उच्च न्यायालय ने बार एसोसिएशनों को जारी की सख्त चेतावनी, कहा- हड़ताल के कारण आम जनता के अधिकारों का न हो हनन।
देश की राजधानी दिल्ली में अदालती कामकाज को ठप करने और विभिन्न मांगों को लेकर वकीलों द्वारा की जाने वाली बार-बार की
- दिल्ली में वकीलों की बार-बार होने वाली हड़ताल पर न्यायपालिका का कड़ा रुख, अदालती कामकाज रोकने पर जताई भारी नाराजगी
- न्यायालय का कीमती समय बर्बाद करने और मुकदमों को लटकाने वाले अधिवक्ताओं पर ठुका भारी वित्तीय जुर्माना
देश की राजधानी दिल्ली में अदालती कामकाज को ठप करने और विभिन्न मांगों को लेकर वकीलों द्वारा की जाने वाली बार-बार की हड़तालों पर न्यायपालिका ने अब तक का सबसे कड़ा और ऐतिहासिक रुख अपनाया है। दिल्ली की विभिन्न जिला अदालतों से लेकर उच्च न्यायालय तक में वकीलों के काम पर न आने के कारण हजारों मुकदमों की सुनवाई प्रभावित हो रही थी, जिससे न केवल न्याय मिलने में देरी हो रही थी बल्कि अदालतों का कीमती समय भी बुरी तरह बर्बाद हो रहा था। इस गंभीर स्थिति को देखते हुए न्यायालयों ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी असंतोष या मांग को रखने का तरीका यह नहीं हो सकता कि न्याय के मंदिर के दरवाजे आम फरियादियों के लिए बंद हो जाएं या उनके मामलों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाए। अदालत ने साफ किया है कि वकीलों की हड़ताल के कारण जेलों में बंद कैदियों और न्याय की आस लगाए बैठे बुजुर्गों व लाचार लोगों को जो मानसिक व आर्थिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती है, उसे अब और बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
इस पूरे विवाद की शुरुआत दिल्ली की एक प्रमुख जिला अदालत परिसर में वकीलों और स्थानीय पुलिस या प्रशासनिक अधिकारियों के बीच हुए एक विवाद के बाद हुई थी, जिसके विरोध में बार एसोसिएशनों ने अनिश्चितकालीन हड़ताल या 'काम से दूर रहने' (एब्सटेन फ्रॉम वर्क) का आह्वान किया था। वकीलों के इस सामूहिक फैसले के कारण अदालती कक्षों में सन्नाटा पसर गया और मुकदमों की फाइलें जस की तस धरी रह गईं। जब जज अपनी कुर्सियों पर मामलों की सुनवाई के लिए बैठे, तो प्रतिवादी और वादी तो मौजूद थे लेकिन उनके कानूनी पक्ष को रखने वाले वकील गायब थे। कई मामलों में तो वकीलों ने उन साथी अधिवक्ताओं को भी अदालती कार्यवाही में हिस्सा लेने से जबरन रोक दिया जो मामलों की संवेदनशीलता को देखते हुए बहस करने के लिए तैयार थे। इस अराजक स्थिति को न्यायिक अनुशासन का घोर उल्लंघन मानते हुए पीठ ने मामलों का संज्ञान लिया और सख्त रवैया अख्तियार कर लिया।
अदालत ने अपने एक बेहद कड़े फैसले में उन वकीलों और बार पदाधिकारियों पर भारी वित्तीय जुर्माना ठोक दिया है, जो बिना किसी ठोस और आपातकालीन वैधानिक कारण के अदालती कार्यवाही से नदारद रहे और जिन्होंने कोर्ट का समय बर्बाद किया। पीठ ने सुनवाई के दौरान पाया कि कुछ मामलों में अंतिम बहस होनी थी और फैसला सुनाया जाना तय था, लेकिन अधिवक्ताओं की अनुपस्थिति के कारण तारीख को आगे बढ़ाना पड़ा। अदालत ने ऐसे मामलों में संबंधित वकीलों पर हर्जाना लगाते हुए निर्देश दिया है कि जुर्माने की यह राशि दिल्ली राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए) के कोष में जमा कराई जाए, जिसका उपयोग गरीब और बेसहारा कैदियों को कानूनी सहायता प्रदान करने के लिए किया जाता है। इसके साथ ही, अदालत ने यह भी चेतावनी दी है कि यदि भविष्य में बिना पूर्व सूचना या ठोस आधार के इस तरह से कोर्ट का समय बर्बाद किया गया, तो इसे अवमानना की श्रेणी में मानकर पेशेवर लाइसेंस रद्द करने की सिफारिश बार काउंसिल से की जा सकती है।
