सोमनाथ मंदिर: 17 बार विध्वंस के बावजूद अटूट श्रद्धा से बार-बार पुनर्निर्माण, महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने उसी स्थान पर कराया निर्माण।

सोमनाथ मंदिर, जो गुजरात के प्रभास पाटन में अरब सागर तट पर स्थित है और बारह ज्योतिर्लिंगों में पहला माना जाता है, अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व

Jan 12, 2026 - 14:29
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सोमनाथ मंदिर: 17 बार विध्वंस के बावजूद अटूट श्रद्धा से बार-बार पुनर्निर्माण, महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने उसी स्थान पर कराया निर्माण।
सोमनाथ मंदिर: 17 बार विध्वंस के बावजूद अटूट श्रद्धा से बार-बार पुनर्निर्माण, महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने उसी स्थान पर कराया निर्माण।

By Sukhmaal Jain(Senior Journalist & Social Activist)

सोमनाथ मंदिर, जो गुजरात के प्रभास पाटन में अरब सागर तट पर स्थित है और बारह ज्योतिर्लिंगों में पहला माना जाता है, अपनी ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व के कारण प्रसिद्ध है। मंदिर को कई बार नष्ट किया गया लेकिन हर बार भक्तों और शासकों द्वारा पुनर्निर्मित किया गया। लोकप्रिय कथाओं और कुछ स्रोतों में कहा जाता है कि मंदिर को 17 बार तोड़ा गया और हर बार पुनर्निर्माण हुआ। यह संख्या मुख्य रूप से मध्यकालीन आक्रमणों और बाद की घटनाओं को मिलाकर बताई जाती है जहां मंदिर की संपत्ति लूटी गई और संरचना को क्षति पहुंचाई गई।

मंदिर का इतिहास प्राचीन काल से जुड़ा है जहां महाभारत और भागवत पुराण जैसे ग्रंथों में प्रभास क्षेत्र का उल्लेख है। पुरातात्विक साक्ष्य प्रारंभिक मंदिर के बारे में स्पष्ट नहीं हैं लेकिन मंदिर स्थल पर प्राचीन बस्ती के प्रमाण मिले हैं। पहला प्रमुख विध्वंस 1026 में महमूद गजनवी द्वारा किया गया जब उन्होंने मंदिर पर आक्रमण कर ज्योतिर्लिंग को तोड़ा और भारी मात्रा में धन लूटा। इस आक्रमण के बाद मंदिर को जल्द ही पुनर्निर्मित किया गया और 1038 तक तीर्थयात्रा जारी रही।

12वीं शताब्दी में चालुक्य वंश के कुमारपाल ने मंदिर को पत्थर से भव्य रूप में बनवाया और इसमें रत्न जड़वाए। 13वीं शताब्दी में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति उलूग खान ने 1299 में गुजरात पर आक्रमण के दौरान मंदिर को लूटा और क्षति पहुंचाई। 1395 में जफर खान या मुजफ्फर शाह प्रथम ने मंदिर को तीसरी बार नष्ट किया। 15वीं शताब्दी में महमूद बेगड़ा ने भी मंदिर को क्षति पहुंचाई।

16वीं शताब्दी में पुर्तगालियों द्वारा भी मंदिर पर हमला किया गया। 17वीं और 18वीं शताब्दी में औरंगजेब ने मंदिर को नष्ट करने और उसे मस्जिद में बदलने का प्रयास किया जिसके बाद मंदिर की स्थिति और खराब हुई। इन सभी घटनाओं को मिलाकर कुछ कथाओं में 17 बार विध्वंस का उल्लेख मिलता है जिसमें बार-बार लूट और क्षति को गिना जाता है। हालांकि ऐतिहासिक स्रोतों में प्रमुख विध्वंस चार से छह बार दर्ज हैं लेकिन लोक परंपरा और कुछ ग्रंथों में संख्या अधिक बताई जाती है।

हर विध्वंस के बाद मंदिर का पुनर्निर्माण हुआ। महमूद गजनवी के बाद कुछ वर्षों में ही मंदिर बहाल हुआ। कुमारपाल के पुनर्निर्माण के बाद भी आगे के शासकों ने इसे संरक्षित रखा। 18वीं शताब्दी में मंदिर की स्थिति बहुत खराब होने पर महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने 1782-1783 में व्यक्तिगत खर्च से उसी स्थान के निकट एक नया मंदिर बनवाया। यह मंदिर छोटा लेकिन पत्थर का था और ज्योतिर्लिंग की पूजा जारी रखने के लिए बनाया गया था ताकि भक्त बिना रुकावट के दर्शन कर सकें। अहिल्याबाई का यह प्रयास मंदिर की निरंतरता बनाए रखने में महत्वपूर्ण साबित हुआ।

अहिल्याबाई द्वारा बनवाया गया मंदिर आज भी पुराना सोमनाथ के नाम से जाना जाता है और वर्तमान मंदिर से लगभग 200 मीटर दूर स्थित है। यह मंदिर 19वीं और 20वीं शताब्दी तक मुख्य पूजा स्थल रहा। महाराजा रणजीत सिंह ने भी मंदिर के शिखर पर सोना चढ़वाया। स्वतंत्रता के बाद 1947 में सरदार वल्लभभाई पटेल ने मंदिर के पुनर्निर्माण का आदेश दिया। 1951 में वर्तमान मंदिर मारु-गुर्जर शैली में पूरा हुआ और राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने प्रतिष्ठा की।

यह मंदिर आज भी लाखों श्रद्धालुओं का केंद्र है। हाल के वर्षों में 2026 में 1026 के महमूद गजनवी आक्रमण की 1000 वर्षगांठ पर सोमनाथ स्वाभिमान पर्व मनाया गया जिसमें मंदिर की अटूट श्रद्धा और पुनर्निर्माण की कहानी को रेखांकित किया गया। मंदिर का इतिहास विध्वंस और पुनर्निर्माण का चक्र दर्शाता है जहां हर बार भक्तों की आस्था ने इसे जीवित रखा।

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