नीली बत्ती की गाड़ी, फर्जी गनर और नकली सचिवालय पास... फर्जी ‘आईएएस’ अधिकारी विप्रा मिश्रा ने यूपी के कई जिलों में की करोड़ों की ठगी।
उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक धौंस और फर्जी पहचान के सहारे करोड़ों रुपये का साम्राज्य खड़ा करने वाली एक बेहद शातिर महिला
- सगी बहन के साथ मिलकर सरकारी नौकरी और ठेके दिलाने का चलाती थी सिंडिकेट, अब तक 28 मुकदमे दर्ज
- नीली बत्ती की गाड़ी, फर्जी गनर और नकली सचिवालय पास के दम पर अधिकारियों को भी डाल देती थी भ्रम में
उत्तर प्रदेश में प्रशासनिक धौंस और फर्जी पहचान के सहारे करोड़ों रुपये का साम्राज्य खड़ा करने वाली एक बेहद शातिर महिला जालसाज का मामला इन दिनों पूरे राज्य में चर्चा का विषय बना हुआ है। खुद को भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) का अधिकारी बताकर सूबे के दर्जनों जिलों में समानांतर रूप से ठगी का नेटवर्क चलाने वाली विप्रा मिश्रा नाम की महिला को पुलिस ने आखिरकार सलाखों के पीछे भेज दिया है। यह मामला केवल एक साधारण धोखाधड़ी का नहीं है, बल्कि इसने सरकारी मशीनरी की सुरक्षा और सतर्कता पर भी कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आरोपी महिला ने इतने शातिर तरीके से अपनी फर्जी प्रोफाइल तैयार की थी कि आम जनता तो दूर, कई जिलों के स्थानीय प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी भी उसे सचमुच का आईएएस अधिकारी मानकर उसे सेल्यूट ठोकते थे और प्रोटोकॉल प्रदान करते थे।
इस बेहद संगठित और सुनियोजित ठगी के धंधे में विप्रा मिश्रा अकेली नहीं थी, बल्कि उसकी सगी बहन प्राची मिश्रा भी इस पूरे आपराधिक सिंडिकेट की मुख्य साझीदार थी। दोनों बहनें मिलकर उत्तर प्रदेश के लखनऊ, कानपुर, गोरखपुर, प्रयागराज, वाराणसी और बरेली समेत करीब दो दर्जन से अधिक जिलों में अपना जाल फैला चुकी थीं। प्राची मिश्रा का मुख्य काम ऐसे लोगों को तलाशना था जो सरकारी नौकरी पाने के लिए उत्सुक हों या फिर पीडब्ल्यूडी और सिंचाई विभाग जैसे मलाईदार महकमों में बड़े ठेके हासिल करना चाहते हों। एक बार जब कोई शिकार इनके जाल में फंस जाता था, तो विप्रा मिश्रा अपने पूरे तामझाम और प्रशासनिक रौब के साथ पिक्चर में एंट्री लेती थी। पीड़ितों को पूरी तरह आश्वस्त करने के लिए वह उन्हें सचिवालय या वीआईपी गेस्ट हाउसों के आस-पास बुलाकर मुलाकात करती थी, जिससे किसी को भी उसके असली स्वरूप पर रत्ती भर का शक नहीं होता था।
जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, इस शातिर गिरोह के खिलाफ दर्ज होने वाले मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और अब तक उत्तर प्रदेश के अलग-अलग थानों में कुल 28 एफआईआर दर्ज की जा चुकी हैं। पुलिस थानों में दर्ज शिकायतों के विवरण के अनुसार, इस गिरोह ने सचिवालय में समीक्षा अधिकारी (आरओ), सहायक समीक्षा अधिकारी (एआरओ), खंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) और स्वास्थ्य विभाग में बड़े पदों पर सीधी भर्ती कराने के नाम पर सैकड़ों बेरोजगार युवाओं से प्रति व्यक्ति 10 से 15 लाख रुपये वसूले थे। जब युवाओं को फर्जी ज्वाइनिंग लेटर थमा दिए जाते थे और वे संबंधित विभागों में कार्यभार संभालने पहुंचते थे, तब जाकर उन्हें इस बहुत बड़े धोखे का एहसास होता था। रकम वसूलने के बाद जब पीड़ित अपने पैसे वापस मांगते थे, तो विप्रा मिश्रा उन्हें अपने तथाकथित प्रशासनिक प्रभाव का डर दिखाकर और जेल भिजवाने की धमकी देकर चुप करा देती थी।
