राजनगर एक्सटेंशन में शोक की लहर: 13 वर्षों तक कोमा में मौत से लड़ने वाले जांबाज हरीश राणा का एम्स में निधन।

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जनपद अंतर्गत राजनगर एक्सटेंशन की एक आवासीय सोसाइटी में मंगलवार का दिन एक अत्यंत हृदयविदारक समाचार

Mar 25, 2026 - 14:06
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राजनगर एक्सटेंशन में शोक की लहर: 13 वर्षों तक कोमा में मौत से लड़ने वाले जांबाज हरीश राणा का एम्स में निधन।
राजनगर एक्सटेंशन में शोक की लहर: 13 वर्षों तक कोमा में मौत से लड़ने वाले जांबाज हरीश राणा का एम्स में निधन।
  • बीटेक छात्र की अधूरी रही जिंदगी की जंग, 2013 में हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के बाद स्थायी कोमा में चले गए थे हरीश
  • माता-पिता के अटूट संघर्ष और सेवा का हुआ दुखद अंत, गाजियाबाद की सोसाइटी में पसरा सन्नाटा, नम आंखों से दी गई विदाई

उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद जनपद अंतर्गत राजनगर एक्सटेंशन की एक आवासीय सोसाइटी में मंगलवार का दिन एक अत्यंत हृदयविदारक समाचार लेकर आया। पिछले 13 वर्षों से जीवन और मृत्यु के बीच एक अदृश्य पतली लकीर पर खड़े 33 वर्षीय हरीश राणा ने अंततः दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में अपनी अंतिम सांस ली। हरीश का निधन केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं है, बल्कि यह उस लंबे और धैर्यपूर्ण संघर्ष का अंत है, जिसे उनके परिवार ने एक दशक से भी अधिक समय तक हर पल जिया था। जैसे ही उनके पार्थिव शरीर के सोसाइटी में पहुंचने की सूचना मिली, वहां रहने वाले हर निवासी की आंखें नम हो गईं। पूरा माहौल एक गहरे शोक में डूब गया और लोग उस नियति को कोसते नजर आए जिसने एक होनहार युवक के जीवन को एक कमरे और बिस्तर तक सीमित कर दिया था।

हरीश राणा की दुखद कहानी साल 2013 में शुरू हुई थी, जिसने उनके पूरे परिवार के सपनों को एक पल में चकनाचूर कर दिया था। उस समय हरीश मात्र 20 वर्ष के थे और चंडीगढ़ के एक प्रतिष्ठित संस्थान से बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। एक होनहार छात्र के रूप में उनका भविष्य उज्ज्वल दिखाई दे रहा था, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिरने के कारण उन्हें सिर में इतनी गंभीर चोटें आईं कि वे 'परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट' (PVS) में चले गए। इस चिकित्सा स्थिति का अर्थ था कि उनका शरीर तो जीवित था, लेकिन उनका मस्तिष्क बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट चुका था। वे न तो बोल सकते थे, न देख सकते थे और न ही अपनी भावनाओं को व्यक्त कर सकते थे। वह एक ऐसा हादसा था जिसने एक हंसते-खेलते छात्र को अचानक एक जीवित जड़वत स्थिति में पहुंचा दिया।

