Sambhal: बिना मान्यता वाले मदरसों पर रोक नहीं, इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले का उलेमाओं ने किया स्वागत। 

इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा बिना मान्यता के मदरसों के संचालन पर रोक न लगाए जाने के अहम फैसले का उलेमाओं ने स्वागत किया है। इस फैसले को शिक्षा

Jan 20, 2026 - 17:33
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Sambhal: बिना मान्यता वाले मदरसों पर रोक नहीं, इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले का उलेमाओं ने किया स्वागत। 
मुफ्ती आलम रज़ा नूरी, धर्मगुरु , मौलाना वसी अशरफ, धर्मगुरु

उवैस दानिश, सम्भल 

इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा बिना मान्यता के मदरसों के संचालन पर रोक न लगाए जाने के अहम फैसले का उलेमाओं ने स्वागत किया है। इस फैसले को शिक्षा के अधिकार और संविधान की भावना के अनुरूप बताते हुए धार्मिक विद्वानों ने इसे न्यायपालिका का संतुलित और सराहनीय कदम बताया।

इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए मौलाना वसी अशरफ ने कहा कि यह फैसला पूरी तरह स्वागत योग्य है। उन्होंने कहा कि जो मदरसे सरकार से किसी प्रकार की आर्थिक सहायता नहीं लेते, उन्हें चलाने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इससे सरकार का बोझ भी कम होता है और गरीब बच्चों को शिक्षा का अवसर मिलता है। मौलाना वसी अशरफ ने कहा कि मदरसों में न तो पढ़ाई की फीस ली जाती है और न ही खाने की, बल्कि समाज के हमदर्द लोग दान देकर इन्हें संचालित करते हैं। उन्होंने मदरसों पर लगाए जाने वाले उग्रवाद के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि ये निराधार और झूठे हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि मरकज़ी मदरसा अहले सुन्नत अजमल उलूम से पढ़े कई छात्र आज एसडीएम, वकील, डॉक्टर और सरकारी शिक्षक के पदों पर कार्यरत हैं। उन्होंने कहा कि जब-जब इल्म फैलेगा, देश और इंसानियत दोनों तरक्की करेंगे।

वहीं मुफ्ती आलम रज़ा नूरी ने भी इस फैसले का दिल की गहराइयों से स्वागत किया। उन्होंने कहा कि मुसलमानों को हमेशा न्यायपालिका पर भरोसा रहा है और वे हर अदालत के फैसले का सम्मान करते आए हैं। आगे कहा कि मदरसों को गलत नजर से देखा जाना दुर्भाग्यपूर्ण है, जबकि मदरसे इंसानियत, नैतिकता और देशभक्ति की शिक्षा देते हैं। मदरसों में बच्चों को भारतीय संविधान के बारे में भी बताया जाता है और उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनाया जाता है। उन्होंने शिक्षा को हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार बताते हुए कहा कि किसी को भी तालीम से वंचित नहीं किया जा सकता। “इल्म रोशनी है और जहालत अंधेरा,” कहते हुए उन्होंने अभिभावकों से अपील की कि चाहे आधी रोटी खानी पड़े, लेकिन बच्चों को जरूर पढ़ाएं। उलेमाओं का कहना है कि हाई कोर्ट का यह फैसला न सिर्फ संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करता है, बल्कि समाज के कमजोर वर्गों को शिक्षा से जोड़ने की दिशा में भी एक मजबूत कदम है।

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