Special: अनिश्चितता की भंवर में विश्व, व्यापारिक क्षेत्र में अमेरिका द्वारा शुरू किये टैरिफ युद्ध के प्रभावों पर सभी की नजर

भारत के America के साथ समझोतावादी रुख से एकदम विपरीत चीन ने America द्वारा प्रस्तुत की गई व्यापार युद्ध की ललकार को बाकायदा स्वीकार कर लिया है। विस्तारवादी चीन ने America के साम्राज्यवादी चेहरे से नका....

By INA News Desk
Apr 21, 2025 - 23:53
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Special: अनिश्चितता की भंवर में विश्व, व्यापारिक क्षेत्र में अमेरिका द्वारा शुरू किये टैरिफ युद्ध के प्रभावों पर सभी की नजर
Photo: Social Media

By प्रभात कुमार रॉय

America के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) द्वारा अपने प्रथम कार्यकाल में केवल चीन के विरुद्ध व्यापार युद्ध का आगाज किया गया था। America में चीन द्वारा निर्यात किए जाने वाले सामान पर पच्चीस प्रतिशत टैरिफ (Tariff) आयद कर दिया गया था। पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडेन के कार्यकाल में भी चीन से आयातित सामान पर ट्रंप सरकार द्वारा आयद किए गए टैरिफ (Tariff) को बाकायदा जारी रखा गया।। किंतु अपने दूसरे कार्यकाल में राष्ट्रपति ट्रंप ने भारत सहित समस्त विश्व के विरुद्ध व्यापार युद्ध का ऐलान कर दिया है। डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) द्वारा चीन पर 125 प्रतिशत टैरिफ (Tariff) आयद कर दिया गया है। व्यापार युद्ध में चीन द्वारा America के विरुद्ध अपनी जवाबी कार्यवाही अंजाम देते हुए, चीन द्वारा America से आयातित सामान पर 125 प्रतिशत टैरिफ (Tariff) आयद करने का ऐलान कर दिया गया।

अमेरिकन हुकूमत द्वारा अधिकतर देशों को फिलहाल आयद किए गए टैरिफ (Tariff) रेट को आगामी 90 दिनों के लिए स्थगित करके कुछ राहत प्रदान कर दी गई है। यदि डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) 90 दिनों के टैरिफ (Tariff) के स्थगन के पश्चात पूर्व प्रस्तावित अपने टैरिफ (Tariff) योजनाओं पर बाकायदा अमल अंजाम देते हैं, तो फिर विगत वर्ष के मुकाबले 28 प्रतिशत टैरिफ (Tariff) दर से इस वर्ष America को भारत के निर्यात में तकरीबन आठ अरब डॉलर अथवा तकरीबन सात प्रतिशत की गिरावट आ सकती है। वस्तुत: विश्व पटल पर भारत पांचवीं सबसे बड़ी और तीव्र गति से विकास करती हुई अर्थव्यवस्था है। इसके बावजूद संरक्षणवादी व्यापार नीतियों द्वारा भारत को वैश्विक व्यापार की प्रतिस्पर्धा में पीछे धकेल दिया है।

भारत में टैरिफ (Tariff) रेट तुलनात्मक तौर पर ऊंचे रहे हैं। वैश्विक निर्यात में भारत की हिस्सेदारी महज दो प्रतिशत से भी कम रही है। डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) के प्रेसिडेंट निर्वाचित होने के तत्पश्चात America की व्यापार नीतियों में बुनियादी बदलाव आ गया है। भारत को भी इस विकट नीतिगत बदलाव से यकीनन जूझना ही होगा। वैश्विक व्यापार पर निर्भर रहने वाले मुल्कों के मुकाबले भारत इन मुश्किल हालात में किसी हद तक खुद को निश्चिंत महसूस कर सकता है, क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था की निर्भरता वैश्विक व्यापार पर अत्यंत कमतर बनी रही है। वैश्विक व्यापार के क्षेत्र में भारत का कमतर योगदान वस्तुतः भारत के पक्ष में प्रतिबिंब हो सकता है।भारत आमतौर पर वैश्विक व्यापार से किनारा करता रहा है और यही बात संभवत हमारे लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। लेकिन इस स्थिति से भारतवासी कदाचित संतुष्ट नहीं हो सकते, भारत को वैश्विक व्यापार में नए अवसरों को तलाशने के लिए सदैव तत्पर रहना होगा। साथ ही वैश्विक व्यापार के लिए शनः शनः रणनीतिक तौर पर संरक्षणवादी नीतियों का परित्याग करना होगा। उल्लेखनीय है भारत द्वारा America के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझोता करने के लिए कूटनीतिक वार्ता की जा रही है। जिनमें अब और तेजी आने की संभावना है। 

