Ajab Gajab News: 18 साल की बेटी, 21 साल की मां- बिहार में कन्यादान योजना में बड़ा घोटाला, पढ़ें पूरी खबर। 

बिहार के मोतिहारी जिले में मुख्यमंत्री कन्यादान योजना में एक हैरान करने वाला घोटाला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था और सामाजिक योजनाओं...

Apr 30, 2025 - 20:11
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Ajab Gajab News: 18 साल की बेटी, 21 साल की मां- बिहार में कन्यादान योजना में बड़ा घोटाला, पढ़ें पूरी खबर। 

मोतिहारी / बिहार। बिहार के मोतिहारी जिले में मुख्यमंत्री कन्यादान योजना में एक हैरान करने वाला घोटाला सामने आया है, जिसने प्रशासनिक व्यवस्था और सामाजिक योजनाओं की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस घोटाले में कुछ लाभार्थियों के दस्तावेजों में मां और बेटी की उम्र का अंतर मात्र 3 से 7 साल पाया गया। उदाहरण के लिए, एक मामले में पत्नी की उम्र 21 साल थी, जबकि उसकी बेटी की उम्र 18 साल दर्ज की गई थी! यह खुलासा न केवल अजब-गजब है, बल्कि सरकारी योजनाओं में मिलीभगत और लापरवाही को भी उजागर करता है।

मुख्यमंत्री कन्यादान योजना बिहार सरकार की एक सामाजिक कल्याण योजना है, जिसका उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की बेटियों की शादी में सहायता करना है। पात्र परिवारों को बेटी की शादी के लिए 50,000 रुपये की वित्तीय सहायता दी जाती है। लड़की की उम्र 18 साल से अधिक होनी चाहिए और परिवार की वार्षिक आय 60,000 रुपये से कम होनी चाहिए। शादी के समय दूल्हे की उम्र 21 साल से अधिक होनी चाहिए। आवेदन के लिए आधार कार्ड, आय प्रमाण पत्र, विवाह निमंत्रण पत्र, और अन्य दस्तावेज जमा करने होते हैं। आवेदन की जांच के बाद राशि सीधे लाभार्थी के बैंक खाते में ट्रांसफर की जाती है। यह योजना गरीब परिवारों के लिए वरदान मानी जाती है, लेकिन हाल के खुलासे ने इसके दुरुपयोग को उजागर किया है।

मोतिहारी जिले के श्रम विभाग में कन्यादान योजना के तहत प्राप्त आवेदनों की जांच के दौरान अधिकारियों को कुछ दस्तावेजों में गड़बड़ी दिखी। कई आवेदनों में मां और बेटी की उम्र में असामान्य रूप से कम अंतर पाया गया। एक मामले में पत्नी की उम्र 21 साल और उसकी बेटी की उम्र 18 साल थी, यानी सिर्फ 3 साल का अंतर। एक अन्य मामले में मां की उम्र 25 साल और बेटी की उम्र 18 साल थी, यानी 7 साल का अंतर। कुछ दस्तावेजों में माता-पिता की उम्र 22-23 साल थी, जबकि उनकी बेटी 17-18 साल की थी। जांच में पाया गया कि कई आवेदनों में आधार कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र, और आय प्रमाण पत्र फर्जी थे। कुछ मामलों में एक ही परिवार के कई सदस्यों ने अलग-अलग बेटियों के नाम पर आवेदन किया।

स्थानीय बिचौलियों और कुछ सरकारी कर्मचारियों की मिलीभगत से फर्जी लाभार्थियों को योजना का लाभ दिया गया। यह घोटाला तब सामने आया, जब एक सतर्क अधिकारी ने दस्तावेजों की गहन जांच शुरू की। मोतिहारी के श्रम विभाग में हड़कंप मच गया, और उच्च अधिकारियों ने तत्काल जांच के आदेश दिए। प्रारंभिक जांच में कम से कम 50 से 100 आवेदनों में अनियमितताएं पाई गई हैं। कुल कितने फर्जी लाभार्थियों को राशि दी गई, इसका आंकड़ा अभी स्पष्ट नहीं है। प्रत्येक लाभार्थी को 50,000 रुपये दिए जाते हैं। अगर 100 फर्जी आवेदन भी स्वीकृत हुए, तो कम से कम 50 लाख रुपये का नुकसान हुआ होगा। यह घोटाला मुख्य रूप से मोतिहारी जिले में उजागर हुआ है, लेकिन अन्य जिलों में भी ऐसी गड़बड़ियों की आशंका जताई जा रही है।

