उत्तराखंड में बिजली संकट- 9 हाइड्रो पावर हाउस ठप, बारिश और गाद ने बढ़ाई मुश्किलें। 

Uttarakhand News: उत्तराखंड, जिसे 'ऊर्जा प्रदेश' के रूप में जाना जाता है, इन दिनों गंभीर बिजली संकट से जूझ रहा है। 22 जुलाई 2025 को सामने...

Jul 22, 2025 - 15:34
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उत्तराखंड में बिजली संकट- 9 हाइड्रो पावर हाउस ठप, बारिश और गाद ने बढ़ाई मुश्किलें। 
उत्तराखंड में बिजली संकट- 9 हाइड्रो पावर हाउस ठप, बारिश और गाद ने बढ़ाई मुश्किलें। 

Uttarakhand News: उत्तराखंड, जिसे 'ऊर्जा प्रदेश' के रूप में जाना जाता है, इन दिनों गंभीर बिजली संकट से जूझ रहा है। 22 जुलाई 2025 को सामने आई खबरों के अनुसार, राज्य में लगातार हो रही भारी बारिश ने नदियों में सिल्ट और गाद की मात्रा को इतना बढ़ा दिया है कि इससे 9 प्रमुख हाइड्रो पावर हाउसों को बंद करना पड़ गया है। इस स्थिति ने न केवल बिजली उत्पादन को प्रभावित किया है, बल्कि उत्तराखंड के कई शहरों और गांवों में बिजली आपूर्ति पर भी गहरा असर डाला है। यह संकट ऐसे समय में सामने आया है, जब मानसून 2025 पहले ही पूरे भारत को कवर कर चुका है, जिससे नदियों में पानी का स्तर तो बढ़ा, लेकिन साथ ही गाद और मलबे ने हाइड्रो प्रोजेक्ट्स को नुकसान पहुंचाने का खतरा पैदा कर दिया।

उत्तराखंड को उसकी प्रचुर जल संसाधनों और नदियों के कारण 'ऊर्जा प्रदेश' कहा जाता है। गंगा, यमुना, अलकनंदा, भागीरथी, और अन्य नदियों पर बने हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स राज्य की बिजली जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा पूरा करते हैं। लेकिन हाल के वर्षों में, पर्यावरणीय चिंताओं, सुप्रीम कोर्ट के आदेशों, और प्राकृतिक आपदाओं के कारण कई हाइड्रो प्रोजेक्ट्स बंद या रुके हुए हैं। 2013 की केदारनाथ त्रासदी के बाद, सुप्रीम कोर्ट ने 24 हाइड्रो प्रोजेक्ट्स पर रोक लगा दी थी, क्योंकि इनसे पर्यावरण और पारिस्थितिकी को नुकसान होने की आशंका थी। इसके बावजूद, उत्तराखंड की बिजली मांग लगातार बढ़ रही है, जो पीक सीजन में 2600 मेगावाट तक पहुंच जाती है।

22 जुलाई 2025 को, उत्तराखंड जल विद्युत निगम लिमिटेड (UJVNL) ने बताया कि भारी बारिश के कारण नदियों में सिल्ट और गाद की मात्रा बढ़ गई है। इस गाद में मिट्टी, पत्थर, लकड़ी, और अन्य मलबा शामिल होता है, जो टर्बाइनों और बैराज को नुकसान पहुंचा सकता है। इसे रोकने के लिए, 9 प्रमुख हाइड्रो पावर हाउसों छिबरो (185 मेगावाट), खोदरी (82 मेगावाट), ढकरानी (30 मेगावाट), ढालीपुर (46 मेगावाट), मनेरी भाली फेज-1 (99 मेगावाट), मनेरी भाली फेज-2 (246 मेगावाट), पथरी (20 मेगावाट), कालागढ़ (198 मेगावाट), और एक अन्य अनाम प्रोजेक्ट को अस्थायी रूप से बंद कर दिया गया है। इससे बिजली उत्पादन में भारी कमी आई है, जो पहले से ही 16 मिलियन यूनिट से घटकर अब 6 मिलियन यूनिट पर सिमट गया है।

  • बारिश और सिल्ट का प्रभाव

इस साल मानसून 2025 ने 9 दिन पहले ही पूरे भारत को कवर कर लिया, जिसके कारण उत्तराखंड में भी भारी बारिश देखने को मिल रही है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने 19 जुलाई के बाद और भारी बारिश की चेतावनी दी है, जिससे स्थिति और जटिल हो सकती है। भारी बारिश के कारण नदियों में पानी का स्तर बढ़ गया है, लेकिन साथ ही गाद और मलबे की मात्रा भी कई गुना बढ़ गई है। यह सिल्ट हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स के टर्बाइनों और बैराज में जमा हो जाती है, जिससे उपकरणों को नुकसान पहुंचने का खतरा रहता है। इसे रोकने के लिए, उत्तराखंड जल विद्युत निगम ने इन प्रोजेक्ट्स को बंद करने का फैसला लिया।

