HC का विवादास्पद फैसला- 2005 में 16 वर्षीय पत्नी के साथ शारीरिक संबंध रेप नहीं, सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पूर्वव्यापी नहीं माना। 

HC ने हाल ही में एक ऐसे फैसले से पूरे देश को चौंका दिया है, जो बाल विवाह और यौन अपराधों के कानूनों पर सवाल खड़े कर रहा है। कोर्ट ने 2005 में एक 16 वर्षीय लड़की से शादी करने

Oct 19, 2025 - 16:25
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HC का विवादास्पद फैसला- 2005 में 16 वर्षीय पत्नी के साथ शारीरिक संबंध रेप नहीं, सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पूर्वव्यापी नहीं माना। 
HC का विवादास्पद फैसला- 2005 में 16 वर्षीय पत्नी के साथ शारीरिक संबंध रेप नहीं, सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पूर्वव्यापी नहीं माना। 

HC ने हाल ही में एक ऐसे फैसले से पूरे देश को चौंका दिया है, जो बाल विवाह और यौन अपराधों के कानूनों पर सवाल खड़े कर रहा है। कोर्ट ने 2005 में एक 16 वर्षीय लड़की से शादी करने और उसके साथ शारीरिक संबंध बनाने के आरोप में दोषी ठहराए गए व्यक्ति को बरी कर दिया। जस्टिस अनिल कुमार की एकलपीठ ने कहा कि घटना 2005 की है, जब लड़की 16 वर्ष से अधिक उम्र की थी। उस समय धारा 375 आईपीसी की अपवाद 2 के तहत पत्नी के साथ संबंध रेप नहीं माना जाता था। सुप्रीम कोर्ट का 2017 का स्वतंत्र विचार फैसला, जिसमें इस अपवाद को असंवैधानिक घोषित किया गया, कोर्ट ने पूर्वव्यापी प्रभाव वाला नहीं माना। इसलिए, आरोपी इस्लाम उर्फ पल्टू को धारा 363, 366 और 376 आईपीसी के तहत दोषमुक्त किया गया। यह फैसला 19 सितंबर 2025 को सुनाया गया, जो पीओसीएसओ एक्ट के सख्त प्रावधानों के बीच विवाद खड़ा कर रहा है।

मामला उत्तर प्रदेश के एक छोटे से इलाके से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता के पिता ने शिकायत दर्ज की कि आरोपी इस्लाम उर्फ पल्टू ने उनकी 16 वर्षीय मुस्लिम बेटी को बहला-फुसलाकर भगा लिया और उसके साथ दुष्कर्म किया। घटना 2005 में हुई, जब पीड़िता नाबालिग थी। चिकित्सकीय जांच से पता चला कि वह 16 वर्ष से अधिक लेकिन 18 से कम उम्र की थी। आरोपी ने शादी का दावा किया और कहा कि संबंध सहमति से बने। ट्रायल कोर्ट ने 2007 में आरोपी को अपहरण और बलात्कार के आरोप में दोषी ठहराया। सजा में सात वर्ष की कठोर कारावास दी गई। आरोपी ने हाईकोर्ट में अपील की, जो 18 वर्षों तक लंबित रही। हाईकोर्ट ने सबूतों की गहन जांच की। कोर्ट ने पाया कि अपहरण के लिए आवश्यक तत्व साबित नहीं हुए। पीड़िता आरोपी के साथ स्वेच्छा से गई थी, कोई धोखा या जबरदस्ती का प्रमाण नहीं मिला। इसी तरह, धारा 366 आईपीसी के तहत बहला-फुसलाने का कोई साक्ष्य नहीं था।

रेप के आरोप पर कोर्ट ने सबसे ज्यादा बहस की। धारा 375 आईपीसी अपवाद 2 कहती है कि 15 वर्ष या इससे अधिक उम्र की पत्नी के साथ पति का संबंध रेप नहीं है। 2012 में पीओसीएसओ एक्ट लागू होने के बाद यह प्रावधान चुनौती में आया। सुप्रीम कोर्ट ने 2017 के स्वतंत्र विचार बनाम भारत संघ मामले में इस अपवाद को असंवैधानिक घोषित किया। कोर्ट ने कहा कि यह अनुच्छेद 14, 15 और 21 का उल्लंघन करता है। पीओसीएसओ के प्रावधान आईपीसी पर हावी हैं। लेकिन HC ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला पूर्वव्यापी नहीं है। जस्टिस अनिल कुमार ने लिखा कि स्वतंत्र विचार फैसले में कहा गया है कि अपवाद 2 को पीओसीएसओ के साथ असंगत पाया गया। लेकिन यह बदलाव फैसले की तारीख से लागू होगा। 2005 की घटना पर पुराना कानून ही लागू होता है। इसलिए, आरोपी को रेप का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने पीसीआर एक्ट 2006 का भी जिक्र किया, लेकिन कहा कि यह भी पूर्वव्यापी नहीं है।

