एमबीए और बी-टेक पास युवाओं ने पासा पलटकर महज दो हफ्तों में किया 4.5 करोड़ का खेल, अंतरराष्ट्रीय साइबर सिंडिकेट का भंडाफोड़।

देश की राजधानी दिल्ली में तकनीकी और उच्च शिक्षा की आड़ में चल रहे एक बहुत बड़े अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध के नेटवर्क

May 20, 2026 - 12:44
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एमबीए और बी-टेक पास युवाओं ने पासा पलटकर महज दो हफ्तों में किया 4.5 करोड़ का खेल, अंतरराष्ट्रीय साइबर सिंडिकेट का भंडाफोड़।
एमबीए और बी-टेक पास युवाओं ने पासा पलटकर महज दो हफ्तों में किया 4.5 करोड़ का खेल, अंतरराष्ट्रीय साइबर सिंडिकेट का भंडाफोड़।
  • कंबोडिया से संचालित अंतरराष्ट्रीय साइबर सिंडिकेट का भंडाफोड़, दिल्ली पुलिस की बड़ी कामयाबी
  • ऑनलाइन निवेश के नाम पर देशव्यापी ठगी का सनसनीखेज जाल, चार राज्यों में छापेमारी के बाद 8 आरोपी दबोचे

देश की राजधानी दिल्ली में तकनीकी और उच्च शिक्षा की आड़ में चल रहे एक बहुत बड़े अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराध के नेटवर्क को ध्वस्त करने में सुरक्षा बलों को बड़ी सफलता मिली है। दिल्ली पुलिस की विशेष साइबर सेल और स्थानीय पुलिस टीमों ने संयुक्त रूप से कार्रवाई करते हुए एक ऐसे गिरोह का भंडाफोड़ किया है, जिसके तार सीधे दक्षिण-पूर्व एशियाई देश कंबोडिया से जुड़े हुए थे। इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक और हैरान करने वाला पहलू यह है कि इस गिरोह को चलाने वाले कोई आम अपराधी या अनपढ़ लोग नहीं हैं, बल्कि देश के प्रतिष्ठित संस्थानों से मास्टर ऑफ बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (एमबीए) और बैचलर ऑफ टेक्नोलॉजी (बी-टेक) जैसी बड़ी डिग्रियां हासिल कर चुके उच्च शिक्षित युवा हैं। इन पढ़े-लिखे शातिर दिमागों ने कंप्यूटर प्रोग्रामिंग और वित्तीय प्रबंधन के अपने ज्ञान का इस्तेमाल समाज को बेहतर बनाने के बजाय निर्दोष लोगों को ठगने के लिए किया।

इस गिरोह के काम करने की रफ्तार और इसके वित्तीय लेन-देन के आंकड़ों ने जांच अधिकारियों को भी हैरत में डाल दिया है। पुलिस द्वारा की गई तकनीकी जांच और बैंक खातों के विश्लेषण से यह बात सामने आई है कि इस सिंडिकेट ने महज 14 दिनों के भीतर देश के अलग-अलग हिस्सों से करीब 4.5 करोड़ रुपये का अवैध वित्तीय खेल कर डाला। इतनी बड़ी रकम को बहुत ही कम समय में ठिकाने लगाने के लिए आरोपियों ने अत्यधिक उन्नत डिजिटल टूल्स और कई राज्यों में फर्जी नामों से बनाई गई कंपनियों के बैंक खातों का इस्तेमाल किया था। जब देश के विभिन्न राज्यों के पीड़ित परिवारों ने अपनी जीवन भर की गाढ़ी कमाई डूबने की शिकायतें राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (एनसीआरपी) पर दर्ज करानी शुरू कीं, तब जाकर इस महाजाल की कड़ियां एक-दूसरे से जुड़ीं और दिल्ली पुलिस ने इसके खिलाफ बड़े पैमाने पर अपना जाल बिछाया।

दिल्ली पुलिस की खुफिया विंग ने इस गिरोह के ठिकानों की पहचान करने के लिए एक व्यापक तकनीकी सर्विलांस ऑपरेशन चलाया, जिसके बाद दिल्ली, हरियाणा, पंजाब और मध्य प्रदेश समेत चार राज्यों के कई शहरों में एक साथ छापेमारी की गई। इस देशव्यापी सघन चेकिंग और दबिश के दौरान पुलिस ने कुल आठ मुख्य आरोपियों को धर-दबोचा है। गिरफ्तार किए गए अपराधियों में मोहाली के रहने वाले हरमनजोत सिंह और कैसर मसूदी, हरियाणा के पानीपत का निवासी अभिषेक, दिल्ली के जाफराबाद इलाके के रहने वाले मोहम्मद जाहिद और आमिर मलिक शामिल हैं। इसके साथ ही, मध्य प्रदेश के जबलपुर से अमरजीत अहिरवार और आलोक शर्मा तथा रीवा जिले के रहने वाले अनंत पांडेय को भी इस नेटवर्क में सक्रिय भूमिका निभाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। ये सभी आरोपी तकनीक के स्तर पर एक-दूसरे से जुड़े हुए थे और विभिन्न राज्यों में बैठकर इस धोखाधड़ी को अंजाम दे रहे थे।