  • घोटाले के खुलासे के बाद बिहार सरकार और स्थानीय प्रशासन ने त्वरित कदम उठाए

जांच समिति का गठन: मोतिहारी के जिला मजिस्ट्रेट ने एक विशेष जांच समिति बनाई, जो सभी आवेदनों की दोबारा जांच कर रही है। समिति में श्रम विभाग, पुलिस, और सामाजिक कल्याण विभाग के अधिकारी शामिल हैं।

आरोपियों पर कार्रवाई: कई बिचौलियों और संदिग्ध कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया है। कुछ लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की गई है, जिसमें धोखाधड़ी और सरकारी धन के दुरुपयोग के आरोप शामिल हैं।

दस्तावेजों की स्क्रूटनी: सभी पुराने और नए आवेदनों की डिजिटल और मैनुअल जांच शुरू की गई है। आधार कार्ड और अन्य दस्तावेजों को UIDAI डेटाबेस से मिलाया जा रहा है।

सख्त दिशा-निर्देश: सरकार ने भविष्य में ऐसी गड़बड़ियों को रोकने के लिए कड़े नियम लागू करने का फैसला किया है, जैसे बायोमेट्रिक सत्यापन और डिजिटल ट्रैकिंग। घोटाले के पीछे के कारणइस घोटाले के लिए कई कारकों को जिम्मेदार माना जा रहा है. स्थानीय स्तर पर अधिकारियों की लापरवाही और बिचौलियों के साथ मिलीभगत ने फर्जी दस्तावेजों को मंजूरी दी। कई ग्रामीण परिवारों को योजना की शर्तों की पूरी जानकारी नहीं होती, जिसका फायदा बिचौलिये उठाते हैं। दस्तावेजों की आसान नकल: आधार कार्ड और अन्य दस्तावेजों की फोटोकॉपी आसानी से बनाई जा सकती है, जिससे फर्जीवाड़ा बढ़ा। आवेदनों की प्रारंभिक जांच में उम्र जैसे बुनियादी तथ्यों को नजरअंदाज किया गया। सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाइस घोटाले ने बिहार में सामाजिक और राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रियाएं पैदा की हैं। 

X पर यूजर्स ने इस घोटाले का जमकर मजाक उड़ाया। एक यूजर ने लिखा, "बिहार में मां-बेटी का अंतर 3 साल! यह तो गिनीज बुक में जाना चाहिए!" एक अन्य ने टिप्पणी की, "कन्यादान योजना नहीं, यह तो जुगाड़ योजना बन गई। "विपक्ष का हमला: विपक्षी दलों, खासकर राजद और कांग्रेस, ने नीतीश कुमार सरकार पर निशाना साधा। राजद नेता तेजस्वी यादव ने कहा, "यह घोटाला सरकार की नाकामी का सबूत है। गरीबों की मदद के नाम पर लूट हो रही है। "

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जदयू के प्रवक्ता ने कहा कि घोटाले की जांच चल रही है और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। उन्होंने इसे "स्थानीय स्तर की चूक" करार दिया। वास्तविक लाभार्थियों को नुकसान: फर्जी आवेदनों के कारण कई जरूरतमंद परिवारों को योजना का लाभ नहीं मिल पा रहा है। कुछ परिवारों ने शिकायत की कि उनके आवेदन बिना कारण रिजेक्ट कर दिए गए।

इस घोटाले ने सरकारी योजनाओं पर लोगों का भरोसा कम किया है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग अब आवेदन करने से हिचक रहे हैं। अंततः करदाताओं पर पड़ता है।

  • इससे पहले के घोटाले

बिहार में सरकारी योजनाओं में घोटाले कोई नई बात नहीं हैं।

2013 का चारा घोटाला: लालू प्रसाद यादव से जुड़ा यह घोटाला देश का सबसे चर्चित घोटाला था, जिसमें पशुपालन विभाग में फर्जी बिलों से करोड़ों रुपये की हेराफेरी की गई।

2022 का शौचालय घोटाला: बिहार में स्वच्छ भारत मिशन के तहत फर्जी लाभार्थियों को शौचालय निर्माण के लिए राशि दी गई।

2024 का राशन कार्ड घोटाला: कई जिलों में मृतकों और फर्जी लोगों के नाम पर राशन कार्ड बनाए गए। ये घटनाएं प्रशासनिक सुधारों की जरूरत को रेखांकित करती हैं।

सभी आवेदनों का आधार और बायोमेट्रिक सत्यापन अनिवार्य किया जाए। दस्तावेजों की जांच के लिए स्वतंत्र एजेंसियों को शामिल किया जाए। ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को योजना की शर्तों और बिचौलियों से बचने के बारे में जागरूक किया जाए। फर्जीवाड़े में शामिल बिचौलियों और अधिकारियों पर भारी जुर्माना और जेल की सजा होनी चाहिए। आवेदन और भुगतान की प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल और पारदर्शी बनाया जाए।

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