बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 से पहले नया मोड़: बाबरी मस्जिद के मुद्दे पर ध्रुवीकरण की राजनीति तेज, सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस समय एक नया और बेहद संवेदनशील मोड़ आ गया जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के निलंबित
- 'कोई ताकत नहीं रोक सकती बाबरी का निर्माण'- मुर्शिदाबाद में मस्जिद की नींव रखने के बाद एजेयूपी प्रमुख हुमायूं कबीर का खुला चैलेन्ज
पश्चिम बंगाल की राजनीति में उस समय एक नया और बेहद संवेदनशील मोड़ आ गया जब तृणमूल कांग्रेस (TMC) के निलंबित विधायक और 'आम जनता उन्नयन पार्टी' (AJUP) के संस्थापक हुमायूं कबीर ने राज्य में बाबरी मस्जिद के निर्माण को लेकर अपना विवादित वादा एक बार फिर सार्वजनिक रूप से दोहराया। मुर्शिदाबाद के बेलडांगा इलाके में एक जनसभा को संबोधित करते हुए कबीर ने अत्यंत कड़े शब्दों में कहा कि बंगाल की धरती पर बाबरी मस्जिद के तर्ज पर एक भव्य मस्जिद का निर्माण होकर रहेगा और दुनिया की कोई भी ताकत इस काम को रोकने में सफल नहीं हो पाएगी। उनके इस बयान ने राज्य के राजनीतिक वातावरण में गरमाहट पैदा कर दी है, खासकर तब जब 2026 के विधानसभा चुनाव काफी नजदीक हैं। कबीर का यह रुख न केवल उनकी पूर्व पार्टी के लिए सिरदर्द बना हुआ है, बल्कि इसने राज्य में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की नई बहस को भी जन्म दे दिया है। हुमायूं कबीर ने अपने संबोधन में विस्तार से बताया कि मुर्शिदाबाद जिले के बेलडांगा में इस प्रस्तावित मस्जिद का निर्माण कार्य पहले ही शुरू किया जा चुका है। उन्होंने दावा किया कि इस परियोजना के लिए भारी मात्रा में जनसमर्थन और आर्थिक सहायता मिल रही है। उनके अनुसार, यह मस्जिद केवल एक धार्मिक ढांचा नहीं है, बल्कि यह उन लोगों की भावनाओं का प्रतीक है जो अयोध्या की ऐतिहासिक मस्जिद के विध्वंस को एक गहरे जख्म के रूप में देखते हैं। कबीर ने घोषणा की कि अगले दो वर्षों के भीतर इस विशाल ढांचे का निर्माण पूरा कर लिया जाएगा, जिस पर लगभग 50 से 55 करोड़ रुपये की लागत आने का अनुमान है। उन्होंने इस परियोजना को अपनी 'व्यक्तिगत प्रतिज्ञा' बताते हुए कहा कि वे इस मिशन के लिए किसी भी स्तर तक जाने को तैयार हैं, चाहे इसके लिए उन्हें कानूनी या राजनीतिक रूप से कितनी ही बड़ी कीमत क्यों न चुकानी पड़े।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हुमायूं कबीर का यह कदम सीधे तौर पर राज्य के अल्पसंख्यक मतदाता वर्ग को अपनी ओर आकर्षित करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। पश्चिम बंगाल की कई विधानसभा सीटों पर मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका निर्णायक होती है, और कबीर इसी भावना को भुनाकर अपनी नई पार्टी को एक मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। उन्होंने खुले तौर पर मांग की है कि आगामी चुनावों के बाद राज्य में पहली बार किसी अल्पसंख्यक समुदाय के व्यक्ति को मुख्यमंत्री या कम से कम उपमुख्यमंत्री बनाया जाना चाहिए। उनका तर्क है कि अल्पसंख्यक वर्ग केवल वोट देने के लिए नहीं है, बल्कि उसे सत्ता में भी उचित भागीदारी मिलनी चाहिए। उनके इस आक्रामक रुख ने सत्ताधारी दल के वोट बैंक में सेंधमारी की आशंका पैदा कर दी है, जिसके कारण राजनीतिक गलियारों में भारी उथल-पुथल मची हुई है। प्रस्तावित मस्जिद को अयोध्या की विवादित बाबरी मस्जिद के मूल नक्शे और डिजाइन के आधार पर बनाया जा रहा है। निर्माण स्थल पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं और कबीर ने स्पष्ट किया है कि वे इस ढांचे का नाम भी 'बाबरी मस्जिद' ही रखेंगे, ताकि इससे जुड़ी धार्मिक और ऐतिहासिक भावनाएं बरकरार रहें। इस पूरे विवाद के बीच, तृणमूल कांग्रेस ने हुमायूं कबीर के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। सत्ताधारी दल के वरिष्ठ नेताओं ने कबीर पर आरोप लगाया है कि वे विपक्षी ताकतों के साथ मिलकर राज्य के सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने की साजिश रच रहे हैं। हाल ही में एक कथित वीडियो फुटेज का हवाला देते हुए कबीर पर यह भी आरोप लगाए गए हैं कि वे एक बड़ी वित्तीय डील के माध्यम से अल्पसंख्यक वोटों को बांटने का काम कर रहे हैं ताकि इसका सीधा फायदा प्रतिद्वंद्वी पार्टी को मिल सके। हालांकि, कबीर ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे अपने खिलाफ एक सोची-समझी बदनामी की मुहिम बताया है। उन्होंने चुनौती दी है कि यदि उनके खिलाफ कोई भी ठोस सबूत है, तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए, अन्यथा वे इस मानहानि के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेंगे।
हुमायूं कबीर का राजनीतिक सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। एक समय में वे सत्ताधारी दल के प्रमुख रणनीतिकारों में से एक माने जाते थे, लेकिन पार्टी नेतृत्व के साथ मतभेदों और उनकी सांप्रदायिक टिप्पणियों के कारण उन्हें निलंबित कर दिया गया था। अपनी नई पार्टी 'एजेयूपी' बनाने के बाद वे अब खुद को एक स्वतंत्र और निडर नेता के रूप में पेश कर रहे हैं। उन्होंने आगामी विधानसभा चुनावों के लिए 182 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा की है और अन्य छोटे दलों के साथ गठबंधन करने की प्रक्रिया में हैं। उनका कहना है कि बंगाल की राजनीति में अब तक अल्पसंख्यकों का केवल इस्तेमाल किया गया है, लेकिन वे अब उन्हें अपने अधिकारों के लिए लड़ना सिखाएंगे। बाबरी मस्जिद के निर्माण का मुद्दा उनके इसी बड़े एजेंडे का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर उभरा है। इस विवाद का असर केवल जुबानी जंग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका जमीन पर भी गहरा प्रभाव देखा जा रहा है। राज्य के सीमावर्ती जिलों में इस मस्जिद निर्माण की खबर के बाद से सतर्कता बढ़ा दी गई है। स्थानीय प्रशासन और पुलिस के लिए यह मुद्दा एक बड़ी कानून-व्यवस्था की चुनौती बन गया है। विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संगठनों ने इस पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है, जिससे समाज में स्पष्ट विभाजन देखा जा रहा है। एक तरफ जहां कबीर के समर्थक इसे अपनी धार्मिक पहचान की बहाली मान रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ आलोचक इसे चुनावी फायदे के लिए भावनाओं के साथ खिलवाड़ बता रहे हैं। कबीर का कहना है कि वे किसी भी स्थिति में पीछे नहीं हटेंगे क्योंकि उनका मानना है कि यह मस्जिद बंगाल में सामाजिक न्याय का प्रतीक बनेगी।
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