यह स्थिति कोई नई नहीं है। 2013 में भी भारी बारिश के कारण उत्तराखंड की 11 में से 7 जल विद्युत परियोजनाएं ठप हो गई थीं, और उस समय भी बिजली उत्पादन 16 मिलियन यूनिट से घटकर 6 मिलियन यूनिट रह गया था। उस दौरान, ऊर्जा निगम को 118 करोड़ रुपये की बिजली बाहर से खरीदनी पड़ी थी। इस बार भी, बिजली की कमी को पूरा करने के लिए राज्य को अन्य स्रोतों से बिजली खरीदनी पड़ रही है, जो राजकोष पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है।

9 हाइड्रो पावर हाउसों के ठप होने से उत्तराखंड के कई हिस्सों में बिजली कटौती शुरू हो गई है। देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश, और अन्य बड़े शहरों के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी बिजली आपूर्ति प्रभावित हुई है। गर्मी और उमस के बीच बिजली कटौती ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है। अस्पतालों, स्कूलों, और व्यवसायों पर भी इसका बुरा असर पड़ रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की आपूर्ति भी प्रभावित हुई है, क्योंकि कई पंपिंग स्टेशन बिजली पर निर्भर हैं।

सोशल मीडिया पर लोग इस संकट को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। एक यूजर (@vivek4news) ने लिखा, "उत्तराखंड को ऊर्जा प्रदेश कहते हैं, लेकिन बारिश होते ही बिजली गायब! सरकार को इस पर स्थायी समाधान ढूंढना चाहिए।" इसी तरह, कई अन्य लोगों ने भी सरकार और बिजली विभाग से इस समस्या का जल्द समाधान करने की मांग की है।

उत्तराखंड सरकार और जल विद्युत निगम इस संकट से निपटने के लिए कई कदम उठा रहे हैं। ऊर्जा विभाग के अधिकारियों ने बताया कि वे बिजली की कमी को पूरा करने के लिए अन्य राज्यों से बिजली खरीद रहे हैं। साथ ही, कुछ छोटे हाइड्रो प्रोजेक्ट्स और सौर ऊर्जा परियोजनाओं को तेजी से शुरू करने की कोशिश की जा रही है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने जल विद्युत परियोजनाओं को फिर से शुरू करने के लिए केंद्र सरकार से बातचीत की है, खासकर उन परियोजनाओं को जो सुप्रीम कोर्ट और पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी के अभाव में रुकी हुई हैं।

मुख्यमंत्री सौर स्वरोजगार योजना (MSSY) के तहत, उत्तराखंड में सौर ऊर्जा को बढ़ावा देने की कोशिश की जा रही है, ताकि हाइड्रो पावर पर निर्भरता कम की जा सके। हालांकि, सौर ऊर्जा परियोजनाएं अभी प्रारंभिक चरण में हैं और तत्काल संकट का समाधान नहीं कर सकतीं। इसके अलावा, आपदा प्रबंधन विभाग ने भारी बारिश और भूस्खलन की चेतावनियों को देखते हुए सभी जिलाधिकारियों को अलर्ट रहने और राहत कार्यों के लिए तैयार रहने का निर्देश दिया है।

हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स उत्तराखंड की बिजली जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा पूरा करते हैं, लेकिन इनसे पर्यावरण को होने वाला नुकसान भी चर्चा का विषय रहा है। 2013 की केदारनाथ आपदा और हाल ही में जोशीमठ में भू-धंसाव की घटनाओं ने हाइड्रो प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा और उनके पर्यावरणीय प्रभावों पर सवाल उठाए हैं। पर्यावरणविदों का कहना है कि बड़े बांध और सुरंगें हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इस कारण, कई प्रोजेक्ट्स सुप्रीम कोर्ट और पर्यावरण मंत्रालय की मंजूरी के अभाव में रुके हुए हैं।

वहीं, सिल्ट और गाद की समस्या भी हाइड्रो प्रोजेक्ट्स के लिए एक बड़ी चुनौती है। भारी बारिश के दौरान नदियों में आने वाला मलबा टर्बाइनों को नुकसान पहुंचा सकता है, जिसके कारण प्रोजेक्ट्स को बार-बार बंद करना पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि सिल्ट प्रबंधन के लिए बेहतर तकनीकों और नियमित रखरखाव की जरूरत है

इस संकट से निपटने के लिए उत्तराखंड सरकार को कुछ दीर्घकालिक उपाय करने होंगे। सबसे पहले, रुके हुए हाइड्रो प्रोजेक्ट्स को पर्यावरणीय मंजूरी के साथ जल्द शुरू करने की जरूरत है। साथ ही, सौर और पवन ऊर्जा जैसे वैकल्पिक स्रोतों पर निवेश बढ़ाना होगा। सिल्ट प्रबंधन के लिए आधुनिक तकनीकों को अपनाने और नदियों की नियमित सफाई की व्यवस्था करनी होगी। इसके अलावा, बिजली की बढ़ती मांग को देखते हुए, ऊर्जा संरक्षण और कुशल उपयोग पर भी ध्यान देना होगा।

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