उन्नीसवीं सदी एक परिचय- ठाकुर उमराव सिंह जमींदार कोटला रियासत ।

Jun 16, 2024 - 19:51
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उन्नीसवीं सदी एक परिचय- ठाकुर उमराव सिंह जमींदार कोटला रियासत ।

उन्नीसवीं सदी में राजपूतों के समाजिक एवं शैक्षणिक उत्थान के पुरोधा ठाकुर उमराव सिंह जमींदार कोटला  रियासत- 

जीवन परिचय 

उन्नीसवीं सदी में  राजपूतों के समाजिक एवं शैक्षणिक उत्थान के पुरोधा थे ठाकुर उमरावसिंह जी कोटला रियासत जो तत्कालीन समय में आगरा जनपद में आती थी। आगरा जनपद के फिरोजाबाद परगना में गांव जाटउ के जमींदार ठाकुर जालिम सिंह जी के तीन पुत्र थे जिनमे सबसे बड़े ठाकुर करन सिंह  ,मध्यम ठाकुर उमराव सिंह तथा सबसे छोटे ठाकुर नौ निहाल सिंह। ठाकुर उमराव सिंह का जन्म सन 1844 ई0 में हुआ था। 


ठाकुर उमराव सिंह के दो विवाह हुए । पहला विवाह मैनपुरी जिले की गढ़ी सुमेर चौहान ठिकाने की आनन्द कंवर के साथ हुआ जिनसे एक पुत्र कुशलपाल सिंह पैदा हुए।उनके देहान्त के बाद दूसरा विवाह आगरा के बजीरपुरा जादों ठिकाना के सुप्रसिद्ध हिन्दी गद्य के सलाका पुरुष एवं अंग्रेजी हुकूमत में बुलहंदशहर  के जिला कलेक्टर रहे राजा लक्ष्मण सिंह की पुत्री महेन्द्र कंवर के साथ हुआ जिनसे चार पुत्र जोगेन्द्र पाल सिंह ,महेन्द्र पाल सिंह ,लोकेन्द्रपाल सिंह तथा भवनपाल सिंह पैदा हुए।

ठाकुर उमराव सिंह के कूटनीतिज्ञ प्रयासों से कुशलपाल सिंह को कोटला की रियासत मिली और वे राजा कहलाने लगे।महेन्द्र पाल सिंह कानपुर में प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट थे।कुँवर महेन्द्र पाल सिंह साहित्यक रुचि के व्यक्ति थे और उन्होंने हिन्दी मासिक " विशाल भारत " में अनेक लेख लिखे । सन 1936ई o लगभग आप झांसी   के कलेक्टर भी रहे।कुँवर भवनपाल सिंह एम0 ए0(आक्सिन )ने  इंग्लैंड में उच्च शिक्षा प्राप्त की थी।आप भी तत्कालीन बलवन्त राजपूत कालेज के प्रबन्ध सिमित के सक्रिय सदस्य रहे। 

ठाकुर उमराव सिंह महान कूटनीतिज्ञ भी थे ।कहा जाता है कि अवागढ़ परिवार के निकटतम सम्बन्धी बरई के ठाकुर निहाल सिंह जी के मर्डर में भी ठाकुर उमराव सिंह को नामजद किया था लेकिन कोर्ट में प्रमाणित नहीं होने पर बरी हो गए ।निहाल सिंह की मृत्यु के बाद बलवंत सिंह जी का अवागढ़ पर स्वामित्व ठाकुर उमराव सिंह की ही सूझ बुझ का परिणाम था ।बलवंत राजपूत कालेज की स्थापना में भी ठाकुर उमराव सिंह की प्रेरणा बताई जाती है ।समय की आवश्यकता को अनुभव करके ठाकुर उमराव सिंह ने उस ज़माने में अंग्रेजी का ज्ञान अर्जित किया था।

संवत् 1950 या 51 के लगभग जयपुर राज्य के महाराजा सवाई माधोसिंह द्वितीय , महारानी जादौन जी बिट्टा जी (कुशल कंवर ) जो उमरगढ़ ठिकाने के राव बुद्धपाल सिंह की पुत्री थीं के साथ ऊमरगढ पधारे थे । ठाकुर उमराव सिंह जी ने आगरा में कोटला हाउस जिसे पहले बागफरजाना कोठी कहते थे  में उनका स्वागत -सत्कार किया था । जब महाराजा एवं महारानी जी का  कोटला के ठाकुर उमराव सिंह जी से परिचय हुआ तो वे बहुत अधिक प्रभावित हुये तो उनकी ठाकुर उमराव सिंह  पर अत्यंत श्रद्धा हो गई।

