Agriculture News: किसान को आत्मनिर्भर बनने हेतु करना होगा जल संरक्षण।
जल प्रबंधन व संरक्षण की परम्परा प्राचीन काल से चली आ रही है, जो सामाजिक ढांचे से जुड़ी...
लेखक परिचय
अरविन्द सुथार पमाना ♦वरिष्ठ कृषि एवं पर्यावरण पत्रकार, अनार एवं बागवानी विशेषज्ञ, कृषि सलाहकार, मोटिवेटर एवं किसानों के मार्गदर्शक।
[खेत तलाई आजकल हर किसान को बनानी चाहिए खेतों में जल के संरक्षण हेतु किसी अपवाह के क्षेत्र में गहरा गड्ढा करके एक छोटे तालाब का रूप दिया जाता है। जिसे फार्म पोण्ड भी कहते हैं। खेत तलाव/ खेत तलाई पर कई राज्य सरकारें किसानों को अनुदान भी देती हैं। ये बागवानी जैसी फसलें व खरीफ में फसलों के जीवन रक्षक सिंचाई के लिए काम में लिया जाता है। एक सामान्य खेत तलाई से एक किसान परिवार का कामकाज सालभर आराम से चल सकता है। कच्ची व पक्की दोनों तरह की खेत तलाई बनाई जाती है। आजकल इसमें प्लास्टिक सीट बिछाकर जल के रिसाव को रोका जाता है।]
संस्कृति में आ रहे आधुनिक बदलाव, आदिकाल की परम्पराओं और सामाजिक अवधारणाओं को प्रभावित करते नजर आ रहे हैं। जल प्रबंधन व संरक्षण की परम्परा प्राचीन काल से चली आ रही है, जो सामाजिक ढांचे से जुड़ी हुई है। जल संचयन का उल्लेख कई प्राचीन ग्रंथों में उपलब्ध है। लोगों की जल स्रोतों के प्रति धार्मिक आस्था और निर्भरता किसी से छुपी नहीं है। इसी का उदाहरण है जल स्रोतों के किनारे धार्मिक स्थलों का होना और उस बहाने जल स्रोतों की पूजा होना। परंपरागत जल स्रोत जैसे कुएं, तालाब, बावड़िया लोगों की श्रद्धा के केंद्र थे, देखा जाए तो हर छोटे-बड़े तालाब के किनारे देवताओं के मंदिर हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि परम्परा तभी जीवित रहती है जब लोगों की श्रद्धा उससे जुड़ी हुई हो।
भारत में जल संसाधन की उपलब्धता एवं प्राप्ति की दृष्टि से काफी विषमताएं हैं। जल संसाधन की उपलब्धता के अनुसार जल प्रबंधन की प्रणालियां विकसित होती हैं। जैसे हिमालय में नदी से जल संचयन प्रणाली विकसित हुई तो राजस्थान में वर्षा जल संचयन की प्रणाली। राजस्थान के लोगों ने पानी के कृत्रिम स्रोत विकसित किए, यही पानी के पारंपरिक स्रोत कहलाते हैं। नाड़ी, तालाब, जोहड़, बांध, सागर-सरोवर, कुएं, बावड़ियाँ आदि से जल संचय कर के लोगों ने कठिन जीवन को भी सहज बना दिया। पूर्व के इतिहास को खंगाला जाए तो सामरिक दुर्गा में जहां आक्रांताओं की आशंका हरदम बनी रहती थी दो-तीन वर्षों तक अपार क्षमता में जल को संरक्षित रखा जाता था और दुर्ग परिसर में निवास करने वाले लोग इसे पीने के काम में लेते थे। कई कलाप्रेमी राजाओं ने अपनी प्रीत को समर्पित बावड़ियों का निर्माण करवाया, जो आज के लिए विरासत के अद्-भूत नमूने हैं।
जहां तक मेरी जानकारी है हर गांव में अपना स्वच्छता तालाब हुआ करता था। उसकी रखवाली करने हेतु मासिक तनख्वाह पर एक पहरेदार रखते थे, उसकी तनख्वाह गांव के प्रत्येक घर से अनाज के रूप में चुकाई जाती थी। उसी तालाब से लोग पानी पीते थे और ग्रामीण मवेशियों का यही एकमात्र सहारा था। बावड़ियों से मिलते जुलते ही सुंदर रूप झालरा बनाए गए जो शासकों की शोभा बढ़ाते थे। इसके अलावा जल और सिंचाई की आपूर्ति के लिए नहरों का न केवल निर्माण करवाया था बल्कि उनके रखरखाव हेतु आवश्यक प्रशासनिक व्यवस्थाएं भी विकसित की थी। जल की आधुनिक प्रणाली में तब कमी महसूस होती है जब बिजली नहीं आती, नल में पानी सूखता है, बांध में मिट्टी भरने से पानी क्षमता नहीं रहती है। उस समय पारंपरिक प्रणालियां याद आती हैं।
