यमुनातटीय चन्दवार राज्य के चौहान राजपूतों का गौरवशाली ऐतिहासिक शोध ।
Edited By- Vijay Laxmi Singh
यमुनातटीय चन्दवार राज्य के चौहान राजपूतों का गौरवशाली ऐतिहासिक शोध
सातवीं शताब्दी के लगभग आगरा जिले के एक भाग को चौहान राजपूतों ने अधिकृत किया और " चन्दवार " नामक स्थान को राजधानी बना कर उस प्रदेश पर शासन करने लगे । चौहानों का यह चंदवार राज्य निरन्तर उन्नति करता गया और तात्कालीन भारतीय राजनीति में उसका महत्वपूर्ण योगदान रहा ।कहा जाता है कि 7 वीं या 8 वीं सदी में अजमेर के माणिकराव नामक एक राजकुमार के नेतृत्व में चौहान राजपूतों का एक दल राजपूताना (अजमेर)से चल कर चम्बल के तटवर्ती स्थानों पर पहुंचा ।कालान्तर में इन लोगों ने यमुना पार कर कुछ प्रदेशों पर अधिकार कर लिया जो इस समय आगरा ,मैनपुरी और एटा आदि जिलों के अंतर्गत है ।इनमें से ही एक स्थान चन्दवार था जो आज फिरोजाबाद नगर से लगभग 5 किमी0 दक्षिण में यमुना तट पर स्थित है ।पहले फिरोजाबाद आगरा जिले का ही परगना था बाद में तहसील बना ।वर्तमान में चन्दवार तो एक छोटा सा गांव मात्र है जिसकी आवादी भी बहुत अधिक नहीं है ।किन्तु इस गांव के प्राचीन किले के खंडहर जो आज भी देखने में आते है उससे यह आभास अवश्य होता है कि अतीत में इसका स्वरूप कुछ दूसरा ही रहा होगा ।
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चंद्रवार नगर की स्थापना-
चंदवार नगर की स्थापना के विषय में समकालीन कवियों और इतिहासकारों में अलग अलग मत है । कवि धनपाल के ग्रन्थ बाहुवलि चरित (सन् 1397 )के अनुसार चंदवार नगर को श्री कृष्ण के पिता वसुदेव काल की नगरी बताया है ।संभावना यही है कि ये नगर अति प्राचीन काल से स्थित था किन्तु काल के थपेड़ों ने उसे निष्प्रभ एवं हींन अवस्था में पहुंचा दिया हो ।फिर दसवीं सदी में चंद्रसेन नामक चौहान राजपूत राजा ने उसे अपने राजधानी बना कर पुनः उसे आकर्षक एवं महत्व प्रदान कर दिया हो ।और वे ही चंदवार के चौहान राज के संस्थापक थे ।
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राजा चंद्रसेन के पुत्र चंद्रपाल का महमूद गजनी से युद्ध-
महमूद गजनी की सेना जब वर्तमान आगरा -मथुरा के जिलों के प्रदेश में पहुंची तो महावन के यदुवंशी राजा कुलचंद ने उसका जबरदस्त प्रतिरोध किया था ।किन्तु कुलचंद भी पराजित होगया ।इसके बाद महमूद गजनवी की दूसरी बड़ी टक्कर चंदवार के राजा चंद्रपाल से हुई ,जिसे चंद्रसेन का पुत्र बताया गया है ।कहा गया है किअपने समय में चंद्रपाल भारत के प्रमुख शक्तिशाली सामंतों में से एक था ।इटावा जिले में आज भी स्थित आसी(असाई खेड़ा )नामक स्थान के अपने किले से चंद्रपाल ने महमूद गजनवी के विरुद्ध भयानक युद्ध किया था किन्तु अंततः चंद्रपाल की ही पराजय हुई ।यह तथ्य आगरा गजेटियर से प्रमाणित होता है ।इससे सिद्ध होता है कि इस समय चंदवार के चौहानों का राज्य विस्तृत था ।
