंसिक रिपोर्ट से हादसे की पूरी तस्वीर सामने आएगी। सरकारी कुव्यवस्था में निर्माण स्थलों की निगरानी और आपात रेस्क्यू की तैयारी की कमी से ऐसी घटनाएं बढ़ रही हैं। युवराज मेहता की मौत ने पूरे सिस्टम की खामियों को सामने ला दिया है। निर्माण कंपनी और अथॉरिटी की जिम्मेदारी तय की जा रही है। गिरफ्तारी और हटाने के फैसले लिए गए हैं। जांच जारी है और रिपोर्ट का इंतजार है।

यह घटना सरकारी कुव्यवस्था का एक बड़ा उदाहरण है जहां विकास के नाम पर सुरक्षा उपेक्षित रहती है। नोएडा सेक्टर 150 जैसे क्षेत्र में भी खतरनाक गड्ढे बिना सुरक्षा के छोड़ दिए जाते हैं। रेस्क्यू में चार दिन लगना प्रशासनिक असफलता दर्शाता है। युवराज मेहता की मौत से जनता की सुरक्षा पर सवाल उठे हैं। सरकारी दावों और वास्तविकता में अंतर स्पष्ट है। उत्तर प्रदेश में सरकारी कुव्यवस्था की यह घटना जन सुरक्षा की कमजोर कड़ी को उजागर करती है। निर्माण स्थलों पर लापरवाही रेस्क्यू में देरी और जांच में कार्रवाई से सिस्टम की खामियां सामने आई हैं। युवराज मेहता की मौत ने प्रशासनिक संवेदनहीनता को कटघरे में खड़ा किया है।

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