बना दिया 88 साल पुराना फर्जी बर्थ सर्टिफिकेट, जाल बिछाकर पर्दे के पीछे चल रहे गिरोह का पर्दाफाश, दो सगे भाई गिरफ्तार।
डिजिटल गवर्नेंस के इस दौर में जहां नागरिकों की सुविधा के लिए जनसेवा केंद्रों का जाल बिछाया गया है, वहीं कुछ असामाजिक
- जनसेवा केंद्र की आड़ में चल रहे फर्जी जन्म प्रमाण पत्र बनाने वाले अंतरराज्यीय गिरोह का पर्दाफाश, पुलिस ने दो सगे भाइयों को किया गिरफ्तार
- सरकारी पोर्टल में अनधिकृत रूप से घुसपैठ कर तैयार किया अठासी साल पुराना फर्जी बर्थ सर्टिफिकेट, तकनीकी सुरक्षा और प्रशासनिक तंत्र में बड़ी सेंध
- हजारों जाली दस्तावेजों के जरिए विदेशी नागरिकों और अपराधियों को भारतीय पहचान दिलाने का नेटवर्क ध्वस्त, सरगनाओं से भारी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बरामद
डिजिटल गवर्नेंस के इस दौर में जहां नागरिकों की सुविधा के लिए जनसेवा केंद्रों का जाल बिछाया गया है, वहीं कुछ असामाजिक तत्व इसका इस्तेमाल देश की आंतरिक सुरक्षा को खतरे में डालने के लिए कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस के साइबर सेल और स्थानीय खुफिया विभाग की संयुक्त टीम ने एक बड़े अभियान के तहत जनसेवा केंद्र की आड़ में चल रहे एक ऐसे शातिर और संगठित गिरोह को दबोचा है जो फर्जी जन्म और मृत्यु प्रमाण पत्र बनाने के काले कारोबार में लिप्त था। यह गिरोह कितना शातिर था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इन्होंने सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के सरकारी पोर्टल में अवैध रूप से घुसपैठ करके वर्ष 1938 यानी करीब अठासी साल पुराना जन्म प्रमाण पत्र भी डिजिटल माध्यम से तैयार कर दिया। पुलिस ने इस मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए गिरोह को संचालित करने वाले दो सगे भाइयों को गिरफ्तार किया है, जो इस पूरे अवैध तंत्र के मुख्य सूत्रधार थे।
इस गिरोह के काम करने के तरीके ने देश की डिजिटल सुरक्षा प्रणालियों की तकनीकी कमियों को पूरी तरह सामने रख दिया है। यह गिरोह देश भर के विभिन्न राज्यों की आधिकारिक वेबसाइटों और नगर निगमों के जन्म-मृत्यु पंजीकरण पोर्टलों के सुरक्षा घेरे को तोड़ने के लिए क्लोन वेबसाइट्स, फर्जी यूजर आईडी और चुराए गए क्रेडेंशियल्स का उपयोग करता था। गिरफ्तार किए गए दोनों भाई सॉफ्टवेयर और कंप्यूटर कोडिंग में माहिर थे, जिसका फायदा उठाकर वे असली जैसे दिखने वाले बारकोड और डिजिटल हस्ताक्षर युक्त जाली दस्तावेज मिनटों में तैयार कर लेते थे। इनके जनसेवा केंद्र पर आने वाले ग्राहकों को भनक तक नहीं लगती थी कि उन्हें जो सरकारी दस्तावेज मिल रहा है, वह किसी वैध सरकारी प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बल्कि एक डार्क वेब नेटवर्क के जरिए तैयार किया गया फर्जी कागज है।
इस बड़े भंडाफोड़ का सिलसिला तब शुरू हुआ जब खुफिया एजेंसियों को सीमावर्ती और संवेदनशील इलाकों से कुछ ऐसे इनपुट मिले कि कुछ संदिग्ध लोग अवैध रूप से भारतीय नागरिकता और पासपोर्ट हासिल करने के लिए बहुत पुराने जन्म प्रमाण पत्रों का सहारा ले रहे हैं। जांच दल ने जब हाल ही में जारी हुए कुछ अस्वाभाविक जन्म प्रमाण पत्रों के डेटाबेस की गहराई से स्क्रूटनी की, तो वे दंग रह गए। डेटाबेस में एक ऐसे व्यक्ति का ऑनलाइन जन्म प्रमाण पत्र दर्ज पाया गया जिसका जन्म देश की आजादी से भी पहले, साल 1938 में दिखाया गया था, जबकि उस दौर में ऐसी कोई डिजिटल केंद्रीय व्यवस्था मौजूद ही नहीं थी। इस सुराग को पकड़कर जब साइबर फॉरेंसिक विशेषज्ञों ने आईपी एड्रेस और इंटरनेट लॉग्स को ट्रैक किया, तो इस फर्जीवाड़े के तार सीधे इस जनसेवा केंद्र से जुड़े पाए गए, जिसके बाद पुलिस ने बिना समय गंवाए छापेमारी की योजना बनाई।