बल्कि महाराजा साहिब ने कहा था कि समस्त ऊमरगढ के सेवक संघ में मेरे काम का यह एक व्यक्ति आया है ।बाद में महाराजा और महारानी जी ठाकुर उमराव सिंह जी पर परम संतुष्ट हुये ।श्रीमती महारानी जी महोदया तो उमराव सिंह जी को पिता तुल्य मानने लगी क्यों कि वे उनके ही खानदान के थे ।महाराजा और महारानी जी ने ठाकुर उमराव सिंह जी को जयपुर राज्य की सेवा सम्पादन करने पर बाध्य किया।

तब आदेशानुसार सन 1901 में ठाकुर उमराव सिंह जी को महकम : महोत्समः आलियः कौंसिल सेक्रेटरी के मेम्बरी पद से सुशोभित किया ।जब महाराजा सवाई माधोसिंह द्वितीय सन् 1902 में  इंग्लैंड में कोरोनेशन की यात्रा पर गये थे तो उस समय राज्य के सर्वे सर्वा कार्य भार को महारानी जादौन जी के मतानुसार 'सम्पादन करने का सौभाग्य ठाकुर उमराव सिंह जी को प्रदान हो गया था और उक्त समय के कार्य को उन्होंने परम पशंसा जनक सम्पादन किया और जयपुर राज्य की राजस्व आमद में परिपूर्ण व्रद्धि करके दिखलाई ।

इसके बाद ठाकुर उमराव सिंह ने अपने बड़े भाई ठाकुर करनसिंह जी की पुत्री सगुन कँवर का विवाह सम्बन्ध महारानी जादौन जी बिट्टा जी (कुशल कंवर ) के अनुरोध पर ईसरदा ठिकाने के सामंत प्रताप सिंह के पुत्र सवाई सिंह जी के साथ सम्पन्न कराया। जिनके दो पुत्र बहादुर सिंह और मोर मुकुट सिंह हुये ।जिलाय ठाकुर साहिब और अन्य सामंतों के विरोध के बावजूद भी महारानी जादौन जी के आग्रह के कारण महाराजा सवाई माधोसिंह द्वितीय ने 24मार्च 1921 को ईसरदा के मोरमुकुट सिंह जी जो ठाकुर उमराव सिंह के धेवते थे को गोद लिया गया था जिनका नाम बदल कर सवाई मान सिंह द्वितीय  किया गया जो 7 सितम्बर 1922 को जयपुर राज्य के महाराजा हुये ।

जयपुर राज्य में सेवाएं देते  समय ठाकुर उमराव सिंह जी का क्षत्रियों  में बहुत सम्मान था एवं राजपूत समाज के सामाजिक उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान रहा था ।वे बहुत प्रतिभाशाली व्यक्ति थे।उनको अंग्रेजी का अच्छा ज्ञान था जो उस समय हमारे समाज में बहुत कम देखने को मिलता था ।अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा  अवागढ़ के राजा बलवंत सिंह  जी के सहयोग से उन्होंने ही सन् 1897 में बनाई थी जिसका पूर्ण श्रेय राजा बलवंत सिंह जी अवागढ़ को दिया गया था ।आप अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा के उपाध्यक्ष थे तथा ठाकुर साहब तत्कालीन आगरा की "राजपूत हितकारिणी महासभा " के अध्यक्ष भी रहे थे । राजपूत समाज के सामाजिक एवं शैक्षणिक उत्थान में ठाकुर उमराव सिंह जी के योगदान को राजपूत समाज हमेशा स्मरण रखेगा।

अमरीकन महान विचारक एमर्सन का उदघोष था " जिस जाति में स्वप्नदृष्टा व्यक्ति नहीं होते हैं  वह शीघ्र नष्ट हो जाती है।" कोटला रईस ठाकुर उमराव सिंह राजपूत जाति में एक ऐसे ही महामानव एवं स्वप्नदृष्टा व्यक्ति थे जिन्होंने अपने दूरगामी स्वप्न के द्वारा न केवल राजपूत जाति को अज्ञानान्धकार में भटकने एवं परस्पर टकराने से बचाया, वरन उसे सुशिक्षित कर जाति-जनपद एवं प्रदेश -देश सेवा का पाठ भी पढ़ाया।