म्यूल बैंक खातों का मायाजाल

जांच प्रक्रिया के दौरान पुलिस को आरोपियों के कब्जे से भारी मात्रा में ऐसे बैंक खातों की जानकारी मिली है, जिन्हें वित्तीय अपराध की भाषा में 'म्यूल अकाउंट्स' (भाड़े के खाते) कहा जाता है। इन खातों को गरीब और सीधे-साधे लोगों को मामूली पैसों का लालच देकर उनके पहचान पत्रों पर खोला गया था। राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर जांच करने पर पता चला कि इस गिरोह द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे खातों के खिलाफ पहले से ही 60 से अधिक गंभीर शिकायतें दर्ज थीं।

इस गिरोह की कार्यप्रणाली बेहद आधुनिक और मनोवैज्ञानिक रूप से लोगों को प्रभावित करने वाली थी। ये एमबीए और बी-टेक पास अपराधी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स, व्हाट्सएप और टेलीग्राम पर सक्रिय रहकर लोगों को घर बैठे ऑनलाइन निवेश के माध्यम से रातों-रात दोगुना मुनाफा कमाने का आकर्षक लालच देते थे। वे खुद को कंबोडिया और नेपाल में बैठे बड़े अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सलाहकारों का प्रतिनिधि बताते थे। शुरुआत में, विश्वास जीतने के लिए ये लोग पीड़ितों को फर्जी डिजिटल वॉलेट और नकली वेबसाइटों पर भारी मुनाफा होने का ग्राफ दिखाते थे। जब पीड़ित व्यक्ति उनके झांसे में आकर अपनी बड़ी जमा पूंजी निवेश कर देता था, तो ये लोग तुरंत उस पैसे को अलग-अलग फर्जी फर्मों के बैंक खातों में ट्रांसफर कर देते थे और कुछ ही मिनटों में वह पैसा कंबोडिया में बैठे मास्टरमाइंड्स तक डिजिटल करेंसी और क्रिप्टो के माध्यम से पहुंच जाता था।

इंटरराष्ट्रीय स्तर पर जुड़े इस सिंडिकेट के पीछे कंबोडिया में सक्रिय चीनी और अन्य विदेशी साइबर अपराधियों के गिरोहों का हाथ होने की बात भी सामने आ रही है। कंबोडिया के कुछ विशेष क्षेत्रों में संचालित होने वाले इन 'साइबर स्कैम कंपाउंड्स' से भारत के इन शिक्षित युवाओं को लगातार तकनीकी सहायता, फर्जी सॉफ्टवेयर और कॉल सेंटरों का बैकअप प्रदान किया जा रहा था। गिरफ्तार किए गए आरोपी भारत में रहकर केवल फंड मैनेजमेंट, लोकल बैंक खातों की व्यवस्था और पैसे को विदेशी खातों में डाइवर्ट करने का काम संभाल रहे थे। इस काम के बदले उन्हें ठगी गई कुल रकम का एक निश्चित प्रतिशत कमीशन के तौर पर मिलता था, जिससे वे बहुत ही कम समय में ऐशो-आराम की जिंदगी जीने लगे थे।

पुलिस ने इन सभी आठों आरोपियों के पास से दर्जनों की संख्या में स्मार्टफोन, महंगे लैपटॉप, अंतरराष्ट्रीय सिम कार्ड, विभिन्न बैंकों की चेकबुक, पासबुक और एटीएम कार्ड बरामद किए हैं। इसके साथ ही उनके पास से मिले कई डिजिटल दस्तावेजों को फॉरेंसिक जांच के लिए भेज दिया गया है ताकि कंबोडिया में बैठे मुख्य सरगनाओं के आईपी एड्रेस और उनके वास्तविक ठिकानों का पता लगाया जा सके। दिल्ली पुलिस इस मामले में अब केंद्रीय जांच एजेंसियों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम करने वाली सुरक्षा संस्थाओं से भी संपर्क साध रही है ताकि इस सीमा पार चल रहे रैकेट की जड़ों को पूरी तरह से काटा जा सके। देश की सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता के लिहाज से इस तरह के अंतरराष्ट्रीय गिरोहों का सक्रिय होना एक बेहद गंभीर चुनौती बन चुका है।

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