न्यायिक कामकाज पर हड़ताल का विपरीत असर
दिल्ली की अदालतों में पहले से ही लाखों मुकदमों का बोझ लंबित है, जहां एक-एक तारीख के लिए आम जनता को महीनों इंतजार करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में केवल एक दिन की हड़ताल के कारण पूरी न्यायिक श्रृंखला टूट जाती है और उस दिन सूचीबद्ध हजारों मामलों की सुनवाई टल जाती है। इससे उन गवाहों को भारी परेशानी होती है जो दूर-दराज के राज्यों से अपनी गवाही दर्ज कराने विशेष रूप से दिल्ली आते हैं।
इस कड़े कदम के साथ ही उच्च न्यायालय ने दिल्ली की सभी जिला बार एसोसिएशनों के अध्यक्षों और सचिवों को एक व्यापक और कड़ा चेतावनी पत्र यानी गाइडलाइन जारी की है। इस निर्देश में साफ तौर पर कहा गया है कि बार एसोसिएशनों को अपनी मांगों को शांतिपूर्ण तरीके से रखने और संबंधित अधिकारियों के साथ वार्ता करने का पूरा अधिकार है, लेकिन वे इसके लिए अदालतों के बहिष्कार को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं कर सकते। देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा पूर्व में दिए गए विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए यह दोहराया गया है कि वकीलों को हड़ताल पर जाने का कोई मौलिक या संवैधानिक अधिकार नहीं है। वकीलों का पहला कर्तव्य अपने मुवक्किल के प्रति और कोर्ट की गरिमा को बनाए रखने के प्रति होना चाहिए, न कि सामूहिक राजनीति के दबाव में आकर कानूनी व्यवस्था को पंगु बनाने का।
अदालतों द्वारा की गई इस सख्त कार्रवाई के बाद कानूनी गलियारों और बार एसोसिएशनों के भीतर भी एक बहुत बड़ी आंतरिक बहस और सुगबुगाहट शुरू हो गई है। अधिवक्ताओं का एक धड़ा जहां इस बात को स्वीकार कर रहा है कि हड़ताल के कारण वास्तव में आम जनता और जूनियर वकीलों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है, वहीं दूसरी तरफ कुछ पदाधिकारी इस जुर्माने और चेतावनी को वकीलों के लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन मान रहे हैं। हालांकि, न्यायिक पीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि कानून के शासन में किसी भी वर्ग को यह छूट नहीं दी जा सकती कि वह न्याय वितरण प्रणाली को बंधक बना ले। कोर्ट ने सभी जिला जजों को यह अधिकार भी दे दिया है कि यदि कोई वकील जानबूझकर कार्यवाही बाधित करता है या अन्य सहयोगियों को डराता है, तो उसके खिलाफ तुरंत मौके पर ही दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
इस प्रशासनिक और न्यायिक कड़ाई का जमीनी असर भी अब दिल्ली के विभिन्न कोर्ट परिसरों जैसे तीस हजारी, कड़कड़डूमा, पटियाला हाउस, साकेत और रोहिणी कोर्ट में देखने को मिलने लगा है। जुर्माने के डर और कड़े रुख को देखते हुए कई बार एसोसिएशनों ने अपनी हड़ताल को तुरंत वापस लेने या उसे सांकेतिक विरोध में बदलने का फैसला किया है। अदालतों ने वकीलों को यह विकल्प भी दिया है कि यदि वे किसी कारणवश भौतिक रूप से उपस्थित नहीं हो सकते, तो वे वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग या वर्चुअल माध्यम से जुड़कर अपनी दलीलें पूरी कर सकते हैं ताकि मुकदमों की रफ्तार धीमी न पड़े। तकनीक के इस दौर में भौतिक उपस्थिति न होने का बहाना बनाकर मामले को टालना अब स्वीकार्य नहीं माना जाएगा।
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