Politics: चिराग पासवान का बिहार विधानसभा चुनाव में उतरने का ऐलान- 'बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट' का सपना साकार करने की कवायद।
बिहार के नालंदा जिले के राजगीर में आयोजित 'बहुजन भीम संकल्प समागम' में लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष और...
बिहार के नालंदा जिले के राजगीर में आयोजित 'बहुजन भीम संकल्प समागम' में लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष और केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री चिराग पासवान ने एक महत्वपूर्ण घोषणा की। उन्होंने स्पष्ट किया कि वह आगामी बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में हिस्सा लेंगे, ताकि उनका विजन 'बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट' साकार हो सके। यह रैली मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के गृह जिले नालंदा में आयोजित की गई थी, जिसने इस घोषणा को और भी महत्वपूर्ण बना दिया। चिराग ने कहा, "कई लोग इस बात से घबराए हुए हैं कि मैं बिहार आना चाहता हूं। वे जानना चाहते हैं कि क्या मैं यहां चुनाव लड़ूंगा। मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि मैं बिहार के लिए विधानसभा चुनाव लड़ना चाहता हूं।" यह घोषणा न केवल बिहार की राजनीति में हलचल मचाने वाली है, बल्कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर भी नए समीकरण पैदा कर सकती है।
- चिराग पासवान की घोषणा
चिराग पासवान, जो हाजीपुर से सांसद और अपने पिता स्वर्गीय रामविलास पासवान की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं, ने राजगीर में आयोजित इस रैली में बिहार की जनता को अपना परिवार बताते हुए भावनात्मक अपील की। उन्होंने कहा, "मेरे पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं। जिन्हें मेरा परिवार होना चाहिए था, उन्होंने मुझे घर से निकाल दिया। अब बिहार की जनता ही मेरा परिवार है।" यह बयान उनके चाचा पशुपति पारस के साथ हुए पारिवारिक और राजनीतिक विवाद की ओर इशारा करता है, जिसके बाद 2021 में लोक जनशक्ति पार्टी में विभाजन हो गया था।
चिराग ने अपनी रैली में विपक्षी दलों, विशेष रूप से राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और कांग्रेस, पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरजेडी नेता तेजस्वी यादव से सवाल किया कि वे उन कांग्रेस नेताओं का समर्थन कैसे कर सकते हैं, जिन्होंने आपातकाल के दौरान उनके पिता लालू प्रसाद यादव के साथ दुर्व्यवहार किया था। चिराग ने कहा, "राहुल गांधी को आपातकाल के लिए माफी मांगनी चाहिए।" उन्होंने यह भी जोर दिया कि विपक्ष का यह दावा कि एनडीए संविधान को खतरे में डालेगा, पूरी तरह झूठा है।
चिराग ने अपनी रैली में बिहार के विकास और सामाजिक न्याय पर जोर दिया। उन्होंने कहा, "बिहार को नंबर 1 राज्य बनाने और बिहारियों को नंबर 1 बनाने के लिए सभी बिहारियों को मेरे साथ चिराग पासवान बनना होगा। मैं सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ूंगा, और जहां भी गठबंधन के साथी होंगे, मैं वहां चिराग पासवान के रूप में लड़ूंगा।" यह बयान उनकी महत्वाकांक्षा को दर्शाता है कि वह न केवल अपनी पार्टी की उपस्थिति को मजबूत करना चाहते हैं, बल्कि एनडीए को बिहार में और मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना चाहते हैं।
चिराग पासवान की यह घोषणा उनकी 8 जून 2025 को आरा में आयोजित 'नव संकल्प सभा' के बाद दूसरी बड़ी रैली थी, जहां उन्होंने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ने की मंशा जाहिर की थी। उनकी पार्टी, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास), ने 2024 के लोकसभा चुनाव में बिहार की पांच सीटों—हाजीपुर, वैशाली, जमुई, समस्तीपुर, और खगड़िया—पर 100% स्ट्राइक रेट के साथ जीत हासिल की थी। यह प्रदर्शन चिराग को बिहार की राजनीति में एक उभरते हुए दलित और युवा नेता के रूप में स्थापित करता है।
