हरदोई: रामायण-महाभारत सहित मुगलकाल की भी दास्तां समेटे है जिला हरदोई, हरदोई बाबा की कृपा से टली थी हरदोई में फांसी...
कृष्ण भक्ति काव्यधारा के सशक्त हस्ताक्षर और हिंदी साहित्य में बृजभाषा के प्रसिद्ध कवि रसखान की पिहानी ने आज भी यादें संजो रखी हैं। उनकी रचनाओं से कृष्ण भक्ति की जो मिसाल पेश की, वो अन्यत्र नहीं मिलती। इतिहास और पाठ्यक्रम की किताबों में रसखान का पूरा नाम सै...
By INA News Hardoi.
बाबा के किस्से आजादी की लड़ाई से लेकर अभी भी कई रहस्यों को अपने आप में समेटे हैं। उत्तर प्रदेश की राजनीति में हरदोई का अपना एक अलग रसूख है। यहां आठ विधायक, दो सांसद हैं। वहीं हरदोई बाबा के दर्शन करने वाले राजनेताओं की लिस्ट भी काफी लंबी है। अंग्रेजी हुकूमत में हरदोई जिले में जिला जेल के अंदर फांसी की सजा सुनाई जाती थी। किसी निर्दोष ने बाबा से आकर उसे फांसी दिए जाने की शिकायत की थी। जिस पर बाबा क्रोधित हो गए थे। बाबा के मना करने के बावजूद भी अंग्रेजों ने उस व्यक्ति को फांसी दे दी थी।
तख्त पलटने के साथ फांसी दिए गए व्यक्ति की मृत्यु नहीं हुई थी। बताया जाता है कि स्वप्न में आकर बाबा ने अंग्रेज जेलर से फांसी के तख्त को हरदोई से कहीं और ले जाने का आदेश दिया था। स्वप्न से डरे अंग्रेज जेलर ने फांसी के तख्त को हरदोई से हटाकर फतेहगढ़ भेज दिया था। तब से लेकर के आज तक हरदोई जेल में फांसी की सजा नहीं दी जाती है। अदालत के द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा आज भी सेंट्रल जेल फतेहगढ़ में दी जाती है। फांसी की सजा हरदोई में सुनाई तो जरूर जाती है लेकिन यह फांसी फतेहगढ़ जेल में दी जाती है। यह मंदिर करीब 400 वर्ष पुराना है। अंग्रेजी हुकूमत से भी पहले यहां पर एक विशालकाय जंगल हुआ करता था। जंगल में एक बूढ़े बाबा नाम से संत कुटी बनाकर समाधि अवस्था में तपस्या किया करते थे। आसपास के लोग किसी समस्या को लेकर बाबा के पास अक्सर जाया आया करते थे।
संत बूढ़े बाबा ने हवन कुंड वाली जगह पर ही जीवित समाधि ले ली थी और उसी स्थान पर एक पत्थर की मूर्ति भी प्राप्त हुई थी। बाबा की समाधि लेने के काफी वर्षों के बाद वहां पर लोगों का आना-जाना जारी रहा। लोग वहां पर जाकर अपनी समस्या को बताकर आशीर्वाद प्राप्त किया करते थे। धीरे-धीरे उस स्थान के विकास करने के बाद मंदिर के भव्य रूप में इसे परिलक्षित किया गया। जनपद में हिंदुओं के अलावा मुस्लिम भी किसी अच्छे काम को करने के बाद इस मंदिर पर प्रसाद चढ़ाने के लिए अवश्य आते हैं। शादी होने के बाद बहू घर तभी जाती है, जब वह मंदिर में दर्शन कर लेती है। जनपद के ज्यादातर संस्कार मंदिर के संरक्षण में ही होते हैं। यह रहस्यमई मंदिर समय-समय पर अपने प्रभाव को दर्शाता रहता है।
