Agriculture News: 'लेब टू लैंड' से अगला कदम 'लैंड टू कंज्यूमर'

लेब टू लैंड' 1979 में आईसीएआर के स्वर्ण जयंती समारोह के एक कार्यक्रम के रूप में शुरू किया ...

Oct 11, 2024 - 19:36
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Agriculture News: 'लेब टू लैंड' से अगला कदम 'लैंड टू कंज्यूमर'

लेखक परिचय-

अरविन्द सुथार पमानावरिष्ठ कृषि एवं पर्यावरण पत्रकार, अनार एवं बागवानी विशेषज्ञ, कृषि सलाहकार, मोटिवेटर एवं किसानों के मार्गदर्शक।


             'लेब टू लैंड' 1979 में आईसीएआर के स्वर्ण जयंती समारोह के एक कार्यक्रम के रूप में शुरू किया गया। जिसका उद्देश्य छोटे, सीमांत किसानों और भूमिहीन खेतिहर मजदूरों की आर्थिक स्थिति में तेजी से सुधार करना है। साथ ही इसकी शुरुआत कृषि व कृषि से जुड़े दायरे में कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों द्वारा विकसित बेहतर प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण हेतु की गई। देश में विकसित हर कृषि तकनीकी इस कार्यक्रम के माध्यम से खेतों व 'दफ्तरों' तक पहुंची। कृषि, बागवानी व विपणन पूर्व की सभी गतिविधियों का हस्तांतरण इस कार्यक्रम के माध्यम से बखूबी हुआ। जिससे कृषि विकास में अभूतपूर्व वृद्धि हुई। कार्यक्रम की शुरुआत से पहले ही हरित क्रांति देश में अपने पांव पसार चुकी थी। देश खाद्यान्नों के मामले में आत्मनिर्भर हो चला था। ऐसे में कृषि विश्वविद्यालयों व अनुसंधान केंद्रों ने कृषि की कई तकनीकियां विकसित की और कृषि विज्ञान केंद्रों के माध्यम से किसानों तक पहुंचाई गई।

बहरहाल, कृषि एक ऐसे दौर में प्रवेश कर चुकी है जहां इसे आर्थिक लाभ के मापदंडों से नापा जा रहा है और इस वक्त फली फूली परिपूर्ण कृषि-दशा अन्य व्यवसायों की तुलना में हीन भावना का शिकार हो रही। कई बार कृषि को घाटे का सौदा, असफल कृषि और मजबूरी का व्यवसाय माना जाता है। 'लेब टू लैंड' से विकसित तकनीकियों से सुशोभित यह व्यवसाय आखिर रुतबा क्यों नहीं जमा पा रहा है? कहीं ना कहीं अब 'लेब टू लैंड' से आगे बढ़ने का समय आ गया है। अब नई अवधारणा "लैंड टू कंज्यूमर" के बारे में सोचना होगा। यही समय की मांग है। कृषि शिक्षा में भी इस विषय को तुरंत शामिल कर देना चाहिए। इसके अलावा अनुसंधान केंद्रों व विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी 'लेब टू लैंड' तक ही पूरी नहीं होती, बल्कि इस जिम्मेदारी को आगे बढ़ाकर "लैंड टू कंज्यूमर" तक ले जाना होगा। कृषि विज्ञान केंद्रों में भी किसान प्रशिक्षण व कृषक शिक्षा में इस विषय को प्राथमिकता देनी होगी, यहां तक कि इस पर कोई महत्वाकांक्षी योजना भी बननी चाहिए।

"लैंड टू कंज्यूमर" से मंडीकरण में निखार आएगा। यह एक ऐसा विषय बन कर उभर सकता है, जो किसानों को सक्षम करेगा। इस कल्पना को यदि साकार रूप मिल सके तो निश्चित ही गैर-कृषिगत युवा कृषि से पुनः जुड़ेंगे। किसानों की आय दोगुनी करने हेतु किसान स्वयं व्यापार की परिभाषा को समझ सकेगा। किसी आपदा के समय उपज खराब नहीं होगी। गोदामों में सड़ने वाला खाद्यान्न उपयोगी बनेगा। इतना ही नहीं कंज्यूमर व बाजार की नब्ज पहचानने में किसान को आसानी होगी। जिसकी बदौलत कृषि में और अच्छे परिवर्तन संभव है। "लैंड टू कंज्यूमर" से कृषि के कई रास्ते खुलेंगे, और कंज्यूमर के अनुसार कृषि होगी। ना कोई अपशिष्ट बचेगा, ना ही मंडियों में कृषि उपज की खराबी होगी।

कृषि विश्वविद्यालयों व महाविद्यालयों में कटाई उपरांत प्रबंध सिखाया जाता है। लेकिन उसमें भंडारण व प्रसंस्करण तक ही सीमित रहते हैं। "लैंड टू कंज्यूमर" में भंडारण, प्रसंस्करण से भी अगली सीढ़ियां पार करनी होती है। जिसमें आता है विपणन, मंडीकरण, उपभोक्ताओं की तलाश और उपभोक्ताओं को आपूर्ति। निश्चित ही "लैंड टू कंज्यूमर" कृषि को आर्थिक रूप से मजबूती देगा, जिससे प्रत्यक्षत: किसान मजबूत बनेगा। "लैंड टू कंज्यूमर" में जितनी भी गतिविधियां हो वो सभी उत्पादन करने वाले किसान को ही सिखाई जाए, तो ही किसान अपनी उपज का सही व्यापार कर सकेगा। इस अवधारणा के तहत छोटी बड़ी प्रोसेसिंग यूनिट्स लगेगी, एफपीओ व किसान समूहों के हौंसलों को ऊर्जा मिलेगी।

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अभी हाल ही कोरोना महामारी और बैमोसमी बरसात से कई किसानों के फल, सब्जी व फूलों की उपज बर्बाद हुईं। किसानों को अपनी उपज बेचने हेतु मंडी व्यापारियों व मजदूरों के अभाव में कई जगह परेशानी का सामना करना पड़ा। यदि किसान के पास भण्डारण व विपणन कौशल के अलावा उचित प्रोसेसिंग के प्रबंध व जानकारी होती तो अपनी उपज को मार्केट खुलने तक बचा सकता था और मनचाहा मूल्य प्राप्त कर सकता। यह तभी हो पाता जब "लैंड टू कंज्यूमर" की अवधारणा धरातल स्तर पर लागू हो जाती।

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