Hardoi : जातिसूचक शब्दों का प्रयोग नहीं तो एससी- एसटी एक्ट में मुकदमा कैसे? सनबीम स्कूल प्रकरण की निष्पक्ष जांच की मांग को लेकर अधिवक्ता लामबंद

अधिवक्ताओं का कहना है कि वायरल वीडियो में कहीं भी जातिसूचक शब्दों के प्रयोग या स्कूल परिसर में कॉपियां बेचने का कोई ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं है। प्रथम दृष्टया यह वीडियो किसी सुनियोजित साजिश का हिस्सा प्रतीत होता है। ज्ञापन के माध्यम से

Apr 30, 2026 - 23:02
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Hardoi : जातिसूचक शब्दों का प्रयोग नहीं तो एससी- एसटी एक्ट में मुकदमा कैसे? सनबीम स्कूल प्रकरण की निष्पक्ष जांच की मांग को लेकर अधिवक्ता लामबंद
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हरदोई जनपद में शिक्षा व्यवस्था और निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली को लेकर अधिवक्ताओं का एक बड़ा समूह लामबंद हो गया है। सुरेश कुशवाहा, सर्वेंद्र सिंह यादव, दलबीर सिंह, मोहम्मद अजहर, ओमपाल सिंह, अरविंद सिंह सिसोदिया और वेद प्रकाश द्विवेदी जैसे अनुभवी अधिवक्ताओं ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर जिलाधिकारी के नाम एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा। हालांकि, जिलाधिकारी की व्यस्तता के कारण यह ज्ञापन प्रशासनिक अधिकारी द्वारा प्राप्त किया गया। अधिवक्ताओं का स्पष्ट कहना है कि जिले के कुछ निजी स्कूलों में जिस तरह से बाहरी संगठनों का हस्तक्षेप बढ़ा है, वह न केवल शैक्षणिक माहौल को खराब कर रहा है, बल्कि छात्र-छात्राओं के मौलिक अधिकारों का भी सीधा उल्लंघन है।

अधिवक्ताओं ने इस बात पर चिंता जताई कि स्कूल परिसर के भीतर कक्षाएं चलने के दौरान किसी भी संगठन द्वारा विरोध प्रदर्शन करना पूरी तरह से अनुचित है और शिक्षा के अधिकार कानून के तहत ऐसी गतिविधियों में संलिप्त लोगों के विरुद्ध कड़ी कानूनी कार्रवाई का प्रावधान होना चाहिए। न्यू सनबीम स्कूल के प्रकरण का विस्तार से उल्लेख करते हुए अधिवक्ताओं ने निजता के अधिकार और संवैधानिक मर्यादाओं का मुद्दा उठाया है। ज्ञापन में यह तर्क दिया गया है कि बिना अनुमति के किसी स्कूल के प्रधानाचार्य और अभिभावक के बीच होने वाली बातचीत का वीडियो बनाना और उसे सार्वजनिक करना पूरी तरह से अवैध है। यह कृत्य संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त निजता के अधिकार का हनन है। अधिवक्ताओं ने मांग की है कि जिस व्यक्ति ने भी यह वीडियो बनाकर प्रचारित किया है, उसके विरुद्ध मानहानि का मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि इस तरह के वीडियो अक्सर एकतरफा होते हैं और सत्यता की जांच किए बिना इन्हें सार्वजनिक करने से संस्था की छवि धूमिल होती है, जिससे वहां पढ़ रहे बच्चों के मानस पटल पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

अधिवक्ताओं का कहना है कि वायरल वीडियो में कहीं भी जातिसूचक शब्दों के प्रयोग या स्कूल परिसर में कॉपियां बेचने का कोई ठोस साक्ष्य मौजूद नहीं है। प्रथम दृष्टया यह वीडियो किसी सुनियोजित साजिश का हिस्सा प्रतीत होता है। ज्ञापन के माध्यम से अधिवक्ताओं ने बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने तर्क दिया है कि सनबीम स्कूल के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने से पहले विभाग को गहनता से जांच करनी चाहिए थी। वीडियो के अवलोकन से ऐसा प्रतीत होता है कि संबंधित व्यक्ति कई घंटों तक स्कूल में बैठकर अव्यवस्था फैला रहा था और प्रधानाचार्य या प्रबंधक को उकसाने का प्रयास कर रहा था। अधिवक्ताओं का आरोप है कि एक सोची-समझी रणनीति के तहत प्रबंधन को उकसावे में लाया गया और फिर वीडियो बनाकर उसे वायरल कर दिया गया।