कोरोना काल में मंदिर में नियम और संयम के साथ पूजा-अर्चना का दौर जारी रहा था। बुजुर्गों का कहना है कि हरदोई बाबा के मंदिर में धूनी कभी ठंडी नहीं होती है। हवन की आग प्राचीन काल से जलती चली आ रही है। भारतवर्ष में ब्रिटिश हुकूमत में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के अलावा भी देश की कुछ रहस्यमई शक्तियों ने भी अंग्रेजों के सामने लोहा मनवाया था। हरदोई में भी अंग्रेजी शासन काल से भी पहले के संत श्री हरदोई बाबा का नाम बड़े आदर और सम्मान के साथ में लिया जाता है। हरदोई में कोई भी धार्मिक आयोजन और संस्कार हरदोई बाबा के मंदिर में जाए बिना नहीं होता है।
चाहे किसी की शादी हो या कोई भी बड़ा राजनेता। हरदोई में पदार्पण के बाद बाबा के दरबार में जाना नहीं भूलता है। हरदोई का होलिका और हिरण्याकश्यप से पुराना नाता है। हिरण्याकश्यप हरदोई का राजा था और होलिका उसकी बहन थी। हिरण्याकश्यप के प्रभु भक्त पुत्र को जला देने की साजिश में होलिका भस्म हो गई थी और तब से ही होलिका दहन शुरू हो गया। होलिका दहन को अहंकार के दहन के रूप में भी जाना जाता है।
श्रीनारायण भक्त प्रह्लाद से जुड़ा है हरदोई जिला...
हरदोई का राजा हिरण्याकश्यप था। हिरण्याकश्यप को ब्रह्मा जी ने आशीर्वाद दिया था कि उसकी मौत न तो सुबह होगी न शाम को। न उसे जानवर मारेगा और न ही मनुष्य। साथ ही यह भी वरदान दिया था कि उसकी मौत न तो आकाश में होगी और न ही धरती पर। ऐसे में हिरण्याकश्यप ने खुद को भगवान मान लिया था। इसके बाद वह अहंकार में इतना चूर हो गया था कि अपने राज्य में भगवान की पूजा पर रोक लगा दी थी। हिरण्याकश्यप का पुत्र प्रहलाद विष्णु भगवान का अनन्य भक्त था। इसके कारण हिरण्याकश्यप प्रहलाद से नाराज रहता था। कभी उसने प्रहलाद को पहाड़ की चोटी से गिरवा कर मौत के आगोश में देने की कोशिश की तो कभी हाथी के पैरों से कुचलवा कर मार डालने की साजिश रची।
भगवान विष्णु की कृपा से हर बार प्रहलाद बच जाता था। हिरण्याकश्यप की एक बहन थी, जिसका नाम होलिका था। होलिका के पास एक ऐसी दुशाला थी जिसे ओढ़ने पर उसके ऊपर अग्नि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था। अपने भाई हिरण्याकश्यप के साथ मिल कर उसने यह साजिश रची कि वह प्रहलाद को अपनी गोद में बैठा कर अग्नि में बैठ जाएगी। दुशाला के प्रभाव से उसको कुछ नहीं होगा, लेकिन प्रहलाद जलकर मर जाएगा। होलिका प्रहलाद को लेकर जैसे ही अग्नि में बैठती है वैसे ही हवा चलने लगती है और उसका दुशाला उड़ जाता है।
नवाब दिलेर खान के मकबरे से जुडी हैं मुगलकाल की यादें...
