विशेष लेख: बिहार की अर्थव्यवस्था... दो दशक में बारह गुना छलांग।
बिहार की धरती से ही लगभग तीन हजार वर्ष पहले चाणक्य ने कहा, 'कोष मूलो हि दण्डः' अर्थात राजकोष ही राजसत्ता (देश, राज्य, साम्राज्य) की रीढ़ है। चाणक्य की इस सूक्ति का
लेख: हरिवंश
बिहार की धरती से ही लगभग तीन हजार वर्ष पहले चाणक्य ने कहा, 'कोष मूलो हि दण्डः' अर्थात राजकोष ही राजसत्ता (देश, राज्य, साम्राज्य) की रीढ़ है। चाणक्य की इस सूक्ति का अनुवाद करते रुद्रपट्टण शामाशास्त्री कहते हैं, श्रेष्ठ काम और कामना (आशय नागरिक, समाज व राज्य कल्याण से) की पूर्ति के लिए वित्त ही मुख्य स्रोत है।
19वीं सदी में मार्क्स की क्रांतिकारी विचारधारा-दर्शन का सूक्त था कि आर्थिक कारण ही इतिहास बदलते हैं। बाहरी हमलों व अंग्रेजों की लूट, कुप्रबंधन से गरीबी, अविकास, पिछेड़पन वगैरह का जो अभिशाप मिला, उससे ही पूर्णतया मुक्त होना, और पुराना गौरव पाना बिहार की चुनौती है। इस दृष्टि से आर्थिक मुद्दों की कसौटी पर बिहार आज कहां है? यह हर बिहारी को जानना जरूरी है, जो खुद, राज्य व देश के भविष्य पर सोचता है।
यह जानने से पहले याद रखें, हजारों वर्ष पहले से 17वीं-18वीं सदी तक बिहार का अतीत समृद्ध-वैभव का रहा है। प्रो. राधाकृष्ण चौधरी के अनुसार, पहले अंग्रेज पर्यटक ने लिखा है, पटना एक बहुत बड़ा व लंबा शहर था। पुर्तगाली पर्यटक बरबोसा ने इस कथन का समर्थन किया है। इटली के पर्यटक वारसेमा ने लिखा, पटना संसार के सुंदर नगरों में से एक है। यहां से रेशम व सूती के कपड़े बाहर भेजे जाते थे। फ्रांसीसी यात्री फ्रांस्वाबर्नियर ने 17वीं शताब्दि में अपनी भारत यात्रा के वृतांत में लिखा है (पेज 440 ट्रेवेल्स इन मुगल एम्पायर एडी 1656-1668), पटना में आठ सरकार और दो सौ पैतालीस परगने थे। पटना में चीनी, लाख, पोटेशियम नाइट्रेट (जिससे बारुद, बनाया जाता है, उसकी रिफाइनरी के लिए छपरा में फ्रेंच, पुर्तगाली, और डच कम्पनियों की फैक्टरियां भी थी), अफीम, लौंग, घी और कई तरह की औषधियां इत्यादि का काफी उत्पादन होता था। इसे गंगा नदी के जरिए कलकत्ता ले जा कर निर्यात किया जाता था। टैवर्नियर ने लिखा है, पटना एक प्रधान व्यापारिक केंद्र था। मैनुक्की ने भी इसका उल्लेख किया है। इसी युग में गुरु गोविंद सिंह का जन्म पटना में हुआ था।
आजादी बाद, उसी बिहार में 1950 से 1980 के दशकों में विकास ठहर गया था। अवरूद्ध, स्थिर या गतिविहीन विकास के दशक थे। उस दौर में प्रति व्यक्ति राष्ट्रीय औसत आमद की तुलना में बिहार में प्रति व्यक्ति औसत आमद में गिरावट हुई।
1990-91 से कृषि क्षेत्र के योगदान के साथ-साथ, औद्योगिक क्षेत्र व सेवा क्षेत्र के योगदान में मामूली आमद शुरू हुई, पर, प्रति व्यक्ति आमद में गिरावट हुई या ठहराव या मामूली प्रगति की स्थिति रही। आज दुनिया में आर्थिक ताकत ही मूल है। देश में भी यही स्थिति है। आर्थिक प्रगति-विकास ही राज्यों की राजनीति का केंद्र बिंदु बन रहा है। इस माहौल में बिहार की अर्थव्यवस्था ने मजबूत उड़ान भरी है। वर्ष 2024-25 में राज्य का सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) मौजूदा कीमतों पर ₹9.92 लाख करोड़ पहुंच गया है। पिछले साल की तुलना में 13 फीसदी अधिक।
पीछे मुड़कर देखें, 1989-90 में यह सकल घरेलू उत्पाद केवल ₹22,610 करोड़ था, यानी पिछले 35 वर्षों में राज्य की अर्थव्यवस्था 44 गुना बढ़ी है। 2005 के बाद से इसकी रफ्तार और तेज हुई, जब वार्षिक चक्रवृद्धि दर लगभग 14 फीसदी हो रही। अगर 2005-06 को आधार मानें, जब मौजूदा शासन ने कमान के संभाली थी, तो उस समय से अब तक बिहार की अर्थव्यवस्था करीब की 12 गुना बढ़ चुकी है।
रोचक तथ्य है कि शराबबंदी के बावजूद यह उछाल जारी है। 2016 में बिहार में शराबबंदी लागू हुई। इस फैसले से राज्य को अब तक अनुमानित 40,000 करोड़ का आबकारी राजस्व नुकसान हुआ, लेकिन इसके बावजूद आर्थिक प्रगति थमी नहीं। शराबबंदी से असहमत लोगों का यह तर्क था कि राज्य की अर्थव्यवस्था पर इसका असर होगा। भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के अनुसार, 2023-24 में बिहार ₹8,77,197 करोड़ था। यह 2024- 25 में बढ़कर ₹9,91,997 करोड़ हो गया। यह साल-दर-साल 13.09 फीसदी की बढ़ोतरी है।
आम पाठक के लिए सरल शब्दों में, मौजूदा कीमतों पर जीएसडीपी का मतलब है, 'आज की अर्थव्यवस्था का आकार रुपये में।' यही पैमाना राज्यों की तुलना करने और बजट, कर और कर्ज जैसे आंकड़ों से जोड़ने के लिए उपयोग होता है। बिहार ने साबित किया कि बाधाएं चाहे कितनी भी हों, उसकी अर्थव्यवस्था की रफ्तार धमने वाली नहीं।
(लेखक राज्य सभा के उप सभापति हैं)
What's Your Reaction?











