Special : श्रावण मास में शिवोसना के माहात्म्य पर विशेष- शिव विश्वरूप हैं, पूरा विश्व उन्हीं का स्वरूप है: अम्बरीष कुमार सक्सेना

शिव को संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है,इसी लिए कहा जाता है कि पूरा विश्व उन्हीं का स्वरूप है। शिव उपासना केव

Aug 6, 2025 - 22:49
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Special : श्रावण मास में शिवोसना के माहात्म्य पर विशेष- शिव विश्वरूप हैं, पूरा विश्व उन्हीं का स्वरूप है: अम्बरीष कुमार सक्सेना
अम्बरीष कुमार सक्सेना

हरदोई : "शिव विश्व रूप हैं, पूरा विश्व उन्हीं का स्वरूप है।" हिंदू धर्म में भगवान शिव को संपूर्ण सृष्टि का आधार माना गया है। विज्ञान बताता है कि सृष्टि की उत्पत्ति शून्यता से होती है, जिसमें से सब कुछ उत्पन्न होता है और अंततः उसी में समा जाता है।
शिव को आदियोगी या पहले योगी के रूप में भी जाना जाता है, जिन्होंने योग विज्ञान का प्रसार किया। योगिक परंपरा में, शिव को एक ऐसे योगी के रूप में माना जाता है जिन्होंने मानव चेतना के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

इस प्रकार, शिव को संपूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक माना जाता है,इसी लिए कहा जाता है कि पूरा विश्व उन्हीं का स्वरूप है। शिव उपासना केवल भारत तक ही सीमित नहीं है, बल्कि विश्व के विभिन्न भागों में पाई जाती है। शिव को विभिन्न रूपों में पूजा जाता है, और उनके प्रतीक (शिवलिंग, नटराज, महादेव आदि) कई संस्कृतियों में देखने को मिलते हैं।

भारत में शिव की पूजा अनेक रूपों में की जाती है—शिवलिंग, नटराज, अर्धनारीश्वर, भैरव आदि। प्रमुख शिव मंदिरों में काशी विश्वनाथ (वाराणसी), केदारनाथ (उत्तराखंड), सोमनाथ (गुजरात), रामेश्वरम (तमिलनाडु), और महाकालेश्वर (उज्जैन) शामिल हैं।

नेपाल को शिवभक्तों का एक प्रमुख केंद्र माना जाता है। काठमांडू स्थित पशुपतिनाथ मंदिर दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित शिव मंदिरों में से एक है।

श्रीलंका में शिव उपासना का गहरा प्रभाव है। वहाँ त्रिकोणमलई स्थित कोनेश्वरम मंदिर और मन्नार स्थित थिरुक्केतेश्वरम मंदिर प्रसिद्ध शिव मंदिर हैं।

कंबोडिया: अंकोर वाट में शिवलिंग और नटराज की मूर्तियाँ पाई जाती हैं।

इंडोनेशिया: जावा और बाली द्वीपों में शिव की पूजा आज भी की जाती है। प्रंबानन मंदिर (जावा) शिव को समर्पित है।

थाईलैंड और वियतनाम के कई मंदिरों में शिवलिंग और नटराज की मूर्तियाँ देखी जा सकती हैं।

तिब्बत में कैलाश पर्वत को शिव का दिव्य भव्य पवित्र स्थान माना जाता है। यह हिन्दू, बौद्ध, और जैन धर्म में पवित्र स्थल है। चीन में भी कुछ क्षेत्रों में

शिवलिंग और नटराज की छवियाँ देखी गई हैं।

हाल के दशकों में, यूरोप और अमेरिका में भी शिव उपासना बढ़ी है। अमेरिका में ईशा फाउंडेशन का आदियोगी शिव प्रतिमा (तमिलनाडु में भी एक विशाल प्रतिमा है) और कई शिव मंदिर बनाए गए हैं।

कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार, अफ्रीका में भी प्राचीन काल में शिव की तरह एक आराध्य की पूजा होती थी। मध्य एशिया (तुर्कमेनिस्तान, अफगानिस्तान) में भी शिवलिंग जैसे प्रतीक मिले हैं।