गिरोह का वीआईपी प्रोफाइल और तौर-तरीके
विप्रा मिश्रा अपने साथ हमेशा एक फर्जी सरकारी गनर रखती थी, जो खाकी वर्दी में थ्री-नॉट-थ्री राइफल के साथ तैनात रहता था। उसकी एसयूवी कार पर भारत सरकार का फर्जी लोगो, नीली बत्ती और सचिवालय का पास लगा हुआ था। वह जब भी किसी जिले के दौरे पर जाती थी, तो वहां के स्थानीय सर्किट हाउस या सरकारी डाक बंगले में ही ठहरती थी, जिसके लिए वह पहले से ही किसी बड़े अधिकारी के नाम पर फर्जी ईमेल या पत्र भिजवा देती थी।
इस महाजालसाज महिला की गिरफ्तारी के बाद जब पुलिस ने उसके ठिकानों पर छापेमारी की, तो वहां से भारी मात्रा में आपत्तिजनक और जाली दस्तावेज बरामद हुए। बरामद सामग्रियों में उत्तर प्रदेश शासन के गृह विभाग और नियुक्ति विभाग के दर्जनों जाली लेटरहेड, विभिन्न विभागों के फर्जी ज्वाइनिंग और ट्रांसफर ऑर्डर, सैकड़ों की संख्या में रबर स्टैंप और डिजिटल सिग्नेचर शामिल हैं। इसके साथ ही, जांच टीम को विप्रा और उसकी बहन के विभिन्न बैंक खातों में करोड़ों रुपये के संदिग्ध लेनदेन के सबूत भी मिले हैं। पुलिस अब इस बात की भी गहनता से पड़ताल कर रही है कि इन दोनों बहनों ने ठगी के इस काले कारोबार से जो अकूत संपत्ति अर्जित की है, उसे कहां-कहां निवेश किया गया है और किन-किन शहरों में बेनामी संपत्तियां खरीदी गई हैं।
पुलिस की विशेष विंग द्वारा की जा रही पूछताछ में यह भी अंदेशा जताया जा रहा है कि इस पूरे खेल में शासन स्तर पर बैठे कुछ कनिष्ठ कर्मचारियों और अधिकारियों की भी संलिप्तता हो सकती है। बिना किसी अंदरूनी मदद या सूचना के, कोई भी बाहरी व्यक्ति इतनी आसानी से सरकारी विभागों के हूबहू दिखने वाले आदेश पत्र और गोपनीय जानकारियां हासिल नहीं कर सकता। यही वजह है कि जांच एजेंसियां अब उन सभी लोगों के मोबाइल फोन के कॉल डिटेल्स और व्हाट्सएप चैट को खंगाल रही हैं, जो पिछले एक साल के भीतर विप्रा या उसकी बहन के लगातार संपर्क में थे। इस प्रशासनिक लापरवाही के कारण कई विभागों के सुरक्षा तंत्र पर सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि एक फर्जी महिला वर्षों तक खुद को बड़ी अधिकारी बताकर सरकारी व्यवस्था का मजाक उड़ाती रही।
इस मामले का एक और पहलू यह भी है कि विप्रा मिश्रा ने खुद को सामाजिक और राजनीतिक रूप से भी काफी स्थापित कर लिया था। वह कई बड़े सामाजिक मंचों और सरकारी कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल होती थी, जहां वह महिला सशक्तिकरण और युवाओं को ईमानदारी से आगे बढ़ने के लंबे-चौड़े भाषण देती थी। इन कार्यक्रमों की तस्वीरें और वीडियो वह सोशल मीडिया पर खूब प्रचारित करती थी, जिससे उसका प्रभाव और विश्वसनीयता समाज में और ज्यादा बढ़ जाती थी। इसी प्रभाव का इस्तेमाल वह अपने अगले शिकार को फंसाने के लिए एक हथियार के रूप में करती थी, जिससे लोग उसकी बातों को सच मानकर अपनी जमीन-जायदाद बेचकर या कर्ज लेकर उसे रकम सौंप देते थे। फिलहाल, अदालत ने दोनों बहनों की जमानत याचिकाओं को उनकी गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि और मामलों की संख्या को देखते हुए पूरी तरह से खारिज कर दिया है और उन्हें न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया है। पुलिस प्रशासन ने आम जनता से भी अपील की है कि यदि कोई भी व्यक्ति इस तरह से नौकरी दिलाने या टेंडर पास कराने के नाम पर पैसों की मांग करता है, तो तुरंत वरिष्ठ अधिकारियों को सूचित करें।
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