ट्रंप के टैरिफ (Tariff) ने जहां विदेशों में माल बेचने को और अधिक चुनौतीपूर्ण बनाया है, वहीं दुनिया के देशों को नये व्यापारिक साझेदारों और मंडियां खोजने पर विवश भी किया है। भारत को इसका लाभ उठाकर यूरोपीय संघ, America, कनाडा, ब्रिटेन, लैटिन अमेरिकी और अफ्रीकी देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते अंजाम देने चाहिए। भारत को इलेक्ट्रॉनिक और मोटर के कल-पुर्जों और दवाओं के एपीआई का सप्लाई चेन सुरक्षित बनाने के लिए भी अपने देश में निर्मित किए जाने की प्राथमिकता देनी चाहिए। इससे चीन के साथ चल रहे व्यापार घाटे और पूंजी पलायन में भी कमी आ जाएगी। भारत के दवा उद्योग पर भी टैरिफ (Tariff) की तलवार लटकी है, क्योंकि उसके एपीआई रसायन चीन से आयात किये जा रहे हैं।

यह सही है कि पिछले 30-40 वर्ष से America को निरंतर वैश्विक व्यापार में घाटा हो रहा है और उसकी तकरीबन एक लाख करोड़ डॉलर पूंजी प्रतिवर्ष लाभ कमाने वाले देशों में जा रही है। इनमें चीन, यूरोपीय संघ, आसियान, मेक्सिको, वियतनाम, जापान और कनाडा प्रमुख हैं। विगत चार दशकों के कालखंड में America के 90 हजार कारखाने बंद हुए हैं और उन कारखानों में काम करने वाले 55 लाख कर्मचारियों की नौकरियां चली गई हैं। डोनॉल्ड ट्रंप America के इसी व्यापार घाटे को घटा करके अमेरिकी पूंजी का पलायन रोकना चाहते हैं और America के विनिर्माण क्षेत्र को पुनर्स्थापित करना चाहते हैं। ट्रंप दुनिया के तमाम देशों पर "रेसिप्रोकल टैरिफ (Tariff) " या बराबर का टैरिफ (Tariff) लगाना चाहते हैं यानी उन देशों के सामानों पर उतना ही आयात शुल्क लगाना जितना वे अमेरिकी सामानों पर आयद करते हैं।राष्ट्रपति ट्रंप का कहना है कि अन्य देश अमेरिकी सामानों के आयात पर, America को निर्यात होने वाले अपने सामानों की तुलना में अधिक टैरिफ (Tariff) लगाते हैं। ट्रंप का मानना है कि America के "व्यापारिक साझेदार America के साथ भेदभाव करते हैं और ऐसा दोस्त और विरोधी, दोनों तरह के देश करते हैं।" भारत के America के साथ समझोतावादी रुख से एकदम विपरीत चीन ने America द्वारा प्रस्तुत की गई व्यापार युद्ध की ललकार को बाकायदा स्वीकार कर लिया है। विस्तारवादी चीन ने America के साम्राज्यवादी चेहरे से नकाब उतारने की पहल अंजाम दे दी है। अपने आर्थिक पराभव से परिपूर्ण पतनशील युग में महाशक्ति America के प्रेसिडेंट ट्रंप अपने फरमानों से सारी दुनिया का आर्थिक एजेंडा तय करने की हैसियत में है अथवा नहीं है, इसका फैसला तो अभी शेष है तथा भविष्य में होना है। व्यापार युद्ध स्वीकार करने के चीन के संकल्प की तुलना वस्तुतः तीन वर्ष पहले रूस द्वारा अंजाम दी गई आक्रामक सैन्य पहल से भी की जा सकती है।

जबकि यूक्रेन के विरुद्ध सैन्य कार्यवाही शुरू करके America और उसके नेतृत्व में नाटो अर्थात अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन को रणनीतिक क्षेत्रों में अपनी सैन्य शर्तें थोप देने की ताकत को रूस द्वारा प्रबल आक्रामक सैन्य चुनौती पेश की गई थी। वस्तुत: विश्व पटल पर परिवर्तित होते हुए शक्ति संतुलन के परिदृश्य को समझने और स्वीकार करने तत्परता America द्वारा कदाचित दिखाई नहीं गई। America यदि अपने नव साम्राज्यवादी फितरत को तिलांजलि दे देता तो यह संभव था कि सन् 2022 में प्रारम्भ हुए यूक्रेन युद्ध और उससे भी कहीं घातक व्यापार युद्ध के भयानक दुष्प्रभावों से दुनिया संभवत बच निकली होती। वाशिंगटन स्थित चीनी दूतावास की सोशल मीडिया साइट एक्स कहा गया कि अगर America व्यापार युद्ध या किसी अन्य प्रकार का युद्ध चीन के विरुद्ध लड़ना चाहता है तो हम उसे युद्ध को आखिर तक लड़ने के लिए प्रतिबद्ध है।