मुगल काल में शाहजहां के सिपहसालार अफगान अधिकारी दिलेर खान को शाहजहांपुर में हो रहे विद्रोह को रोकने के लिए भेजा गया था। इसके बाद दिलेर खान यहां आकर विद्रोह को रोकने में सफल रहा। इस पर शाहजहां के द्वारा दिलेर खान से खुश होकर उससे उसकी इच्छाएं जानी गई। इस पर दिलेर खान ने शाहबाद में स्थित कदम रसूल मांगे और वहां पर बसने का अधिकार मांगा।
शाहजहां के द्वारा उसकी इच्छाएं पूरी करते हुए उसे कदम रसूल और यहां पर रहने का अधिकार दे दिया। हरदोई के शाहाबाद में स्थित नवाब दिलेर खान के मकबरा को नवाब दिलेर खान के द्वारा सन 1680 में बनवाया था। जिसके बाद नवाब दिलेर खान के मरने के बाद इसी मकबरे में दफन किया गया। इस मकबरे के अंदर आज भी नवाब दिलेर खान की कब्र मौजूद है। इस मकबरे की इतनी ऊंचाई थी कि मकबरे के ऊपर जलने वाले दिए को लोग पड़ोसी जनपद शाहजहांपुर से देख सकते थे। इस मकबरे की चोटी पर शाहजहांपुर दिखता था। हरदोई से 40 किलोमीटर दूरी पर स्थित शाहाबाद कस्बे में यह नवाब दिलेर खान का मकबरा बना हुआ है। इसे भारतीय पुरातत्व विभाग ने अपने अधिकार क्षेत्र में लेते हुए संरक्षित कर रखा है। इस मकबरे में लोग घूमने भी आते हैं। साथ ही मुस्लिम व हिंदू दोनों ही धर्मों के लोग यहां चादर चढ़ाने के लिए भी आते हैं।
हुमायूं के वरिष्ठ मंत्री सदर ए जहां ने पिहानी में ली थी पनाह...
रौजा सदर जहां हुमायूं काल की स्मृतियों को संजोए है। 1540 ई में शेरशाह और हुमायूं के बीच हुई जंग में हुमायूं के वरिष्ठ मंत्री सदर ए जहां ने यहां आकर पनाह ली थी। दोबारा हुकूमत मिलने के बाद हुमायूं ने यहां उन्हें जागीर दी। सदरे जहां ने यहां बस्ती आबाद की और पिन्हानी अर्थात छुपने की जगह नाम रखा, जो अब पिहानी हो गया है। कहा जाता है कि तब यूरोपियन पर्यटक यहां घूमने आते थे। उन्होंने इस कस्बे को दमिश्क ए अवध की संज्ञा दी थी।
दमिश्के अवध’ पिहानी का कई साल पुराना है इतिहास...
कस्बे की मुगलकालीन जामा मस्जिद ‘दमिश्के अवध’ पिहानी का पांच सौ साल पुराना इतिहास समेटे हुए है। हुमायूं के ज़माने में बनी इस मस्जिद को यहां के सुन्नी मुसलमानों का प्रमुख धर्मस्थल माना जाता है। मस्जिद की खूबसूरत इमारत पुराने वक्त के कारीगरों की महारत का आइना है।कटरा बाजार में स्थित मुफ्ती सदर जहां के रौज़े से सटी हुई जामा मस्जिद का निर्माण सदर जहां के ही दौर में हुआ था। बुजुर्गों का कहना है कि वह अपने बाप-दादा से भी इसी मस्जिद के बारे में सुनते आए हैं। जानकारों के अनुसार मुफ्ती सदर जहां हुमायूं के दरबार में चीफ जस्टिस हुआ करते थे। सन् 1540 ई। में शेरशाह सूरी और हुमायूं के बीच हुई जंग मेें जब हुमायूं की शिकस्त हो गई तो सदर जहां ने इसी इलाके के जंगलों में पनाह ली थी। इसके बाद हुमायूं के दोबारा तख्तनशीन होने पर यह जगह सदर जहां को जागीर स्वरूप दे दी गई। तब उन्होंने यहां बस्ती आबाद की और यहां इस मस्जिद का निर्माण कराया था।
मौजूदा समय में मस्जिद की देखरेख करने वाली अंजुमन इस्लामिया के अध्यक्ष वजीहुज़्जमां फारूकी कहते हैं कि तब मस्जिद की इमारत छोटी थी। अरसे तक मस्जिद की देखरेख न हो पाने से गुंबद आदि जमींदोज होने लगे थे। इसके बाद उनके दादा मौलाना शफी साहब ने काफी समय तक मस्जिद की देखरेख की। इस दौरान मस्जिद के दोनों गुंबद और आगे की इमारत का जीर्णोद्धार कराया। उन्होंने ही यहां अंजुमन इस्लामिया के तहत मदरसा ‘दारूल उलूम महमूदिया’ कायम कराया। इसमें शिक्षा पाने वालों में मौलाना वकी, हमीद अहमद व प्रसिद्ध साहित्यकार प्रोफेसर अज़हर अली फारूकी आदि हैं। बाद में उनके बेटे मौलाना वकी साहब ने मस्जिद की जिम्मेदारी संभाली। उनका कार्यकाल आज भी इलाकाई मुसलमानों के लिए यादगार है। मस्जिद और मदरसे की देखरेख करने वाली अंजुमन का इतिहास भी काफी पुराना है। यह सन् 1320 हिजरी में कायम की गई थी। इसके सबसे पहले अध्यक्ष हकीम हुसैनी थे, जिनकी कब्र मदरसा और मस्जिद प्रांगण में है। मस्जिद की शानदार और तारीखी इमारत आज भी पूरे इलाके के मुसलमानों में आस्था का केंद्र है।
महाभारत काल से जुड़ा है धौम्य ऋषि की तपोभूमि धोबिया आश्रम का इतिहास...
