फतेहपुर हत्याकांड: साक्ष्यों के अभाव में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आरोपी को किया बरी
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि गवाहों के बयानों और मेडिकल रिपोर्ट में काफी अंतर है। चश्मदीद गवाहों ने घटनास्थल पर मौजूदगी को लेकर अलग-अलग बातें कहीं, जिससे उनकी मौजूदगी संदिग्ध लगी। गवाहों ने दावा
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फतेहपुर जिले के 40 साल पुराने एक चर्चित हत्याकांड के आरोपी को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया है। कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपों को पूरी तरह साबित करने में असफल रहा। यह मामला फतेहपुर के खागा थाना क्षेत्र का है, जहां जुलाई 1986 में कुंजल प्रसाद की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में निचली अदालत ने 1987 में आरोपियों को दोषी ठहराया था, जिसके खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की गई थी।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि गवाहों के बयानों और मेडिकल रिपोर्ट में काफी अंतर है। चश्मदीद गवाहों ने घटनास्थल पर मौजूदगी को लेकर अलग-अलग बातें कहीं, जिससे उनकी मौजूदगी संदिग्ध लगी। गवाहों ने दावा किया था कि तीन गोलियां चलाई गईं, जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में चार गोलियों के निशान मिले। इसके अलावा, गवाहों ने बताया कि गोली 7 से 10 कदम की दूरी से मारी गई, लेकिन डॉक्टर की रिपोर्ट के अनुसार एक गोली बिल्कुल सटाकर मारी गई थी।
कोर्ट ने यह भी गौर किया कि दोनों पक्षों के बीच पुरानी रंजिश थी, जिससे झूठा फंसाने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने सवाल उठाया कि यदि हमलावर बदला लेना चाहते थे, तो उन्होंने मौके पर मौजूद मृतक के बेटे को नुकसान क्यों नहीं पहुंचाया। इन सभी विरोधाभासों को देखते हुए कोर्ट ने माना कि जब साक्ष्य ही संदेहास्पद हों, तो सजा बरकरार नहीं रखी जा सकती। इसी आधार पर आरोपी जगदीश को बरी कर दिया गया और उसके जमानतदारों को भी जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया गया।
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