देश के बहुत बड़े हिस्से में आधुनिक प्रणाली भारी लागत की वजह से पहुंच ही नहीं पाती। अतः वहां के लोग अभी भी परंपरागत जल प्रबंधन पर निर्भर हैं। नलकूपों से भारी मात्रा में भूजल निकाला जा रहा है। पारंपरिक प्रणालियों में सस्ती, आसान तकनीकी का प्रयोग होता था, जिसे स्थानीय लोग भी आसानी से बनाए रख सकते थे। वर्तमान समय में वर्षा की अनियमितता असमान वितरण से प्रत्येक व्यक्ति चिंतित है। कई सरकारी नीतियां नवीनतम तकनीकों की ओर झुकाव रखती हैं। लेकिन गौर कर लेना चाहिए कि जल संरक्षण की परंपराएं ऐसे ही नहीं पनपी थीं। जल संकट से पनपने वाले युद्धों की भविष्यवाणियां जब से सुनने में आई हैं, तब से जल संरक्षण शब्द महत्वपूर्ण हो गया है। विकासात्मक योजनाओं के अलावा परम्परागत जल प्रबंधन की प्रणालियों को विकसित किए जाने से ही इस समस्या का समाधान है।
नवीनतम रूप से पारंपरिक जल स्रोतों का विकास, बेकार या काम में ना आने वाले तालाबों का अधिग्रहण कर उन्हें पुनर्जीवित करने के साथ-साथ प्रत्येक गांव में तालाबों से सटे 5 से 10% इलाका सामुदायिक बनाने हेतु आरक्षित रखे जाने की आवश्यकता है। देश-प्रदेश में परंपरागत जल संरक्षण प्रणालियां आज समाप्त प्राय हैं। जंगलों की कटाई के कारण जल ग्रहण क्षेत्र में मिट्टी जमने के कारण तालाब उपयोग के योग्य नहीं रहे। तालाब क्षेत्र में अतिक्रमण से भूमिगत जल का स्तर नीचे चला गया है। अधिकांश कुएँ सुख गए हैं। "घर घर नल" की शिक्षित मान्यताओं ने बावड़ियों के प्रति धार्मिक आस्थाओं को कमजोर किया है।
व्यक्तियों को लाभ पहुंचाने वाली योजनाओं व सरकारी प्रोत्साहन ने परंपरागत जल प्रबंधन प्रणालियों के रखरखाव में सक्रिय सामुदायिक भागीदारी को समाप्त कर दिया है। खेती के व्यवसायीकरण व नकदी फसलों के उत्पादन ने ऐसी प्रणालियों को नकारते हुए सिंचाई की छोटी प्रणालियों की उपेक्षा की है। इसके अतिरिक्त कुछ व्यवस्थाएं चरमरा गई तो कुछ विलुप्त हो गईं। यदि हम परंपराओं की बात करें तो लोगों ने स्वयं ही अपने स्तर पर जल संचयन का कार्य किया है जो विरासत के रूप में हमारे सामने है।
खेत तलाई आजकल हर किसान को बनानी चाहिए खेतों में जल के संरक्षण हेतु किसी अपवाह के क्षेत्र में गहरा गड्ढा करके एक छोटे तालाब का रूप दिया जाता है। जिसे फार्म पोण्ड भी कहते हैं। खेत तलाव/ खेत तलाई पर कई राज्य सरकारें किसानों को अनुदान भी देती हैं। ये बागवानी जैसी फसलें व खरीफ में फसलों के जीवन रक्षक सिंचाई के लिए काम में लिया जाता है। एक सामान्य खेत तलाई से एक किसान परिवार का कामकाज सालभर आराम से चल सकता है। कच्ची व पक्की दोनों तरह की खेत तलाई बनाई जाती है। आजकल इसमें प्लास्टिक सीट बिछाकर जल के रिसाव को रोका जाता है।
