Agriculture News: जैविक खेती पर्यावरण संरक्षण हेतु आज की आवश्यकता।
किसान जो बाजार पर निर्भर है इनकी इच्छाशक्ति जगाना व इनकी मानसिकता में प्रकृति की ओर लौटने की भावना जागृत ....
लेखक परिचय
अरविन्द सुथार पमाना ♦वरिष्ठ कृषि एवं पर्यावरण पत्रकार, अनार एवं बागवानी विशेषज्ञ, कृषि सलाहकार, मोटिवेटर एवं किसानों के मार्गदर्शक।
लम्बे समय से हरित क्रान्ति और यंत्रीकरण के प्रभाव से बीज, उपज, जमीन, पानी और पर्यावरण की दशा बिगड़ने से उपज की गुणवत्ता दिनोंदिन घटती गई। खानपान में जहरीले तत्वों के आने से प्राणी मात्र के स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ा कई असाध्य बीमारियां पैदा हुई देश में खाद्यान्न की तीव्र पूर्ति के लिए खेती में रसायनों के प्रयोग कर रसायन आधारित कृषि पद्धतियों को अपनाने से ना सिर्फ जमीन विष युक्त हुई अपितु जमीन की उर्वरता और उत्पादकता में ह्रास हुआ। उत्पादन की कमी को दूर करने के लिए खेती में कई रासायनिक उर्वरकों व फसल सुरक्षा की दवाइयों के लिए किसान पूर्ण रूप से बाजार पर निर्भर हो गया। लागत इतनी अधिक बढ़ गई कि कई किसानों ने खेती करना ही छोड़ दिया नई पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जमीन और खेती का प्राकृतिक अस्तित्व में बने रहना आज के समय की मांग हो गई है। किसान के उत्पादन को बढ़ाने की बजाय अधिक लागत को कम करने पर ध्यान दिया जाना ही आज की खेती की परम आवश्यकता है।
किसान जो बाजार पर निर्भर है इनकी इच्छाशक्ति जगाना व इनकी मानसिकता में प्रकृति की ओर लौटने की भावना जागृत करने की सलाह देना व नई पीढ़ी के किसानों को जैविक खेती की और लौटाना अति आवश्यक है। इस प्रकार की खेती में किसान बाजार पर निर्भर ना रहकर अपने खेत पर निर्भर रहता है। खाद बीज फसल सुरक्षा की युक्तियां सभी प्रकार के क्रियाकलाप खेत पर उपलब्ध संसाधनों की सहायता से पूर्ण करता है। इसके लिए किसान के पास पशुपालन का होना अति आवश्यक है। पशुपालन के उचित सामंजस्य से किसान कम लागत में उतना उत्पादन ले सकते है। इससे भी अच्छी बात यह है कि खेत पर निर्भर किसान स्वयं के परम्परागत ज्ञान से उच्च गुणवत्ता युक्त उपज प्राप्त करने में सफल रहता है। जिसमें शुद्धता प्रतिशत अधिक होता है और पर्यावरण को किसी प्रकार का खतरा नहीं होता है।
साथ ही रसायनों के प्रयोग से मानव जाति के स्वास्थ्य पर बढ रहा खतरा भी रूक जाता है। इसी का नाम है जैविक खेती। यह मानव मात्र के लिए वरदान है। जिसके प्रसार प्रचार की महत्ती आवश्यकता है। कई देशों ने रासायनिक खेती करने वाले देशों से कृषि उत्पादों का आयात करना बंद कर दिया है। भारत के साथ भी यही होता जा रहा है। खाड़ी देश इसके प्रति जागरूक हो गये हैं। भारत से निर्यात होने वाले हर कृषि उत्पाद पर रासायनिक दृष्टी से पुख्ता जांचें होती हैं। जैविक खेती में मृदा स्वास्थ्य का ध्यान रखना व फसलों की पोषण आवश्यकताएं समय पर जैविक विधियों से पूर्ण करना बहुत ही जरूरी है। इसके तहत खेत की तैयारी से पहले क्रियाकलाप शुरू करने जरूरी हैं। खेत में जो कुछ भी मौजूद है उसे बचाना जरूरी होता है तभी तो लागत कम होती है क्योंकि बाजार से कुछ भी खरीदना नही होता है।