जिला मुख्यालय से इस स्थल की दूरी करीब 35 किलोमीटर है, जहां तक कार से पहुंचने में करीब एक घंटे का समय लगता है। प्राकृतिक सुंदरता को अपने आप में समेटे यह जंगली इलाका है। जंगल के बीचों-बीच जलधारा सदियों से बहती चली आ रही है, जो आगे गोमती नदी में जाकर के मिल जाती है। धोबिया आश्रम धौम्य ऋषि की तपोभूमि है। यहां स्थित शिवलिंग पांडवों के द्वारा पूजित है। इसका उल्लेख कई पुराणों में मिलता है। धौम्य ऋषि ने नैमिष क्षेत्र के स्थान पर तपस्या की थी। यह 84 हजार ऋषियों की तपस्या में शामिल ऋषि माने जाते हैं। यह पांडवों के कुल गुरु पुरोहित थे। बताते चलें कि नैमिषारण्य के आसपास का यह क्षेत्र धार्मिक आध्यात्मिक रूप से आकर्षण का केंद्र है।
गोमती नदी के तट पर धोबिया आश्रम का घना जंगल सुंदर और दर्शनीय है। यहां पर लाखों की संख्या में पर्यटक आते रहते हैं। अभी कुछ दिन पहले ही आश्रम की देख-रेख करने वाले महान संत नेपाली बाबा ने समाधि ली है। पौराणिक मान्यताओं और लेखों के अनुसार, धोबिया आश्रम में पाए जाने वाले जल स्रोत का महाभारत कालीन इतिहास है। किवदंती यह है कि महाभारत काल में अर्जुन का बाण लगने के बाद जब कर्ण पृथ्वी पर अंतिम सांस ले रहे थे, तब भगवान कृष्ण उनकी परीक्षा लेने के लिए ब्राह्मण का रूप धारण करके कर्ण से दान मांगने के लिए पहुंचे थे। तब दानवीर कर्ण ने अपने दांत से सोना निकालकर उन्हें दान कर दिया था, जिसे भगवान ने अशुद्ध बता दिया था और लेने से इनकार कर दिया था। तब कर्ण ने पृथ्वी को बाण से भेदकर जल का स्रोत निकाला था। तभी से लेकर आज तक यह जल स्रोत लगातार बिना रुके चल रहा है। यह जल स्रोत शीतल और निर्मल है। जनपद के अलावा बड़ी दूर-दूर से पर्यटक यहां पर इस जल स्रोत और शिवलिंग से निकलने वाले जल के रहस्य और जंगल की मनोरम छटा को देखने के लिए आते रहते हैं। पूर्व जिलाधिकारी पुलकित खरे ने इस क्षेत्र में काफी बड़ा काम किया था। उन्होंने यहां का जीर्णोद्धार कराया था। तब से लेकर आज तक यह क्षेत्र प्रशासन के संरक्षण में है।
महर्षि मार्कण्डेय को भगवान शिव से मिला था चिरंजीवी होने का वरदान...