कोटला रईस ठाकुर उमराव सिंह का वह दो आयामी स्वप्न या प्रथम सोपान में ग्रामीण अंचल के राजपूत छात्रों की निवास समस्या हल करने हेतु 'राजपूत बोडिंग हाउस' स्थापित करना, दूसरे सोपान में प्रथम की ठीक- ठाक व्यवस्था सुनिश्चित हो जाने के उपरान्त एक स्कूल की स्थापना और समय-साधनानुसार उसे बृहदाकार कॉलेज में परिणत करना।

सूर्य प्रकाश की तरह सबको दृश्यमान है कि बृहदाकार कॉलेज की दूसरी कल्पना तो विराटाकार लेती गई, परन्तु 'बोडिंग हाउस' की मूल पोषक भावना (छात्रों को आवास सुविधाएँ सुलभ कराना) दिनों दिन सिकुड़ती- सिमटती जा रही है। तभी तो छठवें दशक तक जो भरतपुर हाउस (शाह टाकीज के पास, जहां अब नेहरू नगर है), भदावर हाउस (जहाँ डॉ. नागरथ एवं डॉ. नवल किशोर की कोठियां हैं), भरतपुर हाउस (आज का ए. डी. एम. प्लानिंग ऑफिस), खन्दारी हाउस, कोटला हाउस, सनाढ्य आश्रम आदि बी. आर. कॉलेज छात्रावास थे, आज वे कॉलेज अधिकार क्षेत्र में नहीं हैं।

ठाकुर उमराव सिंह जन्मे , खेले, समझदार हुए थे-देहात में, जहाँ आज तक भी राजपूत बहुतायत में रहते हैं, परन्तु एक अच्छे-खासे जमींदार  होने के कारण उनका आगरा शहर से भी अच्छा-खासा सम्बन्ध था। शहर का जन समुदाय शिक्षित होने के कारण सभ्य और समझदार माना जाता था तथा शिक्षाहीन होने के कारण देहाती राजपूत कुलीन एवं भूस्वामी होते हुये भी गंवार और पिछड़ा कहा जाता था।

इस अन्तर ने ठाकुर साहब के अन्तस को झकझोर दिया। अतः उन्हें समझते देर न लगी कि राजपूत निवास गाँवों में रहने की सुविधा ती है, परन्तु शिक्षा की सुविधा नहीं। इसके विपरीत शहरों में शिक्षा की सुविधा है, तो वहाँ राजपूत बालकों के रहने की सुविधा नहीं है। इसी सुविधान्तर के कारण राजपूत नौजवान शिक्षा- वरदानों से वंचित रह जाते हैं और सुसंस्कृत होते हुये भी आजीवन गंवार कहलाते हैं।

ठाकुर साहब को उक्त दो विपरीत परिस्थितियों के मध्य पुल तैयार किये बिना राजपूत जाति की शिक्षा-दीक्षा दुस्साध्य लगी। अतः उनके हृदय में एक भाव प्रबल उठा-

 " क्यों न शहर में राजपूत बालकों के लिये गाँव जैसी रहन-सहन की सुविधायें मुहइया कर दी जायें, ताकि वे शहर में सुलभ विविध प्रकार की शिक्षा सुविधाओं का भरपूर लाभ उठा सके और अपने आपको राष्ट्र की मुख्य धारा से जोड़े रह सके।" यह था- रचनात्मक एवं जत्योउधारक चिन्तन श्रीमान् ठाकुर उमराव सिंह साहब का, जिसने उन्हें गांवों से दूर आगरा नगर में सन् 1885 ई. में राजपूत बोडिंग हाउस' स्थापित करने को प्रेरित किया ।

उन्होंने यह राजपूत बोर्डिंग हाउस अपनी आगरा में  हरीपर्वत के पास स्थित " बाघफ़रजांना कोठी " में  पश्चिमी उत्तरप्रदेश के 20 राजपूत बच्चों के लिए अंग्रेजी की उच्च शिक्षा प्रदान करने के लिए आरम्भ किया था तथा एक ट्यूटर की भी व्यवस्था की गई थी।