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चंद्रवार के चौहान शासक जैन धर्म के भी अनुयायी थे-
चंद्रवार के राजा चंद्रपाल के दीवान राम सिंह हारुल ने जैन मूर्तियों की प्रतिष्ठा सन् 996 एवं सन 999 ई0 में की थी इससे चंद्रपाल का अस्तित्व और राज्यकाल भी प्रमाणित हो जाता है ।बताया गया है कि सन् 1080 ई0 में चंद्रपाल के पौत्र जयपाल ने गजनी के ही एक अन्य आक्रांता के विरुद्ध आगरा में स्थित अपने किले से जबरदस्त प्रतिरोध किया था (आगरा गजेटियर 1965 पृ 33 )।चंद्रवार में चौहानों का राज्य 15 वीं सताब्दी तक रहा है ।इस बात के तो निश्चित प्रमाण है कि 13 वीं शताब्दी तक एक ही चौहान कुल परम्परागत रूप में चंदवार पर राज्य करता रहा ।यह चौहान वंश 13वीं शताब्दी से पूर्व के राजा चंद्रसेन ,चंद्रपाल ,जयपाल आदि का ही वंश था ,इसका कोई पुष्ट प्रमाण प्राप्त नहीं है ।किन्तु इसके विरोध में भी कोई प्रमाण नहीं मिलता ।इससे यही आभास होता है कि चंदवार में जिस चौहान वंश का शासन था उसके आदि से अंत तक के सभी राजा एक ही वंश के थे ।
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चंद्रवार में ही हुआ था मुहम्मद गौरी एवं जयचंद में युद्ध-
जब गौरी ने सन् 1194 में कनॉज के राजा जयचंद पर आक्रमण किया था उस समय चंदवार का चौहान राज्य भी जयचंद का करद राज्य होना चाहिए ।जयचंद ने मुहम्मद गौरी के आक्रमण का प्रतिरोध चंदवार में ही किया था जिससे ऐसा आभास होता है कि चंदवार का चौहान राज्य संभवतः कन्नौज राज्य का सीमान्त था ।भारत के भविष्य को अंधकारमय बना देने बाले इस युद्ध की रणभूमि चंदवार बना ।जयचंद की मृत्यु के बाद एक जनश्रुति के अनुसार चंदवार के शक्तिशाली चौहानों ने लगभग 12 वर्षों तक आक्रांताओं से युद्ध जारी रखा और अंत में 1204 ई0 के आसपास चंदवार के राजा चंद्रसेन या भीम सिंह को हिम्मतपुर जो एत्मादपुर के पास एक गांव है के निकट पूर्णतः पराजित कर दिया गया ।चंदवार का चौहान राजकुल जयचंद और पृथ्वीराज चौहान के जातीय विग्रह से सर्वदा अलग रहा ।
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चंद्रवार के चौहानों का मुस्लिम आक्रांताओं से संघर्ष-
सन 1197 -98 में कुतुबुद्दीन ऐवक ने चंदवार और कन्नौज पर अधिकार कर लिया था ।लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि चंदवार पर ऐवक का अधिकार स्थिर नहीं रह सका ।सन् 1210 में ऐवक की मृत्यु हो गयी और उसका पुत्र दिल्ली का सुल्तान बना जिसको पराजित करके इल्तुतमिश अब दिल्ली का सुल्तान बन गया ।इसी समय चंदवार के चौहानों को पुनः शक्ति संग्रहित करने का अवसर मिल गया और उन्होंने चंदवार की राज गद्दी पर पुनः अधिकार कर लिया ।किन्तु इल्तुतमिश की मृत्यु 1236ई0 सेकुछ समय पूर्व सुल्तान की सेनाओं ने चंदवार पर आक्रमण किया और विजय प्राप्त कर ली ।सुल्तान की आधीनता स्वीकार करके तथा कुछ कर स्वरूप धन देकर चंदवार के चौहान राजा अपना शासन चलता रहा ।उसे सिंहासन से हटाया नही गया ।रजिया की मृत्यु के बाद दिल्ली की गद्दी के लिए विद्रोह और सडयंत्र रचे जाते रहे ।उसका लाभ चंदवार राज्य ने भी लिया क्यों कि उस समय चंदवार पर कोई आक्रमण नही हुआ ।कवि लक्खड़ के ग्रन्थ के अनुसार 1256ई0 में आहवमल्ल चंदवार के चौहान राजाओं का वंशज था ।
