Delhi Blast : क्या है सात डॉक्टरों के ‘हैंडलर’ बन जाने का रहस्य? फरीदाबाद-पुलवामा-दिल्ली का साजिशी नक्शा
जांचकर्ताओं ने जल्दी ही पाया कि यह सिर्फ एक सामान्य हादसा नहीं था क्योंकि विस्फोट में इस्तेमाल अमोनियम-नाइट्रेट जैसे रसायन मिले, कार के अंदर टयूमर वायरिं
नई दिल्ली: राजधानी के प्रतिष्ठित स्थल लाल किला के पास एक कार धमाका हुआ जिसने न सिर्फ एक इलाके को बल्कि कई राज्यों की सुरक्षा व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया। इस धमाके की गुत्थी अब तक सिर्फ कार और विस्फोटक तक सीमित नहीं रही है; जांच ने एक बड़े “व्हाइट कॉलर आतंक” मॉड्यूल का पता लगाया है जिसमें कम-से-कम सात डॉक्टरों की भूमिका सामने आ रही है। इस पूरे प्रकरण में जैश‑ए‑मोहम्मद का नाम भी जुड़ा हुआ दिख रहा है। इस खबर में हमने अब तक सामने आए तथ्यों को सरल भाषा में समझने की कोशिश की है।
इस पूरी जाँच की शुरुआत हुई उस रात से जब लाल किला मेट्रो स्टेशन के बाहर एक सफेद रंग की सेल्फ-ड्राइव कार (एक अनुमान के अनुसार Hyundai i20) सिग्नल पर धीमी गति से खड़ी थी और 6 : 52 बजे के लगभग उसमें धमाका हुआ। शुरुआती रिपोर्ट्स में नौ से बारह लोगों की मौत हुई और दो-तीस से अधिक घायल हुए।
जांचकर्ताओं ने जल्दी ही पाया कि यह सिर्फ एक सामान्य हादसा नहीं था क्योंकि विस्फोट में इस्तेमाल अमोनियम-नाइट्रेट जैसे रसायन मिले, कार के अंदर टयूमर वायरिंग व टाइमर के अवशेष मिले, और कार पार्किंग में करीब तीन घंटे खड़ी रही थी।
इसी दौरान हरियाणा के फरीदाबाद जिले के गाँव धौज-फतेहपुर तगा इलाके में अवैध तरीके से जमा किये गए करीब 2,900 किलो विस्फोटक एवं बम बनाने की सामग्री बरामद हुई। वह जगह अल‑फलाह यूनिवर्सिटी (फरीदाबाद) के करीब पड़ती थी और वहाँ के कुछ डॉक्टरों का नाम इस मॉड्यूल में सामने आया।
जांच में यह भी पता चला है कि इन चिकित्सकों ने पाकिस्तानी आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के प्रभाव में काम किया। उदाहरण के लिए- डॉ शाहीन सईद नामक महिला डॉक्टर पर आरोप है कि उन्होंने जैश-ए-मोहम्मद की महिला शाखा ‘जमात‑उल‑मुमिनात’ बनाने का काम सम्भाला था, और वे पाकिस्तानी हैंडलर्स से संपर्क में थीं।
मामले के प्रमुख पहलू इस तरह हैं :
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सात से अधिक डॉक्टरों की पहचान की जा रही है, जिनमें कुछ को गिरफ्तार किया गया है और कुछ अभी फरार हैं।
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डॉक्टरों का यह नेटवर्क सिर्फ चिकित्सा सेवा तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने विश्वविद्यालय-कैंपस, हॉस्पिटल, किराये के कमरे और पेशेवर परिसरों का इस्तेमाल लॉजिस्टिक, विस्फोटक निर्माण, भर्ती और आगे के साजिश-निर्धारण के लिए किया।
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पुलवामा (जम्मू-कश्मीर) के रहने वाले डॉ उमर मोहम्मद को इस मामले की मुख्य लिंक के रूप में देखा जा रहा है। उनकी कार वही थी जिसमें धमाका हुआ, और उन्होंने कार में बैठे-बिठाए विस्फोट ट्रिगर किया हो सकता है।