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पानी सहेजने की एक और तकनीक पाई जाती थी जिसका नाम है जोहड़। ये साधारण पत्थर और मिट्टी के अवरोध होते थे। जिनका निर्माण ढलान वाली भूमि पर वर्षाजल को रोकने के उद्देश्य से किया जाता था। जोहड़ के तीन ओर पुश्ते बनाए जाते जबकि चौथा सिरा वर्षाजल के प्रवेश के लिये खुला छोड़ा जाता था। राजस्थान जल संचय की इस पम्परागत तकनीक को वर्तमान में कुछ गैर सरकारी संगठनों ने पुनर्स्थापित किया है और इसकी सहायता से आज राज्य के 700 से अधिक गाँवों की पानी की जरूरत पूरी की जा रही है।
टांका राजस्थान के रेतीले क्षेत्रों में वर्षा जल को संग्रहित करने की महत्वपूर्ण प्रणाली है। ये सूक्ष्म सरोवर की तरह कार्य करते हैं। टांके कच्चे व पक्के दोनों तरह से बनाए जाते हैं। पक्के टांके सीमेन्ट से बनते हैं। जिसके चारों और जलसंग्रहण के लिए आगोर होता है। आगोर को हमेशा साफ रखा जाता है। यहां से जल सुराखों के द्वारा टांके में गिरता है। सुराखों पर जाली लगी रहती है, जिससे कचरा अन्दर प्रवेश नहीं करे। पंचायत में बने टांके सार्वजनिक होते हैं। कुछ लोग अपने व्यक्तिगत उपयोग हेतु अपने घरों या खेतों में टांके बनवाते हैं। कुछ अमीरों द्वारा परोपकार हेतु टांके बनवाए जाते हैं जिन पर एक परिवार विशेष की देख-रेख होती है। वर्तमान में टांके से हैण्डपम्प या मोटर से पानी निकाला जाता है। परम्परागत रूपसे इसके उपर मीनारनुमा ढेंकली बनाई जाती थी जिससे पानी निकाला जाता था।
खड़ीन का पारम्परिक प्रचलन राजस्थान के मरूस्थली जिले जैसलमेर में सर्वाधिक देखने को मिलता है। खड़ीन निर्माण की परम्परा पालीवाल ब्राह्मणों ने शुरू की था। इसके निर्माण हेतु राजा भूमि उपलब्ध करवाता था, जिसके बदले उपज का एक चौथाई हिस्सा देना होता था। खड़ीन का क्षेत्र विस्तार 5 से 7 किलोमीटर तक होता था। इसके दोनों तरफ 2 से 4 मीटर ऊंची पाळ (मेड़) होती थी, तीसरी तरफ पत्थर की पक्की चादर बनाई जाती थी। पानी की मात्रा अधिक होने से अगली खड़ीन में चला जाता था। और सूखने पर पिछली खड़ीन की नमी के आधार पर फसलें उगाई जाती थी। इस तकनीकी से बंजर भूमि में भी गेहूँ आदि फसलें उगाई जाती हैं।
जल संरक्षण के स्रोतों में संचित पानी को "पालर पानी" कहते हैं। इन स्त्रोतों के संरक्षण से ही जल का संरक्षण संभव है। इनके पुनरुद्धार से कृषि अर्थव्यवस्था को सुदृढ किया जा सकता है और पुनरुद्धार का यह कार्य नई पीढी के लिए रोजगार का अवसर दे सकता है।
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खेतों में व्यक्तिगत प्रयास या सरकार की सहायता से मेड़बंदी कर खेत का पानी खेत में ही रखा जा सकता है। इसके लिए मेड़ों पर फलदार या लकड़ी वाले वानिकी पौधे भी लगा सकते हैं। नीम, अरड़ू, मिलीया दूबिया लगाकर खेत के सौन्दर्य में चार चांद लगा सकते हैं। मेड़बंदी का फायदा यह होगा कि पानी बहने से रूक जाएगा और भूमि कटाव भी नहीं होगा, जिससे मृदा संरक्षण भी हो जाएगा। हर खेत में खेत तलाई या मेड़बंदी की सहायता से जल संरक्षण होने से भूमिगत जल स्तर में सुधार होगा।
परम्परागत जल स्रोतों के माध्यम से सूखे व बाढ जैसी प्राकृतिक आपदाओं का सामना किया जा सकता है। यह महत्वपूर्ण है कि सरकार इस पर और भी अमल करे। जल का उपयोग व उपभोग करने वाले लोग इसके बचाव के लिए आगे आवें। अधिक से अधिक वृक्षारोपण करना चाहिए।
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