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कवि लक्खण के अनुसार राजा आहवमल्ल के पूर्व चंदवार के राजाओं का विवरण-
भारतपल ,अभयपाल ,जाहड़ ,आहवमल्ल(पत्नी इसरदे) ।सन् 1392 -93 में राजा अभयचंद की हत्या चन्दवार के लिए एक बड़ा संकट का कारणरही होगी ।इसके बाद राजा अभय चंद्र के दो पुत्र रामचंद्र और रामजयचंद्र ।राजा रामचंद्र देव चन्दवार के राजा बने ।उनका शासनकाल संक्षिप्त ही रहा होगा । सन 1411 ई0 तक ये चन्दवार के राजा रहे होंगे ।इनके दो पुत्रों का नाम मिलता है जिनमें बड़े प्रताप रूद्र और दूसरे रणवीर सिंह ।रामचंद्र के बाद प्रतापरुद्र चन्दवार के राजा बने इसके प्रमाण प्राप्त है ।
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चन्दवार चौहान राज्यकुल की एक अन्य शाखा- भदावर के भदौरिया राजपूत
13 वीं शताब्दी के मध्य (1246ई0 )में चन्दवार के सन्दर्भ में एक विशेष घटना यह हुई कि सम्भवतः राज्यकुल के आंतरिक विग्रह के परिणामस्वरूप एक गर्भवती रानी चन्दवार के महलों से पलायन कर यमुना पार करके आगरा जिले की वर्तमान फतेहावाद तहसील में स्थित एक गांव में रहने लगी ।यह रानी राजा राउतसाल की पत्नी थी ।कुछ दिन बाद रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसे राजा राउत या रज्जु की संज्ञा प्राप्त हुई ।उस समय उस क्षेत्र में मेवों का आधिपत्य था जिससे जनता परेशान थी ।वयस्क होने पर राजा रज्जु राउत ने मेवों का दमन कर हातकन्त नामक स्थान को अपनी राजधानी बनाया ।यह प्रदेश किसी समय भादानक या भद्र प्रदेश कहलाता था।इस लिए चन्दवार के राज वंश की यह शाखा कालान्तरमें भदौरिया कही जाने लगी ।भदावर का राज वंश भी अपनी वीरता के लिए अति प्रसिद्ध रहा है ।
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चन्दवार के चौहानो का ग्वालियर के राजा मान सिंह तौमर से सम्बन्ध-
ग्वालियर चन्दवार का एक शक्तिशाली पड़ोसी राज्य था ।तंवरघार में मान्य जनश्रुति के अनुसार ग्वालियर के राजा मान सिंह तौमर की पटरानी चन्दवार के चौहानों की पुत्री थी जो विक्रमादित्य की माता थी उससे भी चन्दवार के महत्वपूर्ण स्थान होने की पुष्टि होती है ।इसमे संदेह नही कि इस क्षेत्र में इटावा ,मैनपुरी ,भोगांव ,पटियाली आदि के चौहान राज वंशों में चन्दवार के चौहान श्रेष्ठ माने जाते थे ।14वीं शताब्दी के अंत और 15 वीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में इटावा के चौहानों ने निश्चय ही चन्दवार सेअधिक शक्ति संग्रह कर ली थी और इटावा का राजा सुमेर सिंह चौहान अपनी वीरता और नीतिज्ञता के कारण इस क्षेत्र का वीर नायक बन गया था ।किन्तु अपनी प्राचीनता के कारण उस समय भी ज्येष्ठ पद चन्दवार को ही प्राप्त थ।
