केदारनाथ तक 7 किमी लंबी सुरंग बनाने की तैयारी, हर मौसम में आसान होगी यात्रा, 4-5 साल में बनकर तैयार होगा नया रास्ता।
Kedarnath Dham: केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने उत्तराखंड के पवित्र तीर्थ स्थल केदारनाथ धाम तक पहुंच को आसान बनाने के लिए एक महत्वाकांक्षी...
केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने उत्तराखंड के पवित्र तीर्थ स्थल केदारनाथ धाम तक पहुंच को आसान बनाने के लिए एक महत्वाकांक्षी परियोजना की घोषणा की है। इस परियोजना के तहत गौरीकुंड से केदारनाथ मंदिर तक 7 किलोमीटर लंबी सड़क सुरंग बनाई जाएगी। यह सुरंग न केवल यात्रा के समय को कम करेगी, बल्कि हर मौसम में श्रद्धालुओं को मंदिर तक सुरक्षित और आसान पहुंच प्रदान करेगी। वर्तमान में गौरीकुंड से रामबाड़ा और लिंचोली होते हुए केदारनाथ तक का पैदल मार्ग 16 से 23 किलोमीटर लंबा है, जो मौसम और भूस्खलन के कारण कई बार जोखिम भरा हो जाता है। नई सुरंग बनने के बाद यह दूरी घटकर लगभग 5 किलोमीटर रह जाएगी। यह परियोजना अगले 4-5 वर्षों में पूरी होने की उम्मीद है, जिससे केदारनाथ मंदिर तक दो रास्ते उपलब्ध होंगे।
केदारनाथ धाम, चार धामों में से एक, हर साल लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। यह उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में 3,583 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। वर्तमान में, गौरीकुंड से केदारनाथ तक का रास्ता पैदल है, जिसमें श्रद्धालुओं को खड़ी चढ़ाई, ठंड, और बारिश का सामना करना पड़ता है। बरसात के मौसम में भूस्खलन और बाढ़ के कारण यह मार्ग कई बार बंद हो जाता है, जैसा कि 2013 की आपदा में देखा गया था। उस आपदा में हजारों लोग मारे गए थे, और यात्रा मार्ग को भारी नुकसान हुआ था।
केंद्र सरकार की यह 7 किलोमीटर लंबी सुरंग परियोजना इस समस्या का स्थायी समाधान लाने का प्रयास है। यह सुरंग हर मौसम में मंदिर तक पहुंच को सुनिश्चित करेगी, जिससे श्रद्धालुओं को बारिश, बर्फबारी, या भूस्खलन की चिंता नहीं रहेगी। इसके अलावा, यह परियोजना स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देगी, क्योंकि आसान पहुंच से पर्यटकों और तीर्थयात्रियों की संख्या में वृद्धि होगी।
7 किलोमीटर लंबी यह सुरंग गौरीकुंड से शुरू होकर केदारनाथ मंदिर के पास समाप्त होगी। इसका डिज़ाइन इस तरह तैयार किया जा रहा है कि यह पहाड़ी क्षेत्र की भौगोलिक और पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना कर सके। सीएसआईआर-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (सीआरआरआई) के विशेषज्ञों की देखरेख में इसका तकनीकी अध्ययन किया जा रहा है। सुरंग में वाहनों के लिए पर्याप्त जगह होगी, और यह पैदल यात्रियों के लिए भी सुरक्षित होगी। इसमें आधुनिक वेंटिलेशन सिस्टम, आपातकालीन निकास, और प्रकाश व्यवस्था जैसी सुविधाएं होंगी।
सुरंग का निर्माण भूस्खलन और भूकंप के जोखिम को ध्यान में रखकर किया जाएगा। उत्तराखंड भूकंपीय क्षेत्र में आता है, इसलिए सुरंग की संरचना को भूकंपरोधी बनाया जाएगा। इसके अलावा, पर्यावरण संरक्षण के लिए निर्माण के दौरान न्यूनतम वृक्षों की कटाई और मलबे का उचित निपटान सुनिश्चित किया जाएगा।
वर्तमान में, केदारनाथ मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को गौरीकुंड से पैदल यात्रा करनी पड़ती है। यह मार्ग 16 से 23 किलोमीटर लंबा है, जो मौसम और मार्ग की स्थिति के आधार पर बदलता रहता है। गौरीकुंड से रामबाड़ा और लिंचोली होते हुए मंदिर तक पहुंचने में 6 से 8 घंटे लगते हैं। खड़ी चढ़ाई और ऊंचाई के कारण यह यात्रा बुजुर्गों और बच्चों के लिए कठिन होती है। बरसात में भूस्खलन और बाढ़ के कारण मार्ग बंद होने का खतरा रहता है, जिससे श्रद्धालुओं को भारी परेशानी होती है।
2013 की केदारनाथ आपदा के बाद सरकार ने यात्रा मार्ग को बेहतर बनाने के लिए कई कदम उठाए, जैसे नए रास्ते बनाना, रेलिंग लगाना, और विश्राम स्थल बनाना। हालांकि, मौसम की अनिश्चितता और भूस्खलन की समस्या अब भी बनी हुई है। नई सुरंग इन सभी समस्याओं का समाधान करेगी, क्योंकि यह पहाड़ के अंदर से गुजरेगी और मौसम के प्रभाव से मुक्त रहेगी।
केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने इस परियोजना को 4-5 साल में पूरा करने का लक्ष्य रखा है। इसका मतलब है कि 2029-30 तक यह सुरंग बनकर तैयार हो सकती है। परियोजना की अनुमानित लागत 1,500 से 2,000 करोड़ रुपये के बीच हो सकती है, हालांकि इसका अंतिम आंकड़ा तकनीकी सर्वेक्षण और डिज़ाइन के बाद ही स्पष्ट होगा। यह परियोजना केंद्रीय सड़क और अवसंरचना कोष (सीआरआईएफ) के तहत वित्तपोषित होगी, जो राष्ट्रीय राजमार्गों और महत्वपूर्ण सड़क परियोजनाओं के लिए धन उपलब्ध कराता है।
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) इस परियोजना का नेतृत्व करेगा, और निर्माण कार्य में निजी क्षेत्र की कंपनियों की भागीदारी भी हो सकती है। मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि परियोजना को समय पर पूरा करने के लिए सभी संसाधनों का उपयोग किया जाएगा।
इस सुरंग के निर्माण से स्थानीय समुदाय को कई लाभ होंगे। सबसे पहले, यह क्षेत्र पर्यटन के लिए और अधिक आकर्षक बनेगा, जिससे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। होटल, रेस्तरां, और परिवहन सेवाओं से जुड़े व्यवसायों को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही, आपातकालीन स्थिति में मेडिकल सेवाओं और राहत सामग्री को तेजी से मंदिर क्षेत्र तक पहुंचाया जा सकेगा।
हालांकि, पर्यावरणविदों ने इस परियोजना को लेकर कुछ चिंताएं जताई हैं। केदारनाथ क्षेत्र हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी का हिस्सा है, और बड़े पैमाने पर निर्माण से पर्यावरण को नुकसान हो सकता है। भूस्खलन, मलबे का निपटान, और जैव विविधता पर प्रभाव जैसे मुद्दों को ध्यान में रखना होगा। मंत्रालय ने आश्वासन दिया है कि पर्यावरणीय प्रभाव आकलन (ईआईए) और विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर ही निर्माण कार्य शुरू होगा।
इस परियोजना की घोषणा के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने इसे लेकर उत्साह दिखाया है। @news24tvchannel ने 23 जुलाई, 2025 को पोस्ट किया, “केदारनाथ तक 7 किलोमीटर लंबी सुरंग बनाने की तैयारी, जिससे यात्रा आसान और सुरक्षित होगी।” कई यूजर्स ने इसे श्रद्धालुओं के लिए एक ऐतिहासिक कदम बताया, जबकि कुछ ने पर्यावरणीय चिंताओं पर ध्यान देने की मांग की। @VishalPal129612 ने लिखा, “यह सुरंग केदारनाथ यात्रा को बदल देगी, लेकिन निर्माण में पर्यावरण का ध्यान रखना जरूरी है।”
केदारनाथ सुरंग परियोजना भारत में सड़क सुरंगों के निर्माण की दिशा में एक और कदम है। इससे पहले, 2017 में जम्मू-श्रीनगर को जोड़ने वाली 9 किलोमीटर लंबी चेनानी-नाशरी सुरंग को राष्ट्र को समर्पित किया गया था, जिसने यात्रा समय को दो घंटे तक कम कर दिया था। इसी तरह, अटल टनल और जोजिला टनल जैसी परियोजनाओं ने हिमालयी क्षेत्रों में कनेक्टिविटी को बेहतर बनाया है। केदारनाथ सुरंग इन परियोजनाओं की तर्ज पर एक और मील का पत्थर होगी।
केंद्र सरकार ने चार धाम यात्रा को और सुगम बनाने के लिए कई कदम उठाए हैं। चार धाम राजमार्ग परियोजना के तहत 900 किलोमीटर से अधिक सड़कों का चौड़ीकरण और मजबूतीकरण किया जा रहा है। इसके अलावा, रेलवे और हवाई सेवाओं को भी बेहतर किया जा रहा है। केदारनाथ सुरंग इस व्यापक योजना का हिस्सा है, जो तीर्थयात्रा और पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ-साथ क्षेत्रीय विकास को गति देगी।
इस सुरंग के बनने से केदारनाथ यात्रा का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा। यह न केवल श्रद्धालुओं के लिए सुविधाजनक होगा, बल्कि आपदा प्रबंधन और स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण साबित होगा। हालांकि, परियोजना को समय पर और पर्यावरणीय मानकों के साथ पूरा करना एक बड़ी चुनौती होगी। सरकार को स्थानीय समुदाय, पर्यावरणविदों, और विशेषज्ञों के साथ मिलकर काम करना होगा ताकि यह परियोजना सभी के लिए लाभकारी हो।
केदारनाथ तक 7 किलोमीटर लंबी सुरंग परियोजना एक ऐतिहासिक कदम है, जो श्रद्धालुओं की यात्रा को आसान, सुरक्षित, और हर मौसम में संभव बनाएगी। यह परियोजना अगले 4-5 वर्षों में पूरी होने की उम्मीद है, और इससे केदारनाथ मंदिर तक दो रास्ते उपलब्ध होंगे। गौरीकुंड से मंदिर तक की दूरी 16-23 किलोमीटर से घटकर 5 किलोमीटर रह जाएगी, जिससे यात्रा समय और जोखिम दोनों कम होंगे। हालांकि, पर्यावरणीय और तकनीकी चुनौतियों का सामना करने के लिए सावधानीपूर्वक योजना जरूरी है। यह परियोजना न केवल धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देगी, बल्कि उत्तराखंड के विकास में भी योगदान देगी।
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