उत्तराखंड के 25 वर्ष- जानिए शहीदों की कुर्बानी से बनी देवभूमि की प्रगति और चुनौतियों के बारे में
उत्तराखंड आंदोलन की जड़ें बहुत गहरी हैं। 19वीं सदी के शुरुआती दिनों से ही पहाड़ी क्षेत्रों में अलग राज्य की मांग उठ रही थी। ब्रिटिश काल में गढ़वाल और कुमाऊं के राजा-रजवाड़ों को मिलाने के बाद भी स्थानीय
उत्तराखंड अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूरे कर रहा है। 9 नवंबर 2000 को उत्तर प्रदेश से अलग होकर बने इस राज्य ने लंबे संघर्ष, शहीदों की शहादत और लोगों के जज्बे से नई ऊंचाइयों को छुआ है। मसूरी के प्रसिद्ध इतिहासकार गोपाल भारद्वाज ने हाल ही में राज्य आंदोलन के उन सुनहरे और कष्टपूर्ण पलों को याद किया, जब पहाड़ी इलाकों के लोग अलग राज्य की मांग को लेकर सड़कों पर उतरे थे। उन्होंने दुर्लभ तस्वीरें दिखाईं, जिनमें आंदोलनकारियों का जोश और दर्द साफ झलकता है। ये तस्वीरें न सिर्फ इतिहास हैं, बल्कि उत्तराखंड की पहचान का प्रतीक हैं। आज राज्य रजत जयंती मना रहा है, लेकिन भारद्वाज का कहना है कि शहीदों का सपना अभी पूरा नहीं हुआ। रोजगार की कमी, पहाड़ों से पलायन और पर्यावरण की रक्षा जैसी चुनौतियां बरकरार हैं।
उत्तराखंड आंदोलन की जड़ें बहुत गहरी हैं। 19वीं सदी के शुरुआती दिनों से ही पहाड़ी क्षेत्रों में अलग राज्य की मांग उठ रही थी। ब्रिटिश काल में गढ़वाल और कुमाऊं के राजा-रजवाड़ों को मिलाने के बाद भी स्थानीय लोग अपनी अलग पहचान और विकास की चाहत में थे। स्वतंत्र भारत में यह मांग और तेज हुई। 1938 में श्रीनगर कांग्रेस अधिवेशन में जवाहरलाल नेहरू ने पहाड़ी इलाकों के लिए विशेष व्यवस्था का समर्थन किया। लेकिन असली आंदोलन 1950 के दशक में शुरू हुआ। 13 जून 1955 को मसूरी नगर पालिका परिषद में पहली बार अलग राज्य की औपचारिक मांग उठी। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के नेता पीसी जोशी ने पहाड़ी जिलों के कम विकास पर जोर दिया। वहां शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाएं मैदानी इलाकों की तुलना में बहुत पीछे थीं। पहाड़ी लोग महसूस करते थे कि उत्तर प्रदेश की बड़ी सरकार उनकी छोटी-छोटी जरूरतों को नजरअंदाज कर रही है।
1960 के दशक में चिपको आंदोलन ने इस मांग को नई ताकत दी। चिपको, जो पेड़ों को गले लगाकर बचाने का आंदोलन था, ने पर्यावरण संरक्षण को राज्य आंदोलन से जोड़ दिया। 1973 में चिपको गांव में महिलाओं ने ठेकेदारों को पेड़ काटने से रोका। सुंदरलाल बहुगुणा और गौरा देवी जैसे नेताओं ने दिखाया कि जंगल बचाना पहाड़ बचाना है। चिपको ने न सिर्फ वनों की रक्षा की, बल्कि महिलाओं को आंदोलन की मुख्यधारा में लाया। यह आंदोलन कुमाऊं और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों में फैला, जहां लोग जंगलों पर अपनी जिंदगी चलाते थे। चिपको की सफलता से लोगों को लगा कि अलग राज्य बनने पर ही स्थानीय संसाधनों पर उनका अधिकार मजबूत होगा। 1974 में नैनादेवी मेले में चिपको ने पहली बार बड़े स्तर पर प्रदर्शन किया। इसके बाद रामनगर और कोटद्वार जैसे इलाकों में वन नीलामी रोकने के आंदोलन हुए।
1979 में मसूरी में उत्तराखंड क्रांति दल का गठन हुआ। यह पहली राजनीतिक पार्टी थी, जो पूरी तरह अलग राज्य की मांग पर केंद्रित थी। पार्टी ने जनसभाओं और पैदल यात्राओं से लोगों को जोड़ा। 1980 के दशक में आंदोलन ने नई गति पकड़ी। 1990 के दशक में यह जन आंदोलन बन गया। 2 अगस्त 1994 को एमजी कॉलेज, रुड़की में आरक्षण विरोधी आंदोलन राज्य आंदोलन से जुड़ गया। पहाड़ी इलाकों में आरक्षण नीति को लेकर असंतोष था, क्योंकि यह स्थानीय युवाओं के हितों को नुकसान पहुंचा रही थी। छात्रों ने सड़कों पर उतरकर नारेबाजी की। फिर 1 सितंबर 1994 को खटीमा गोलीकांड हुआ। पूर्व सैनिकों और छात्रों की रैली पर पुलिस ने फायरिंग की, जिसमें 25 से ज्यादा लोग मारे गए। यह आंदोलन का टर्निंग पॉइंट था।