शिव उपासना विश्वव्यापी है और प्राचीन सभ्यताओं में भी उनके प्रतीक मिलते हैं। भारत के अलावा नेपाल, श्रीलंका, तिब्बत, दक्षिण-पूर्व एशिया, यूरोप, अमेरिका और अन्य जगहों पर शिव भक्ति का प्रभाव देखा जा सकता है।

शिव सृष्टि के आधार हैं क्योंकि वे ही आदि और अनंत परमात्मा हैं। सनातन धर्म में शिव को सृष्टि, स्थिति और संहार के अधिपति माना गया है। वे न केवल संहारकर्ता हैं, बल्कि पुनः सृजन करने वाले भी हैं।

शिव ही सृष्टि के मूल कारण हैं, उनका अर्धनारीश्वर स्वरूप-यह दर्शाता है कि शिव में ही सृष्टि की पुरुष और प्रकृति (शक्ति) दोनों तत्त्व समाहित हैं।

शिव शक्ति के बिना निष्क्रिय हैं और शक्ति, शिव के बिना अधूरी हैं। दोनों मिलकर सृष्टि का संचालन करते हैं।

शिव जब ध्यान में होते हैं, तो सृष्टि स्थिर रहती है, और जब वे तांडव करते हैं, तो संहार कर नई सृष्टि का आरंभ करते हैं।

शिव पंच महाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) के अधिपति हैं, जिनसे यह सृष्टि बनी है।

ओंकार, जो सृष्टि की मूल ध्वनि है, स्वयं शिव से उत्पन्न हुआ है।

इसलिए शिव को सृष्टि का आधार माना जाता है – वे ही कारण हैं, वे ही धारण करने वाले हैं, और वे ही अंतिम सत्य हैं। शिव परम तत्व है। शिव का सर्वोच्च या परम सिद्धांत। यह आध्यात्मिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से अत्यंत गूढ़ विषय है, जिसे विभिन्न शास्त्रों, उपनिषदों और ग्रंथों में अलग-अलग तरीकों से वर्णित किया गया है।

शैव दर्शन में, शिव को परम तत्त्व माना गया है, जो निर्गुण (गुण रहित), निराकार (रूप रहित), अनंत और चैतन्य स्वरूप है। वे केवल एक आराध्य देव नहीं, बल्कि समस्त सृष्टि के मूल कारण और स्वंय सृष्टि भी हैं। शिव न केवल संहार के देवता हैं, बल्कि सृजन, स्थिति और संहार तीनों के नियंत्रक हैं।
शैव परंपराओं में शिव को ‘चेतना’ और शक्ति को ‘ऊर्जा’ के रूप में देखा जाता है। शिव बिना शक्ति के स्थिर हैं और शक्ति बिना शिव के अस्तित्वहीन। इसीलिए, शिव और शक्ति को एक दूसरे का पूरक माना गया है।

शिव परम तत्त्व पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से भी परे हैं। वे स्वयं साक्षात् परब्रह्म हैं, जिन्हें किसी भी एक तत्व या गुण में बाँधा नहीं जा सकता।

शिव को ‘महाकाल’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है कि वे काल से भी परे हैं। वे शाश्वत हैं और अनादि-अनंत हैं। इसी कारण शिव को शून्य और अनंत दोनों कहा जाता है।

शिव तत्व को केवल तर्क या ज्ञान से नहीं समझा जा सकता, बल्कि यह साधना, ध्यान और आत्मसाक्षात्कार द्वारा अनुभव किया जाता है। जो साधक शिव की कृपा और साधना द्वारा आत्मसाक्षात्कार प्राप्त करता है, वही शिव तत्व का सच्चा अनुभव कर सकता है।

शैव दर्शन के ‘शिव सूत्र’ ग्रंथ में बताया गया है कि शिव-तत्त्व की अनुभूति के लिए व्यक्ति को आत्मज्ञान, ध्यान और भक्ति का सहारा लेना चाहिए। जब मनुष्य अपनी अहंकार की सीमाओं से मुक्त होकर शिव तत्व को आत्मसात कर लेता है, तब उसे मोक्ष प्राप्त होता है।