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कार ने फरीदाबाद-पुलवामा-दिल्ली का सफर तय किया है, जिसमें कई राज्यों की सीमाओं को पार किया गया। इस तरह एक राज्यपर्यंत निर्माण का नक्शा तैयार हुआ है।
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यूनिवर्सिटी परिसर और किराये के कमरे में रखे गए उपकरण ने यह संकेत दिया है कि पेशेवर थिंक-टैंक जैसी संस्था तैयार थी जो पढ़े-लिखे लोगों के माध्यम से आतंक का नेटवर्क चला रही थी।
इन बिंदुओं से स्पष्ट हो जाता है कि इस साजिश का केंद्र सिर्फ अपराध-तीव्रता नहीं बल्कि पेशेवर, शैक्षणिक व चिकित्सा क्षेत्र में फैली जड़ें थीं। इसलिए इसे ‘व्हाइट कॉलर आतंक’ कहा जा रहा है—जहाँ सामान्य दिखने वाले लोग भी संगठित अपराध की कड़ी बन जाते हैं।
इस घटना की समयरेखा इस प्रकार मानी जा रही है :
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पहले पुलवामा-कश्मीर के डॉक्टरों द्वारा फरीदाबाद-पंजीकृत कमरे में विस्फोटक जमा किये गए।
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फिर कार खरीद-बिक्री का जाल चला जिसमें वाहन कई बार हस्तांतरित हुआ।
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कार दिल्ली आई, पार्क की गई, और तीन-चार घंटे तक वहीं रही।
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बाद में कार सिग्नल पर खड़ी थी जब विस्फोट हुआ।
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कार्रवाई तुरंत हुई, विस्फोट से जुड़ी सामग्री बरामद हुई, डॉक्टर पकड़े गए, यूनिवर्सिटी परिसर में तलाशी हुई।
इसमें कई गंभीर सवाल उभर कर सामने आए हैं कि आखिर कैसे डॉक्टर-पेशेवर इस तरह की साजिश में शामिल हो गए? क्यों यूनिवर्सिटी का नाम जुड़ा? क्यों कार पार्किंग में इतनी देर खड़ी रही? इन सवालों के उत्तर के लिए एजेंसियाँ निम्न पर विशेष रूप से काम कर रही हैं:
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डॉक्टरों के बैंक लेन-देन, विदेश संचार, सोशल मीडिया कम्युनिकेशन ट्रेस किये जा रहे हैं।
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मेडिकल कॉलेज, हॉस्पिटल, यूनिवर्सिटी में प्रोफाइल देखने में आ रही है कि डॉक्टर ने किस तरह प्रेरणा ली, भर्ती की, किस तरह की नेटवर्किंग हुई।
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व्यापक रूट ट्रैकिंग : पुलवामा-कश्मीर में रहने वाले डॉक्टरों का फरीदाबाद-दिल्ली आने-जाने व गतिविधियों का हिसाब लिया जा रहा है।
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विस्फोटक सामग्री की फोरेंसिक जाँच, कार का इतिहास, वाहन पंजीकरण, उसके पिछले मालिक-हस्तांतरण की छान-बीन चल रही है।
इन खुलासों ने सुरक्षा जगत में नए रूप की चेतावनी जगा दी है कि अब सिर्फ बाहरी आतंक ही नहीं बल्कि सोशल-प्रोफेशनल लेयर में छिपे आतंकी भी सक्रिय हो सकते हैं। यह घटना दिखाती है कि कैसे डॉक्टर या शिक्षित व्यक्ति भी आतंक-साजिश की ‘हैंड्लर’ बन सकते हैं, जो पहचान में नहीं आते।
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