पश्चिमी के साम्राज्यवादी देशों द्वारा तकरीबन तीन सौ साल तक बाकी दुनिया पर अपनी हुकूमत कायम रखी गईं। साम्राज्यवादी फितरत की घातक मानसिकता आज तक America एवं पश्चिमी नाटो देशों की अवचेतना में बरकरार बनी हुई है। इसलिए इसलिए America एवं पश्चिमी जगत बाकी देशों की जटिल समस्याओं पर कदाचित तवज्जो प्रदान नहीं करते। चीन की हुकूमत ने अमेरिकन व्यापार युद्ध की चुनौती को स्वीकार करने के साथ यह स्पष्ट कर दिया कि वह व्यापार संतुलन संबंधी अमेरिकन चिंताओं पर बातचीत करने के लिए तत्पर है। मगर America द्वारा चीन के विरुद्ध एक तरफा कार्रवाई अंजाम दिए जाने के ऐलान को चीन कदापि स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। अमेरिकन अखबार वॉल स्ट्रीट जनरल की एक रिपोर्ट के मुताबिक विगत ढाई महीनों में चीन ने सीधी वार्ता के लिए अमेरिकी प्रशासन से संपर्क साधने की निरंतर कोशिश जारी रखी । किंतु अमेरिकी प्रशासनिक अधिकारियों ने चीन की प्रत्येक पेशकश को अस्वीकार कर दिया।अमेरिकन प्रेसिडेंट डॉनल्ड ट्रंप को बड़ा गुमान रहा कि टैरिफ (Tariff) में बढ़ोतरी का ऐलान होने के तत्पश्चात चीन सहित बाकी मुल्कों की हुकूमत बातचीत के लिए गिड़गिड़ाते हुए America के द्वार पर आ जाएंगी। अधिकांश मुल्कों के मामले में ऐसा ही हुआ भी। मगर चीन ने America का मुकाबला करने का बड़ा जबरदस्त हौसला दिखाया। चीन इस बात को समझने का कौशल भी दिखाया कि मामला सिर्फ टैरिफ (Tariff) तक कदाचित सीमित नहीं है। जो देश तुरंत टैरिफ (Tariff) घटाने अमेरिकन शर्तों के मुताबिक बातचीत करने के लिए तैयार दिखाई दिए, उनके समक्ष America ने कुछ अन्य सख्त शर्तों को पेश कर दिया। चीन ने प्रमुख खनिजों के America को निर्यात करने पर प्रतिबंध आयद कर दिया। चीन के ऐसे कड़े कदमों का अंदाजा America के प्रशासन तथा America कथित आर्थिक विशेषज्ञ विश्लेषकों को भी नहीं था। सन् 1991 सोवियत संघ के पराभव के पश्चात विगत चार दशकों के काल में America के विरुद्ध कोई देश तनकर खड़ा नहीं हुआ।

विश्वव्यापी व्यापार युद्ध से America को हो रहे निरंतर नुकसान से America में ही गंभीर गहन संतोष भड़क उठा है। मगर इस सारे परिदृश्य में चीन के साथ जारी व्यापार युद्ध में किसी को किसी राहत की कोई उम्मीद नहीं है। विगत 25 वर्षो में आर्थिक एवं तकनीकी महाशक्ति के रूप में चीन का उदय हो गया , जोकि आजकल विश्व पटल पर व्यापार युद्ध का मुख्य कारण बना हुआ है। इसकी वजह से America के आर्थिक पतन की पटकथा तैयार हुई है। चीन के आर्थिक तथा सैन्य उभार को रोकना ही America की प्रमुख राष्ट्रीय नीति है।

 विश्व व्यापार संगठन के नियम कायदे कानूनों का सरासर उल्लंघन करके America के राष्ट्रपति मनमाना आचरण अंजाम दे रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से America द्वारा सन् 1928 में आर्थिक संरक्षण की नीति अख्तियार की गई थी, इसका नतीजा सामने आया वर्ष 1929-30 के काल में जबकि America ने भयानक आर्थिक मंदी का दीदार किया।था। सन् 1971 में America के राष्ट्रपति निक्सन ने आर्थिक संरक्षणवाद की नीति आयद की गई थी। परिणाम सामने आया वर्ष 1973-75 में फिर एक दफा America को भयंकर आर्थिक मंदी झेलना पड़ी। अब फिर से राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप इतिहास से गंभीर सबक लिए बिना आर्थिक संरक्षणवादी नीति के तहत दुनिया को व्यापार युद्ध में झोंक देने के लिए कटिबद्ध है,। देखिए भविष्य में क्या परिणाम सामने आता है। ट्रंप के America ग्रेट अगेन के नारे के तहत।America डूबेगा या उभरेगा यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।

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