यह फैसला कानूनी बहस को नई ऊंचाई दे रहा है। बाल अधिकार कार्यकर्ता इसे पीछे की ओर कदम बता रहे हैं। उनका कहना है कि 16 वर्षीय लड़की की सहमति कानूनी रूप से अमान्य है। पीओसीएसओ एक्ट का उद्देश्य बच्चों को यौन शोषण से बचाना है। यहां शादी का दावा सहमति को वैध नहीं बनाता। एनजीओ वी द वुमेन ऑफ इंडिया जैसे संगठन सुप्रीम कोर्ट जाने की योजना बना रहे हैं। वे कहते हैं कि ऐसे फैसले बाल विवाह को बढ़ावा देते हैं। भारत में हर घंटे 23 बाल विवाह होते हैं, ज्यादातर लड़कियों के। यूनिसेफ के अनुसार, 27 प्रतिशत लड़कियां 18 वर्ष से पहले शादी कर लेती हैं। उत्तर प्रदेश में यह दर सबसे अधिक है। फैसले से बचने के लिए परिवार अदालतों का रास्ता अपनाते हैं। लेकिन कानून विशेषज्ञों का मत है कि हाईकोर्ट सही है। कानून पूर्वव्यापी नहीं होते जब तक स्पष्ट न कहा जाए। सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में यही सिद्धांत अपनाया है। उदाहरण के लिए, 2024 में कलकत्ता हाईकोर्ट के एक फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया, जहां सहमति वाले किशोर संबंध को पीओसीएसओ से छूट दी गई थी।

इस मामले में पीड़िता की भूमिका भी चर्चा में है। ट्रायल के दौरान वह गवाह बनी, लेकिन बाद में शादी का समर्थन किया। चिकित्सकीय सबूतों से उम्र साबित हुई। आरोपी के वकील मयंक भushan ने तर्क दिया कि 18 वर्ष बाद शादी वैध हो गई। राज्य की ओर से कोई विरोध नहीं हुआ। कोर्ट ने कहा कि घटना पुरानी है, लंबी लाइन में न्याय में देरी न्याय से इंकार है। अपील कोर्ट ने सजा रद्द कर दी। यह फैसला अन्य पुराने मामलों पर असर डाल सकता है। कई अपीलें लंबित हैं, जहां 2005-2017 के बीच घटनाएं हैं। लेकिन नया मामला अलग होगा। 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने किशोरों के सहमति संबंधों पर दिशानिर्देश जारी किए। कहा कि रोमांटिक मामलों में सजा पर पुनर्विचार हो सकता है, लेकिन अपराध समाप्त नहीं। बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी कहा कि शादी बाद में पीओसीएसओ को रद्द नहीं कर सकती।

बाल विवाह कानून भारत में सख्त हैं। हिंदू विवाह एक्ट में लड़कियों की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष है। मुस्लिम पर्सनल लॉ में भी अब यही लागू। पीओसीएसओ 2012 से बच्चों को संरक्षण देता है। धारा 3 और 5 के तहत 18 वर्ष से कम उम्र के साथ संबंध गंभीर अपराध है। सजा 10 वर्ष से आजीवन। लेकिन अपवादों ने बहस छेड़ी। स्वतंत्र विचार फैसले ने अपवाद 2 हटा दिया, लेकिन पूर्व मामलों पर असर नहीं। HC ने इसे दोहराया। जस्टिस ने लिखा कि पीओसीएसओ आईपीसी से ऊपर है, लेकिन समय सीमा महत्वपूर्ण है। यह फैसला संविधान के समानता सिद्धांत को मजबूत करता है। लेकिन सामाजिक रूप से विवादास्पद है। वकील इंदिरा जयसिंह ने कहा कि यह लड़कियों की सुरक्षा कमजोर करता है। पुरुषों को पुराने अपराधों से छूट मिल सकती है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने बाल विवाह रोकने के लिए अभियान चलाए हैं। 2025 में 5000 से अधिक मामले दर्ज हुए। लेकिन सजा दर कम है। फैसले से जागरूकता बढ़ेगी। परिवारों को समझना होगा कि कानून बदल चुका है। लड़कियों की शिक्षा और स्वास्थ्य प्रभावित होता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन कहता है कि 15-19 वर्ष की लड़कियां गर्भावस्था से मरती हैं। भारत में हर साल 1.2 लाख ऐसी मौतें। फैसला कानूनी है, लेकिन नैतिक सवाल उठाता है। क्या सहमति उम्र पर निर्भर? किशोरों के अधिकार क्या? सुप्रीम कोर्ट को इस पर बड़ा फैसला लेना होगा। फिलहाल, आरोपी आजाद है। पीड़िता का क्या? कोर्ट ने नहीं कहा। समाज को सोचना होगा।

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