शिव परम तत्त्व वह अनंत सत्य है, जो हर स्थान, हर काल, और हर जीव के भीतर विद्यमान है। वे केवल एक देवता नहीं, बल्कि अस्तित्व का मूल आधार, चैतन्य का परम स्वरूप और शाश्वत चेतना हैं। शिव की उपासना केवल मूर्ति पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि अपने भीतर स्थित शिव-तत्व की अनुभूति ही वास्तविक शिव भक्ति है।

"शिवोऽहम्" – अर्थात "मैं स्वयं शिव हूँ", यही शिव तत्व की परम अनुभूति है।

"शिव" परमात्मा का सर्वोत्तम और परम पवित्र नाम माना जाता है। शिव का अर्थ होता है "कल्याणकारी" या "मंगलकारी।" वे संहार और सृजन दोनों के प्रतीक हैं और सनातन धर्म में उन्हें परमात्मा, महादेव, और आदियोगी के रूप में पूजा जाता है।

शिव का नाम मात्र लेने से ही भक्तों को शांति, मोक्ष, और आध्यात्मिक उन्नति का अनुभव होता है। वे निराकार ब्रह्म के सगुण रूप भी हैं और निर्गुण तत्त्व भी। उनके अनेक नाम हैं, जैसे महादेव, शंकर, भोलेनाथ, रुद्र, पशुपतिनाथ, नीलकंठ, त्रिनेत्रधारी, आदि, लेकिन "शिव" नाम सर्वोत्तम और सर्वशक्तिमान माना जाता है।

निःसंदेह! शिव भाव ही सर्वोत्तम है, क्योंकि यह त्याग, समर्पण, और निर्लिप्तता का प्रतीक है। शिव का भाव हमें अहंकार से मुक्त होकर शुद्ध प्रेम, करुणा और आत्मज्ञान की ओर ले जाता है। जब हम शिव भाव में जीते हैं, तो हम समस्त द्वंद्वों से परे होकर शांति और आनंद का अनुभव करते हैं।
"शिवोऽहम्" यह भाव आत्मसाक्षात्कार की ओर ले जाता है, जहाँ हम स्वयं को शिवस्वरूप मानते हैं और संपूर्ण सृष्टि से एकात्म अनुभव करते हैं।
"शिव भाव" का अर्थ है भगवान शिव के प्रति गहरी भक्ति, समर्पण और उनकी चेतना को अपने भीतर धारण करने की भावना। यह एक आध्यात्मिक अवस्था है जिसमें व्यक्ति शिवत्व (शिव के गुणों) को अपनाने की कोशिश करता है।

शिव भाव के प्रमुख तत्व हैं-निर्मलता और शुद्धता – मन, वचन और कर्म की पवित्रता,वैराग्य – सांसारिक मोह-माया से परे रहना,शांति और स्थिरता – मन की पूर्ण शांति और संतुलन,दयालुता और करुणा – सभी जीवों के प्रति प्रेम ,निडरता और निर्भयता – मृत्यु और कष्टों का सामना करने की शक्ति ,समत्व (समानता का भाव) – सभी को एक समान देखना

शिव भाव का अर्थ केवल शिव की पूजा करना नहीं है, बल्कि उनके गुणों को अपने जीवन में उतारना और आत्मज्ञान की ओर बढ़ना है। जब व्यक्ति शिव भाव में होता है, तो वह संसार में रहते हुए भी उससे अटूट नहीं होता और जीवन को सहजता से स्वीकार करता है। आनन्द का मूल स्रोत परमसत्ता सर्वत्र व्याप्त है। यह सम्पूर्ण जगत् एक ही परमात्मा का विविध रूपों में विस्तार है। अज्ञानतावश जीव स्वयं से ईश्वर की अभिन्नता और नित्य विद्यमानता को अनुभूत नही कर पाता अर्थात् आत्म-विस्मृति ही समस्त दुःखों का कारण है। विवेक, सद्-विचार और ईश्वर अनुग्रह द्वारा अभेदता की अनुभूति कर स्वयं में अंतर्निहित परमानन्द स्वरूप को अनुभव करें और यही जीवन का परम् लक्ष्य भी है।

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