इन 13 वर्षों के दौरान हरीश के माता-पिता ने जो संघर्ष किया, वह आधुनिक युग में त्याग और प्रेम की एक अनूठी मिसाल है। उनके पिता, जो पेशे से एक साधारण नौकरीपेशा व्यक्ति थे, ने अपने बेटे के इलाज के लिए अपनी पूरी जमा-पूंजी और संसाधन झोंक दिए थे। घर के एक कमरे को आईसीयू में बदल दिया गया था, जहां चौबीसों घंटे ऑक्सीजन, नेबुलाइजर और विशेष चिकित्सा उपकरणों की व्यवस्था रहती थी। हरीश को नली के जरिए तरल भोजन दिया जाता था और उनकी मां ने एक नर्स की तरह उनकी सेवा की। उन्होंने न केवल उनके शरीर की साफ-सफाई का ध्यान रखा, बल्कि बिस्तर पर घाव (Bedsores) न हों, इसके लिए हर कुछ घंटों में उनकी करवटें बदलना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया था। यह माता-पिता की तपस्या ही थी कि हरीश इतने लंबे समय तक संक्रमण मुक्त रहकर जीवित रह सके। स्थायी वेजिटेटिव स्टेट (PVS) एक ऐसी स्थिति है जिसमें रोगी जागता हुआ तो प्रतीत होता है (आंखें खोल सकता है), लेकिन उसमें जागरूकता या संज्ञानात्मक कार्यप्रणाली का पूर्ण अभाव होता है। हरीश के मामले में उनके मस्तिष्क के ऊपरी हिस्से को इतनी गहरी क्षति पहुंची थी कि डॉक्टरों ने भी सुधार की उम्मीदें लगभग छोड़ दी थीं, फिर भी परिवार ने उम्मीद का दामन थामे रखा।

हाल के कुछ दिनों में हरीश की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी थी, जिसके कारण उन्हें तुरंत गाजियाबाद से दिल्ली के एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया। वहां डॉक्टरों की एक विशेष टीम ने उन्हें बचाने के भरसक प्रयास किए, लेकिन उनके शरीर के अंगों ने धीरे-धीरे काम करना बंद कर दिया था। 13 साल के लंबे कोमा ने उनके शरीर को बेहद कमजोर कर दिया था और अंततः मंगलवार को उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर मिलते ही राजनगर एक्सटेंशन की सोसाइटी के लोग उनके घर की ओर दौड़ पड़े। वहां मौजूद हर व्यक्ति हरीश के चेहरे को देख रहा था, जो अब पूरी तरह शांत था, मानो वह उस लंबी पीड़ा और बेड़ियों से मुक्त हो गया हो जिसने उसे एक दशक से अधिक समय तक जकड़े रखा था।

हरीश के संघर्षपूर्ण जीवन ने इच्छा मृत्यु (Euthanasia) जैसे संवेदनशील विषयों पर भी समाज और कानूनी गलियारों में एक बहस को जन्म दिया था। उनके परिवार ने कुछ साल पहले अदालतों का दरवाजा भी खटखटाया था, ताकि उनके बेटे को इस कष्टदायी जीवन से मुक्ति मिल सके। हालांकि, भारतीय कानून की जटिलताओं और नैतिक मूल्यों के बीच यह मामला लंबित रहा। पिता ने अपनी याचिका में बार-बार यह कहा था कि वे अपने बेटे को घुट-घुट कर मरते हुए नहीं देख पा रहे हैं और उनके पास अब इलाज के लिए पैसे भी खत्म होते जा रहे हैं। यह एक पिता की बेबसी थी जो अपने जवान बेटे के निर्जीव शरीर को रोज अपनी आंखों के सामने देखते थे, लेकिन कानून और व्यवस्था के कारण वे उसे शांतिपूर्ण विदाई भी नहीं दे पा रहे थे।

सोसाइटी के निवासियों ने बताया कि हरीश का परिवार बहुत ही मिलनसार और धैर्यवान रहा है। इतने वर्षों की पीड़ा के बावजूद उन्होंने कभी किसी से शिकायत नहीं की और न ही समाज के सामने अपनी लाचारी का प्रदर्शन किया। हरीश के कमरे से अक्सर दवाओं की गंध आती थी, लेकिन वहां मौजूद उसकी मां की ममता उस गंध पर भारी पड़ती थी। अंतिम संस्कार के समय जब हरीश की अंतिम यात्रा निकली, तो पूरे राजनगर एक्सटेंशन में सन्नाटा पसरा था। लोगों ने अपनी बालकनियों से पुष्प वर्षा की और उस योद्धा को नमन किया जिसने इतने वर्षों तक बिना कुछ कहे मौत को मात दी थी। उनके दोस्तों के लिए भी यह एक भावुक क्षण था, जो आज विभिन्न क्षेत्रों में सफल हैं, लेकिन अपने उस दोस्त को कभी नहीं भूल पाए जो 20 साल की उम्र में ही वक्त के साथ थम गया था।

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