इस पूरे मामले में बिना किसी निष्पक्ष जांच के सीधे स्कूल के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करना न्यायसंगत नहीं है, इसलिए जिला प्रशासन को इस बिंदु पर दोबारा गौर करना चाहिए और वास्तविकता का पता लगाना चाहिए। जिले के अन्य प्रतिष्ठित निजी स्कूलों की कार्यप्रणाली को लेकर भी ज्ञापन में गंभीर आरोप लगाए गए हैं। अधिवक्ताओं ने सेंट जेम्स इंटर कॉलेज, बाल विद्या भवन, जेके पब्लिक स्कूल और क्रिसेंट एकेडमी जैसे संस्थानों का नाम लेते हुए कहा कि यदि सनबीम स्कूल पर जांच हो रही है, तो इन स्कूलों की भी जांच होनी अनिवार्य है। आरोप है कि इन स्कूलों के प्रबंधकों और प्रधानाचार्यों द्वारा अभिभावकों पर नघेटा रोड स्थित एक विशेष बुक डिपो (यूनिवर्सल बुक डिपो) से ही किताबें और कॉपियां खरीदने का अनैतिक दबाव बनाया जा रहा है।

जिले में यह एक खुली सच्चाई है कि इन स्कूलों की विशेष सामग्री किसी अन्य दुकान पर उपलब्ध नहीं होती, जिससे अभिभावकों को मजबूरी में ऊंचे दामों पर वहीं से खरीदारी करनी पड़ती है। कानून की नजर में सभी समान हैं, इसलिए प्रशासन को भेदभाव रहित कार्रवाई सुनिश्चित करनी चाहिए। निजी स्कूलों और पुस्तक विक्रेताओं के बीच के कथित गठजोड़ पर कड़ा प्रहार करते हुए अधिवक्ताओं ने मांग की है कि संबंधित दुकानदारों के रिकॉर्ड का भी सत्यापन किया जाए। ज्ञापन में कहा गया है कि अभिभावकों से मनमाने दामों पर किताबें और कॉपियां बेची जा रही हैं, जो आर्थिक शोषण की श्रेणी में आता है। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी विशेष दुकान से सामग्री खरीदने की अनिवार्यता को समाप्त किया जाए और जो दुकानदार इस सिंडिकेट का हिस्सा हैं, उनके व्यापारिक रिकॉर्ड की जांच हो। यदि किसी स्कूल और दुकानदार के बीच कमीशन का खेल चल रहा है, तो उनके खिलाफ कड़ी दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए ताकि आम जनता को इस वित्तीय बोझ से राहत मिल सके और शिक्षा के व्यवसायीकरण पर लगाम लगाई जा सके।

शिक्षा के अधिकार अधिनियम (RTE) के पालन को लेकर भी अधिवक्ताओं ने प्रशासन को घेरा है। ज्ञापन में मांग की गई है कि हरदोई के सभी निजी स्कूलों की जांच के लिए एक विशेष कमेटी गठित की जाए जो तीन मुख्य बिंदुओं पर अपनी रिपोर्ट दे। पहला, कॉपियों और किताबों की बिक्री में वसूला जा रहा कमीशन; दूसरा, हर साल की जाने वाली मनमानी फीस वृद्धि; और तीसरा, सबसे महत्वपूर्ण, आरटीई के तहत 25 प्रतिशत गरीब बच्चों के प्रवेश की वर्तमान स्थिति। अधिवक्ताओं का कहना है कि कई स्कूल कागजों पर तो नियम पालन का दावा करते हैं, लेकिन हकीकत में गरीब बच्चों को प्रवेश देने में आनाकानी की जाती है। इन सभी बिंदुओं पर गहन जांच होने से ही जिले की शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता आ पाएगी। अधिवक्ताओं ने जिला प्रशासन को चेतावनी देते हुए कहा है कि यदि जिलाधिकारी द्वारा बेसिक शिक्षा अधिकारी को अन्य सभी निजी स्कूलों की निष्पक्ष जांच के लिए निर्देशित नहीं किया गया, तो आने वाले समय में एक बड़े स्तर पर जन-आंदोलन शुरू किया जाएगा। इस आंदोलन में न केवल अधिवक्ता समाज बल्कि आम अभिभावकों और विभिन्न सामाजिक संगठनों को भी जोड़ा जाएगा।

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