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खानवा के युद्ध में महाराणा सांगा के साथ चन्द्रवार के चौहानों का भी था बलिदान-
राणा संग्राम सिह अपनी सेना को एकत्रित करने के बाद जनवरी 1927 के अन्त में बाबर पर आक्रमण करने के लिए रवाना हुआ। चंदवार का राव मालिक चन्द्र चौहान, जिसने कि आलम खान के पुत्र कमाल खान साहबोल को परास्त कर शाही छत्र एवं बाबर के सैनिक शिविर छीन लिये थे, रणथम्भोर में ही उनसे आकर मिला। राव मानिक चन्द्र ने राणा को शाही छत्र तथा शिविर भेट किये तथा उसके साथ मुगल सम्राट बाबर से युद्ध करने के लिए चल पड़ा ।
राणा सांगा द्वारा बाबर के विरुध्द सैनिक अभियान से राजपूतों स्फूति उत्पन्न हो गई थी और चदवार का राजा मानिक चन्द्र या मानिक चन्द्र चौहान राणा सांगा को सक्रिय सहयोग दे रहा था। बाबर के सैनिकों से शाही छत्र और शिविर छीन कर उसने जैसा शोर्य प्रकट किया था, उससे अवश्य ही राजपूतों में उत्साह उत्पन्न हुआ होगा । उसी के अनुपात में बाबर के सैनिक हतोत्साहित भी हुए होंगे। बावर ने अपनी आत्मकथा में अपने सैनिकों के मध्य व्याप्त राजपुतों के आतंक का स्पष्ट वर्णन किया है। बाबर वडी कठिनाई से अपने सैनिकों को भागने से रोकने में सफल हुआ था ।
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राणा संग्राम सिंह और उसके साथी बहुत वीर थे। किन्तु बाबर जैसा युध्दकौशल उनमें नहीं था। इसके अतिरिक्त बाबर के साथ तोपें भी थी, जिनकी मारक शक्ति राजपूतों के लिए कालमय प्रभंजन के समान थी । ता० 17-18 अप्रैल को खानवा के मैदान में भीषण युध्द हुआ। प्रारम्भ में राजपूतों की सेनाओं का पलड़ा भारी होता दिखाई दिया, विन्तु शीघ्र ही बाबर के तोपखाने ने राजपूतों पर आग बरसानी प्रारम्भ कर दी। इन तोपों के कारण राजपूत सैनिकों की लाशों के ढेर युध्द क्षेत्र में दिखाई देने लगे । इसमे राजपूतों का साहस टूटने लगा। तब राणा सांगा के कुछ अति वीर साथियों ने बावर की तोपों पर अधिकार कर लिया। "युद्ध करते करते चन्द्रभान चौहान , भूपतराय, मालिक चन्द्र. दलपत, हसनखान मुगल तोपखाने को।छीनने के लिए आगे बढ़े, किन्तु वीर गति को प्राप्त हुए ।"
इस प्रकार चन्दवार का राय मालिक चन्द्र चौहान खानवा के युद्ध क्षेत्र में वीरता के साथ युध्द करता हुआ अपने पुत्र दलपत सहित शहीद हो गया। इस प्रकार 1527 ई० के मार्च माह में पराजित राजपूतों के रक्त से भारत के भाग्य में मुगलों की सत्ता का विधान लिख दिया ।
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स्वाभिमानी थे चन्द्रवार राज्य के चौहान शासक-