हरदोई में द्वापर युग के महर्षि मार्कण्डेय की तपस्थली आज भी मौजूद है। माना जाता है कि इसी स्थान पर महर्षि मार्कण्डेय ने अपनी अल्पायु को टालने के लिए शिव जी की तपस्या की थी, जिसके फलस्वरूप उन्हें चिरंजीवी होने का वरदान प्राप्त हुआ था। हरदोई से 40 किलोमीटर दूर विकासखंड पिहानी के गांव बेला कपूरपुर में एक आश्रम है, जिसे महर्षि मार्कण्डेय आश्रम के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि द्वापर युग में महाभारत काल के समय का यह आश्रम है। महर्षि मार्कण्डेय अपनी अल्पायु को टालने के लिए इसी स्थान पर घने जंगल में शिवलिंग स्थापित कर तपस्या करने में लीन हो गए। बताया जाता है कि तपस्या के दौरान ही उनकी अल्पायु पूरी हो गई और यमराज उन्हें लेने आ गए।
तभी भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने महर्षि को चिरंजीवी का वरदान देकर यमराज को वापस भेज दिया। इसके बाद महर्षि मार्कण्डेय ने कई ग्रंथों की रचना की और लंबे समय तक धर्म का प्रचार किया। महर्षि मार्कण्डेय आश्रम में एक तालाब भी है, जो कई बीघे में फैला हुआ है। ऐसा बताया जाता है कि यह तालाब कभी सूखता नहीं है और इस तालाब में वर्ष भर कमल के फूल खिले रहते हैं। इसलिए इस तालाब को कमल तालाब भी कहा जाता है। महंत भरत दास का कहना है कि इस तालाब में नहाने से कई प्रकार के चर्म रोगों से छुटकारा मिल जाता है, तालाब का पानी काई लगने के बावजूद साफ है। महाभारत काल के प्राचीन धार्मिक स्थल पर माह की हर अमावस्या को मेले का आयोजन होता है। जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं और कमल सरोवर में डुबकी लगाकर दर्शन पूजन आदि करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि इस स्थान पर सच्चे मन से मांगी गईं सारी मुरादें जल्द पूरी हो जाती हैं।
रामायण काल से जुड़ा है हत्याहरण तीर्थस्थल...
सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन उप्र के हरदोई जिले में हत्याहरण तीर्थस्थल मौजूद है। यह तीर्थ स्थल संडीला तहसील के पवित्र नैमिषारण्य परिक्रमा स्थल में स्थित है। प्रदेश की राजधानी लखनऊ से करीब 150 किमी दूर बनाया गए इस तीर्थ का संबंध त्रेतायुग से है। मान्यता है कि प्रभु श्रीराम ने जब रावण का वध किया तो उसके कुछ दिन बाद यहां ब्रह्महत्या के दोष से मुक्त होने आए थे। उन्होंने यहां मौजूद तालाब में स्नान किया था। सदियों पुराने मौजूद मंदिर तो वर्तमान में नहीं हैं, लेकिन इस तीर्थ का जीर्णोद्वार 28 मई 1939 को श्रीमती जनक किशोरी देवी पत्नी स्वर्गीय ठाकुर जनन्नाथ सिंह सुपुत्र ठाकुर शंकर सिंह रईस की याद में कराया गया था। जगन्नाथ सिंह काकूपूर के जमींदार थे। शिव पुराण में हत्याहरण तीर्थ के बारे में एक रोचक प्रसंग मिलता है।
यह कहानी सतयुग की है। एक बार माता पार्वती के साथ, भगवान शिव अर्रान्य जंगल की खोज में निकले, और वह नैमिषारण्य में रुके। यह एक सुंदर वन था। शिव यहां तप करने लगे। माता पार्वती जंगल में भ्रमण कर रही थी तभी उनको प्यास लगी। आस-पास जल भी नहीं था। ऐसी विषम परिस्थिति में उन्होंने देवताओं से जल लाने का आग्रह किया। तब भगवान सूर्य कमंडल में जल लेकर उपस्थित हुए। जब माता पार्वती जलपान कर रही थी, तब उस समय कमंडल से कुछ बूंदें धरती पर गिर गईं। वहां एक जलकुंड बन गया। जब शिव-पार्वती उस स्थान से जाने लगे। तब शिव ने इस जलकुंड का नाम प्रभास्कर क्षेत्र रखा। त्रेतायुग में यही वह जगह थी। जहां श्रीराम ने ब्रह्महत्या के पाप से मुक्त होने के लिए स्नान किया था। उन्होंने कहा, इस तीर्थ में जो भी ब्रह्महत्या के पाप से पीड़ित व्यक्ति स्नान करेगा। वह इस दोष से मुक्त हो जाएगा। तब से यह तीर्थ हत्याहरण के रूप में प्रसिद्ध हो गया।
कृष्ण भक्त रसखान की जन्मभूमि है पिहानी...