गर्मियों में गहरी जुताई के साथ खेत को सौर उपचार के लिए खुला छोड़ देते हैं। हरी खाद का प्रयोग कर भूमि की उर्वरा शक्ति को बढाया जा सकता है। खेत में उपस्थित किसी भी प्रकार के कृषि अपशिष्टों को जलाया नहीं जाता है बल्कि उन्हें उसी खेत में डिस्क हैरो से पलटकर जमीन में मिला दिया जाता है। इसके लिए खेत में पलेवा लगाकर खरपतवारों को अंकुरित होने देते हैं फिर उन्हें कच्ची अवस्था में खेत में पलट दिया जाता है। जिससे खरपतवारों का नियंत्रण हो जाता है और जो शेष बाद में उगते हैं उन्हें हाथ से ही निकाला जाता है।
जैविक खेती में पशुपालन का महत्व अधिक है। प्रत्येक किसान पशुओं से प्रप्त गोबर व मूत्र का प्रयोग अपनी खेती में कई तरीकों से कर सकता है। कम्पोस्ट बनाने की कई विधियां हैं जैसे वर्मीकम्पोस्ट, नेडेप, आदि से उच्च गुणवत्ता युक्त कम्पोस्ट का निर्माण कर स्वयं के उपयोग से बचा कम्पोस्ट बेचा भी जा सकता है।
खेती की पूर्व योजना अति आवश्यक होती है। किस ऋतु में कहां पर कौनसी फसल लगानी है यह पहले से तय रखना होता है। फसल चक्र अपना कर उचित फसल पद्धतियों से अधिक से अधिक उत्पादन लिया जा सकता है। अन्तराशस्यन व मिश्रित फसल से बीमा फसल का फायदा लिया जाता है। एक फसल को दूसरी फसल से जो लाभ होता है वे सभी सिद्धान्त इस प्रकार की जैविक खेती में उपयोगी हैं।
जैविक खेती करने वाले कई किसान अपने खेत पर जीवामृत बनाने की इकाइयां स्थापित कर फसलों की पोषण आवश्यकता पूरी कर सकते हैं। जिसे बनाने के लिए प्रत्येक इकाई में 10 किलो गौमूत्र, 10 किलो गाय का गोबर, 5 किलो गुड़, 2 किलो बेसन व 200 ग्राम वटवृक्ष के नीचे से मिट्टी लाकर डालते हैं। इन सभी को 200 लीटर के ड्रम में डालकर 48 घंटों तक एक ही दिशा में सुबह शाम पांच पांच मिनट हिलाते हैं, फिर छानकर ड्रीप व फव्वारे विधि से सिंचाई करते समय पानी के साथ अपने खेतों में चलाते हैं। जीवामृत फसलों के लिए अच्छे पोषण का कार्य करता है साथ ही कई सूक्ष्म तत्वों की पूर्ति होती है जिसके द्वारा जड़ क्षेत्र में लाभकारी सूक्ष्म जीवों की पूर्ति होती है।
गोबर को हमेशा छाया में सुखाएं, और जहां तक हो सके महिने में दो तीन बार पानी से भिगो दें व बोरों से ढककर रखें। जिससे यह कुछ ही दिनों में अच्छी खाद तैयार हो जाती है एवं किसान इसे पौधों व फसलों में डाल सकते हैं। एक अच्छी खाद का कार्य करता है। जैविक खेती में उपयोग में लिया जा रहा ट्राइकोडर्मा एक लाभकारी सूक्ष्मजीव है जो फफूँदजनित रोगों से पौधों की रक्षा करता है। जिसे भी दो रूपों में भूमि व पौधों को उपलब्ध करवाया जाता है। इसे गोबर की खाद के साथ मिलाकर पानी की नमी देकर 48 घंटों तक