पुलिस की छापेमारी के दौरान जनसेवा केंद्र के भीतर से जो सामग्रियां और सुराग मिले हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं। जांच टीम ने मौके से भारी मात्रा में उच्च क्षमता वाले कंप्यूटर, लैपटॉप, दर्जनों फर्जी सिम कार्ड, विभिन्न राज्यों के नगर निगमों की जाली मोहरें और सैकड़ों कूट रचित दस्तावेज बरामद किए हैं। इसके साथ ही इनके पास से एक विशेष सॉफ्टवेयर भी मिला है जो सरकारी क्यूआर कोड को हूबहू कॉपी करने की क्षमता रखता था। पूछताछ के दौरान यह बात सामने आई है कि ये दोनों भाई केवल स्थानीय स्तर पर ही नहीं, बल्कि देश के विभिन्न हिस्सों में फैले एजेंटों के एक बड़े नेटवर्क के संपर्क में थे। ये एजेंट देश के अलग-अलग राज्यों से जरूरतमंदों, अपराधियों और यहां तक कि अवैध प्रवासियों को ढूंढकर लाते थे जो अपनी उम्र बदलने या भारतीय पहचान पत्र बनवाने के लिए मोटी रकम देने को तैयार रहते थे।
इस पूरे नेटवर्क का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि इन फर्जी जन्म प्रमाण पत्रों का इस्तेमाल देश के अन्य सबसे महत्वपूर्ण पहचान पत्रों जैसे आधार कार्ड, पैन कार्ड और भारतीय पासपोर्ट बनवाने के मूल आधार के रूप में किया जा रहा था। चूंकि जन्म प्रमाण पत्र को किसी भी नागरिक की पहचान का पहला और सबसे प्रामाणिक दस्तावेज माना जाता है, इसलिए एक बार जब इस गिरोह द्वारा जाली बर्थ सर्टिफिकेट पोर्टल पर दर्ज कर दिया जाता था, तो उसके बाद अन्य सभी कानूनी दस्तावेज आसानी से बन जाते थे। इस प्रक्रिया के जरिए कई ऐसे अपराधियों और देश विरोधी तत्वों को भी नई पहचान मिलने की आशंका है जो अपनी पुरानी आपराधिक पृष्ठभूमि को छिपाकर समाज में खुलेआम घूम रहे थे। सुरक्षा एजेंसियां अब उन सभी लोगों के दस्तावेजों की सूची तैयार कर रही हैं जिन्होंने पिछले दो वर्षों में इस केंद्र के जरिए अपने प्रमाण पत्र बनवाए थे।
स्थानीय जिला प्रशासन और पुलिस के आला अधिकारियों ने इस गंभीर मामले को देखते हुए पूरे जिले में संचालित होने वाले सभी जनसेवा केंद्रों और कंप्यूटर कैफे की आकस्मिक जांच के कड़े आदेश जारी कर दिए हैं। प्रशासन का मानना है कि इस तरह के संवेदनशील मामलों में केवल संचालकों की गिरफ्तारी ही काफी नहीं है, बल्कि उस पूरे तकनीकी लूपहोल को भी ठीक करना होगा जिसके कारण ये अपराधी सरकारी सर्वर तक पहुंच बनाने में कामयाब रहे। इसके साथ ही, सूचना प्रौद्योगिकी विभाग को भी पत्र लिखकर इस सुरक्षा चूक के बारे में अवगत कराया गया है ताकि भविष्य में सिविल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के पोर्टल को टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन और बायोमेट्रिक सत्यापन जैसे सुरक्षा उपायों के जरिए और अधिक सुरक्षित और अभेद्य बनाया जा सके।
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