चिराग का 'बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट' का नारा उनके पिता रामविलास पासवान की केंद्रीय राजनीति से अलग, बिहार-केंद्रित राजनीति की दिशा में एक स्पष्ट बदलाव दर्शाता है। रामविलास पासवान को 'मौसम वैज्ञानिक' कहा जाता था, क्योंकि वे सियासी हवा का रुख भांपकर गठबंधन बदलते थे। लेकिन चिराग ने स्पष्ट किया कि उनकी प्राथमिकता बिहार है, और वे केंद्र की राजनीति में सीमित नहीं रहना चाहते। इस घोषणा ने एनडीए के भीतर भी हलचल मचा दी है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के साथ चिराग की पार्टी एनडीए का हिस्सा है। लेकिन चिराग का विधानसभा चुनाव में उतरने का फैसला और उनकी सक्रियता ने जेडीयू के भीतर असहजता पैदा की है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि चिराग की यह रणनीति एनडीए में सीट-बंटवारे के दौरान अपनी पार्टी के लिए अधिक सीटें हासिल करने का दबाव बनाने की कोशिश है।
- एनडीए में तनाव और सीट-बंटवारे की चुनौती
बिहार विधानसभा चुनाव 2025, जो अक्टूबर या नवंबर में होने की संभावना है, में एनडीए नीतीश कुमार के नेतृत्व में चुनाव लड़ने की घोषणा कर चुका है। लेकिन चिराग की सक्रियता और उनकी पार्टी की मांग कि वे 40 सीटों पर चुनाव लड़ें, ने गठबंधन के भीतर तनाव को बढ़ा दिया है। बीजेपी और जेडीयू, दोनों ही 100 से अधिक सीटों पर दावा कर रहे हैं, जबकि चिराग की पार्टी को 30 से अधिक सीटें मिलने की संभावना कम है।
चिराग ने स्पष्ट किया कि उनका लक्ष्य मुख्यमंत्री बनना नहीं है, बल्कि उनकी पार्टी का स्ट्राइक रेट बढ़ाकर एनडीए को मजबूत करना है। उन्होंने कहा, "मेरा चुनाव लड़ना केवल मेरी पार्टी के लिए बेहतर स्ट्राइक रेट सुनिश्चित करेगा, जो एनडीए की मदद करेगा।" लेकिन उनकी यह घोषणा और नालंदा जैसे नीतीश के गढ़ में रैली आयोजित करना जेडीयू के लिए एक चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है। चिराग पासवान ने अपनी रैली में सामाजिक न्याय और समानता पर जोर दिया। उन्होंने दलित आइकन डॉ. बी. आर. आंबेडकर का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी पार्टी हमेशा बहुजनों के अधिकारों और सम्मान के लिए लड़ेगी। उन्होंने विपक्ष पर यह भी आरोप लगाया कि 1990 के दशक में लालू प्रसाद यादव की सरकार ने बिहारियों को पलायन के लिए मजबूर किया था। चिराग ने कहा, "लालू के परिवार ने नौकरियां दीं, लेकिन गरीबों, पिछड़ों, और बहुजनों की जमीन छीन ली।"
चिराग का 'बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट' का नारा बिहार की युवा और दलित आबादी को आकर्षित करने की रणनीति का हिस्सा है। बिहार में पासवान समुदाय, जो अनुसूचित जाति की सबसे बड़ी आबादी (लगभग 6%) का हिस्सा है, चिराग के लिए मजबूत वोट बैंक है। उनकी यह रणनीति न केवल उनकी पार्टी की पहुंच को दलितों से आगे बढ़ाने की कोशिश है, बल्कि सामान्य सीटों पर भी अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने का प्रयास है। विपक्षी महागठबंधन, जिसमें आरजेडी, कांग्रेस, और वाम दल शामिल हैं, ने चिराग की घोषणा को एनडीए के भीतर अस्थिरता के संकेत के रूप में देखा। आरजेडी प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कहा, "एनडीए में मुख्यमंत्री पद को लेकर पहले ही अराजकता शुरू हो गई है।" कांग्रेस सांसद मनोज कुमार ने भी कहा कि महागठबंधन में मुख्यमंत्री चेहरा को लेकर कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन एनडीए में चिराग की सक्रियता ने हलचल मचा दी है। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि चिराग की यह रणनीति उनकी पार्टी को बिहार में एक मजबूत क्षेत्रीय ताकत के रूप में स्थापित करने की कोशिश है। लेकिन अगर वह हार जाते हैं, तो उनकी केंद्रीय मंत्रिमंडल की स्थिति खतरे में पड़ सकती है, क्योंकि जेडीयू बीजेपी पर दबाव डाल सकती है।
चिराग पासवान का बिहार विधानसभा चुनाव में उतरने का ऐलान बिहार की राजनीति में एक नया मोड़ लाने वाला है। उनकी 'बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट' की सोच और सामाजिक न्याय की बात ने उन्हें युवा और दलित वोटरों के बीच लोकप्रिय बनाया है। लेकिन एनडीए के भीतर सीट-बंटवारे और नेतृत्व को लेकर तनाव उनकी राह को मुश्किल बना सकता है।
चिराग की यह रणनीति न केवल उनकी पार्टी की ताकत को बढ़ाने की कोशिश है, बल्कि यह बिहार के विकास और बिहारियों की अस्मिता को केंद्र में लाने का प्रयास भी है। नालंदा की रैली ने यह स्पष्ट कर दिया कि चिराग अब केवल अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे बिहार की राजनीति में एक नई पहचान बनाने की दिशा में बढ़ रहे हैं। बिहार की जनता अब यह देखने को उत्सुक है कि चिराग किस सीट से चुनाव लड़ेंगे और क्या वे अपने इस सपने को साकार कर पाएंगे।
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