छांव में जूट के बोरों से ढककर पड़ा रहने देते हैं फिर इसे बुवाई के समय काम में लिया जाता है। खड़ी फसल में छिड़काव करने हेतु इसे 200 लीटर पानी व दो किलो गुड़ के साथ मिश्रण बनाकर 48 घंटों बाद फसलों पर छिड़काव किया जाता है। ट्राइकोडर्मा से बीजोपचारित भी किया जा सकता है। यह उकठा रोग को रोकने व नियंत्रित करने में सहायक है। इसके अलावा जैविक खेती में कई प्रकार के बैक्टीरिया व फफूंद उपलब्ध हैं जिन्हें काम में ले सकते हैं, और ये आवश्यक भी हैं।
जैविक खेती करने वाले किसान केंचुओं से निर्मित वर्मीकम्पोस्ट का भी उपयोग कर सकते है। इसके लिए किसान 7 फिट लम्बी 3 फिट चौड़ी व 1 से डेढ फिट ऊंची वर्मीकम्पोस्ट की पक्की बैड तैयार करके दो दिन पुराना ठण्डा गोबर व हल्के घासफूस की तह बनाकर प्रति बैड के हिसाब से डेढ से दो किलो केंचुएँ डाल देते हैं, जो कुछ ही दिनों में खाद तैयार कर देते हैं। केंचुआ किसान का मित्र होता है जो बिना मजदूरी के खाद बनाने का काम करता है। इस प्रकार से बनी खाद में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस व पोटाश के साथ साथ कई सूक्ष्म तत्व भी होते हैं जो पौधों व फसलों के आवश्यक 16 तत्वों में से कुछ तत्वों की पूर्ति कर देते हैं।
केंचुओं से प्राप्त होने वाला वर्मीवॉश भी उपयोग ले सकते है। इसे बनाने कि लिए एक बड़े व दो छोटे एक के नीचे एक क्रम से मटकों की आवश्यकता होती है। सबसे उपर के मटके में पानी भरकर एक सूक्ष्म छिद्र से बीच के या दूसरे मटके में पानी टपकता है। इस मटके में सबसे नीचे ईंटों व पत्थर के टूकड़े, उसके उपर बड़ी साइज की कंकरीट फिर उसके उपर थोड़ी मिट्टी डालकर दो तीन दिन पुराना गोबर डालकर उपर केंचुएं डालना है, उसमें प्रतिदिन दो से तीन बाल्टी पानी डालते हैं व सबसे नीचे वाली मटकी में ऊपर से बूंद बूंद के द्वारा पानी व वर्मीवॉश आता रहता है जिसे दस प्रतिशत की दर से खेत में छिड़कते हैं। वर्मीवॉश घूलनशील नाइट्रोजन का कार्य करती है। जो फसलों में प्रकाशसंश्लेषण की दर बढाता है व दानों की गुणवता को सुधारता है।
Also Read- Yaduvanshi Rajput's Kingdom Ancient historical City Bayana Through the Ages .
किसान जैविक कीटनाशक व रोगनाशक बनाना चाहें तो नीम पत्ती व नीम की टहनियों का उबला हुआ रस, आकड़ा, धतूरा, तूम्बा, करंज की पतियां, गौमूत्र, निम्बोली रस व जंगली झाड़ियों का उपयोग कर सकते हैं। इसके अलावा छाछ में तांबा घोलकर 48 घंटे बाद फसलों पर छिड़काव करते हैं जिससे चैपा, मोयला, थ्रीप्स सहित मिर्च आदि सब्जियों के कई वायरस जनित रोग जैसे पत्ती सिकुड़न आदि भी नियंत्रित हो जाते हैं। लौह तत्व की पूर्ति के लिए जीवामृत या छाछ के घोल में में लौहे की कीलें डालकर पड़ा रहने देतें हैं जिससे फसलों व पौधों में लौह तत्व की पूर्ति हो जाती है। कैल्शियम व सल्फर की पूर्ति के लिए कुछ किसान छाछ व जिप्सम का उपयोग कर सकते हैं।
What's Your Reaction?