कृष्ण भक्ति काव्यधारा के सशक्त हस्ताक्षर और हिंदी साहित्य में बृजभाषा के प्रसिद्ध कवि रसखान की पिहानी ने आज भी यादें संजो रखी हैं। उनकी रचनाओं से कृष्ण भक्ति की जो मिसाल पेश की, वो अन्यत्र नहीं मिलती। इतिहास और पाठ्यक्रम की किताबों में रसखान का पूरा नाम सैयद इब्राहिम पिहानी वाले दर्ज है। रसखान का नाम कहीं-कहीं रसखान और रसखां भी मिलता है। उनके जन्म स्थान और जन्मतिथि को लेकर इतिहासकारों में मतभेद है, लेकिन ज्यादातर इतिहासकार इस बात से सहमत हैं कि रसखान का जन्मस्थान हरदोई जिले का पिहानी नगर ही है। रसखान पिहानी से दिल्ली चले गए और फिर कभी वापस नहीं आए। रसखान ने स्वयं लिखा है कि गदर के दौरान जब दिल्ली शमशान बन गई, तो वह दिल्ली से ब्रज (मथुरा) चले गए और वहीं रहने लगें। रसखान की समाधि मथुरा के महाबन जिले में है।
पुस्तक ''रसखानि'' में भी इसका उल्लेख है कि वह पिहानी में जन्मे थे।श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर रसखान को भी याद किया जाता है। कहा जाता है कि पिहानी में रसखान का जन्म एक जागीरदार घराने में हुआ था। दुर्भाग्य से कस्बा में रसखान का एक भी स्मारक नहीं है। हालांकि, रसखान के शिष्य कहे जाने वाले सैयद सुलेमान शाह की मजार मोहल्ला मीरसराय में है। स्थानीय निवासियों ने अपनी श्रद्धा से इस स्थान पर एक चबूतरा बनवाया। अब लोगों ने मुख्य मार्ग पर बोर्ड और चहारदीवारी बनवाने की मांग की है। लगभग छह सात वर्ष पूर्व तत्कालीन डीएम एके सिंह राठौर के प्रयास से हरदोई में प्रेक्षाग्रह का निर्माण हुआ था। साहित्य प्रेमियों की मांग पर इसको रसखान का नाम दिया गया।
साहित्य की धरोहर थे रसखान- सैयद इब्राहीम रसखान की कृष्णजी के प्रति अगाध श्रद्धा थी। कृष्ण भक्ति ने उन्हें ऐसा मुग्ध किया कि गोस्वामी विट्ठलनाथ से दीक्षा लेकर ब्रजभूमि में जा बसे। रसखान की रचनाओं में न केवल श्रीकृष्ण के प्रति अनुरक्ति है बल्कि कृष्ण भूमि के प्रति अनन्य अनुराग भी हैं। उनके काव्य में राधा-कृष्ण की प्रेम-लीलाओं का मनोहर वर्णन मिलता है। उन्होंने ब्रजभाषा का अत्यंत सरस और मनोरम प्रयोग किया। श्रीमद्भागवत का फारसी और हिंदी में अनुवाद किया। सुजान रसखान और प्रेम वाटिका जैसी कई उपलब्ध कृतियों के रचनाकार रसखान के सवैये, दोहे और छंद आदि आज भी प्रासंगिक है।
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