चंद्रवार राजकुल के सदस्यों प्रखर कुलाभिमान था उसका एक चित्र पाठक इस प्रकार देख सकते हैं ।जब चन्द्रवार के राव माणिकचंद चौहान का पौत्र संग्रामसिह सन् 1530 ई० में गुजरात के शासक बहादुर शाह का पक्ष त्याग कर चित्तौड़ के राणा उदयसिह के पक्ष में आता है और वह यह शर्तें राणा उदयसिंह के समक्ष रखता है कि वह केवल राणा के साथ ही युद्ध क्षेत्र में सर्वोच्च पद पर रहते हुए लड़ेगा और राणा से छोटी स्थिति के किसी व्यक्ति के अधीन नहीं रहेगा। इस समय संग्राम सिंह चौहान के पास न तो कोई प्रदेश था और न निकट भविष्य में ही उसे किसी प्रदेश की सत्ता प्राप्त होने कीआशा थी।
संग्रामसिंह चौहान चन्द्रवार के शासक दलपत का पुत्र था। दलपत और उसके पिता राव मानिक चन्द्र चौहान ने चित्तौड़ के राणा संग्रामसिंह के लिए अपने प्राणों का बलिदान खानवा के युद्ध में किया था। इसी आधार पर तथा प्राचीन कुल परम्परा के कारण चन्दवार के संग्राम सिंह चौहान को इतने "बडे बोल" बोलने का साहस हुआ होगा और इसी आधार और मेवाड़ के राणा उदयसिंह ने उसकी यह शतें स्वीकार भी कर ली होंगी।
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चंदवार राज्य के चौहान राजाओं की नामावाली -
- राजा चन्द्रसेन- प्रामाणिक आधार --गजेटियर आफ उत्तर प्रदेश आगरा संस्करण 1964, अस्तित्व काल---ईसा की नवीं से दसवीं शताब्दी के मध्य।
- चन्द्रपाल- प्रामाणिक आधार --गजेटियर आफ उत्तर प्रदेश आगरा संस्करण 1964, अस्तित्व काल -- सन 1018
- जयपाल- प्रामाणिक आधार --गजेटियर आफ उत्तर प्रदेश आगरा संस्करण 1964, अस्तित्व काल---1080
- भरत पाल- अणुवय रयण पईव में, भरतपाल से आह्वमल्ल, 1556 ई०, तक की क्रमिक वंशावली दी गई है।
- अभयपाल - भरतपाल से आह्वमल्ल, 1556 ई०, तक की क्रमिक वंशावली दी गई है।
- जाहठ- (आहवमल्ल) से पूर्व राजा कब हुए
- श्री वल्लमल- इसका ठीक-ठीक समय निर्धारण नहीं किया जा सकता।अनुमानतः आहवमल्ल के पूर्वज अभयपाल सन् 1131 ई० के आस पास रहे होंगे। सम्भव है अभय पॉल जयपाल के पुत्र रहे हों।
- आहवमल्ल -सन 1256 ई o
- संभरीराय- प्रामाणिक आधार -बाहुबलि चरित में संभरीराय सारंग नरेश। या सारंग नरेन्द्र तथा अभयचन्द्र और रामचन्द्र राजाओं के नाम मिलते हैं ।
- सारंग नरेश
- अभयचंद- अभयचन्द्र को हत्या मुस्लिम आक्रान्ता ने 1393- 1394 ई० में करादी थी।
- जय चन्द / रामचन्द्र - सन् 1392 ई o
- प्रतापरुद्र- रणवीर सिंह और रामचन्द्र- अभयचन्द्र के पुत्र थे।
- भोजराज- कवि धर्मधर ने अपने नागकुमार चरित्र में सारंगदेव से लेकर नृसिंह तक की वंशावली दी है ।यह ग्रन्थ सन 1454 में रचा गया था।
- माधवचन्द्र / कनक सिंह / नृसिंह
- मानिक चन्द्र- बाबरनामा, 1530 ई o
- कीर्तिसिन्धु- ब्रह्म गुलाल चरित् 1608 ई०
उपयुक्त राजाओं के अतिरिक्त भीसिंह, सावंत सिंह आदि राजाओं के नाम यत्र-तत्र प्रकाशित लेखों में पढ़ने को मिले हैं किन्तु उपर्युक्त राजाओं के अतिरिक्त कुछ और राजाओं का शासन भी चन्दवार पर रहा है। यह विषय खोज-शोध का है।
लेखक:- डा0 धीरेन्द्र सिंह जादौन
गांव:- लढ़ौता ,सासनी
जिला:- हाथरस ,उत्तर प्रदेश
प्राचार्य: राजकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय सवाईमाधोपुर राजस्थान
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