अगले दिन 2 सितंबर को मसूरी में शहीद भवन के पास शांतिपूर्ण मार्च निकाला गया। लेकिन पुलिस ने फिर गोली चला दी। छह आंदोलनकारी शहीद हुए और एक सीओ की मौत हो गई। गोपाल भारद्वाज ने इन घटनाओं की तस्वीरें दिखाईं, जहां आंदोलनकारी खून से लथपथ थे, लेकिन उनका जज्बा नहीं टूटा। अक्टूबर 1994 में मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा कांड ने आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचा दिया। दिल्ली की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी हुई, सात लोग शहीद हुए। महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार की खबरों ने पूरे देश को हिला दिया। 3 अक्टूबर को पौड़ी में जीत बहादुर गुरुंग पहले शहीद बने। 7 अक्टूबर को देहरादून में एक महिला कार्यकर्ता की मौत हुई। 15 अक्टूबर को कर्फ्यू के दौरान एक और शहीद हुआ। इन घटनाओं ने हजारों लोगों को सड़कों पर उतार दिया। कर्मचारियों ने तीन महीने हड़ताल की। दिल्ली में संयुक्त मोर्चा के बैनर तले बड़े प्रदर्शन हुए।
इन बलिदानों का फल मिला। 1996 में तत्कालीन प्रधानमंत्री एचडी देवे गौड़ा ने स्वतंत्रता दिवस पर उत्तरांचल राज्य का ऐलान किया। लेकिन मायावती सरकार ने इसे रोक दिया। फिर 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने उत्तर प्रदेश पुनर्गठन विधेयक पास किया। 28 अगस्त 2000 को लोकसभा में और 10 अगस्त को राज्यसभा में इसे मंजूरी मिली। राष्ट्रपति के राम नारायणन ने हस्ताक्षर किए। आखिरकार 9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड भारत का 27वां राज्य बना। नाम पहले उत्तरांचल रखा गया, लेकिन 2007 में इसे उत्तराखंड कर दिया गया।
राज्य गठन के दिन मसूरी में जबरदस्त जश्न हुआ। ढोल-नगाड़ों की थाप पर पूरा शहर गूंज उठा। लोग, महिलाएं और बच्चे हाथों में तिरंगे और राज्य झंडे लेकर सड़कों पर नाचे। "जय उत्तराखंड" के नारे लगे। गोपाल भारद्वाज ने इन जश्न की झलकियां दिखाईं, जहां परिवारों ने मिठाइयां बांटीं और आंसू बहाए। देहरादून, हरिद्वार और अन्य शहरों में भी उत्सव मनाया गया। लेकिन खुशी के साथ दुख भी था। शहीदों को याद कर कई लोगों की आंखें नम हो गईं।
25 वर्षों में उत्तराखंड ने लंबा सफर तय किया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि राज्य अब देश के अग्रणी राज्यों में शुमार है। चारधाम परियोजना और ऑल वेदर रोड से कनेक्टिविटी बेहतर हुई। पर्यटन बढ़ा, जिससे होमस्टे और साहसिक खेलों को बढ़ावा मिला। शिक्षा में आईआईटी रुड़की और स्वास्थ्य में एम्स ऋषिकेश जैसे संस्थान बने। ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट से हजारों करोड़ का निवेश आया। विधानसभा के विशेष सत्र में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने एचडीआई में सुधार की सराहना की। लेकिन चुनौतियां बरकरार हैं। पलायन सबसे बड़ी समस्या है। पहाड़ी गांव खाली हो रहे हैं, क्योंकि रोजगार नहीं। 50 फीसदी युवा मैदानी इलाकों या बाहर चले जाते हैं। स्वास्थ्य सेवाओं में डॉक्टरों की 94 फीसदी कमी है। पर्यावरण को खतरा है- बाढ़, भूस्खलन बढ़े। भारद्वाज कहते हैं, असली विकास तभी जब युवा अपनी जमीन पर रहें, जंगल सुरक्षित रहें।
रजत जयंती पर पूरे राज्य में कार्यक्रम हो रहे हैं। 1 नवंबर से 11 नवंबर तक उत्सव चलेगा। पंतनगर में किसान सम्मेलन, अल्मोड़ा में युवा कार्यक्रम, मसूरी में फिल्म कॉनक्लेव। 9 नवंबर को देहरादून के वन अनुसंधान संस्थान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मुख्य अतिथि होंगे। पुलिस लाइन में परेड हुई, जहां शहीदों को श्रद्धांजलि दी गई। कांग्रेस ने शहीद स्मारक पर कार्यक्रम किया। धामी ने कहा, अगले 25 वर्षों में राज्य को आदर्श बनाएंगे। लेकिन विपक्ष का कहना है कि विकास असमान है- मैदानी इलाके फल-फूल रहे, पहाड़ पिछड़ रहे।
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