बोर्डिग हाउस आरम्भ करने में आर्थिक व्यवस्था में मुख्यरूप से जादों राजपूत जमींदार जिनमें ठाकुर साहब उमराव सिंह के छोटे भाई कुँवर नौनिहाल सिंह ,राजा बलदेब सिंह अवागढ़ ,राजा लक्ष्मण सिंह बजीरपुरा ,ठाकुर कल्याण सिंह जलालपुर ,अलीगढ़ तथा ठाकुर राय बहादुर लेखराज सिंह गभाना ,अलीगढ़ प्रमुख थे।

इसी महान उद्देश्य की पूर्ति हेतु जुलाई-अगस्त सन् 1899 ई. में राजपूत हाईस्कूल' प्रारम्भ हो जाने पर भी राजपूत बोडिंग हाउस एक स्वतन्त्र संस्था के रूप में जातीय सेवा में लगा रहा तथा शरणागत जात्येतर शिक्षार्थियों को भी गले लगाता रहा।

इस प्रकार "शरणागत को जे तजहि, तिनहि बिलोकत हानि " वाली राजपूती आन बान का निर्वहण करते हुये अपनी मानवीय उदारता का पोषण करता रहा। राजपूत बोडिंग हाउस के स्वतन्त्र अस्तित्व के कारण ही उसके लिये अलग से दान देने की व्यवस्था थी, जिसका पृथक से लेखा-जोखा रखा जाता था ।" राजपूत बोडिंग हाउस "  के लिये अलग से चन्दा और अलग हिसाब-किताब की व्यवस्था दिसम्बर 1904 ई. से समाप्त कर दी गयी । दुष्परिणाम स्वरूप ही आज प्रथम एवं पितृ संस्था- परमुखापेक्षी पुत्र संस्था बन चुकी है, एक प्रकार से अस्तित्व विहीन हो चुकी है।

सिन्धिया राज्य का हाईकोर्ट था और आगरा कॉलेज का मुख्य भवन उसका 'डिस्ट्रिक कोर्ट' था।

ठाकुर उमराव सिंह रईस कोटला के विषय में तत्कालीन महानुभवों के विचार

1- महाराजा अलवर-

श्रीमान ठाकुर उमराव सिंह जी रईस कोटला की विद्वता और विद्याप्रेम का ही फल है कि आगरे में राजपूत बोडिंग हाउस एवं राजपूत हाई स्कूल स्थापित हुआ है और श्रीमान राजा साहब अवागढ़ अपनी बुद्धिमत्ता और विद्या प्रेम से राजपूत बोडिंग हाउस के स्थापित होने और चलाने में यथेष्ट सहायता करते रहे हैं और कितने ही लड़कों को नियत समय तक वजीफे दिये और कुछ स्थायी रूप से स्थापित किये हैं। 

2- श्रीयुत खोसला -

फरिहा कोटला जागीर के मालिक ठाकुर उमराव सिंह राजपूत महासभा एवं आगरा स्थित राजपूत शिक्षा संस्थाओं के संस्थापक थे।

3- महाराजा कश्मीर -

क्षत्रिय उपकारिणी महासभा का सत्रहवाँ वार्षिकोत्सव 29 दिसम्बर सन 1913 को आगरा में हुआ था, जिसका सभापतित्व किया था -महाराजा साहब सर प्रताप सिंह जी जम्मू एवं कश्मीर ने। उन्होंने अपने सभापतीय भाषण में कहा था- शिक्षा सम्बन्धी उन्नति में आगरे का वर्णन भी आवश्यक है, जहां कि कोटला के स्वर्गवासी ठाकुर उमराव सिंह साहब के यत्न से सन् 1885 में यह संस्था (तात्पर्य है- राजपूत बोडिंग हाउस से) जहाँ कि आज हम सब एकत्र हुए हैं, कायम हुई थी ।अवर्गवासी राजा साहिब बलवन्त सिंह अवागढ़ के यत्न से क्षत्रिय जाति को अधिक लाभ पहुंचा। 

Thakur Umarao Singh of Phariha-Kotla estate was the founder of Rajput Mahasabha and Rajput Educational Institutions in Agra.


4- महाराजा कश्मीर-

राजसहिब को उक्त अवसर पर बलवन्त राजपूत हाई स्कूल की प्रबन्ध कारिणी कमेटी ने अभिनन्दन पत्र समर्पित किया था, जिसके उत्तर में श्रीमान महाराजा साहब ने एक वक्तव्य दिया था जिसकी कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार है --मैं सन 1903  में जब यहाँ आया था, तो यह स्कूल साधारण अवस्था में था ।

इस पुरानी इमारत में ही स्कूल एवं बोडिंग हाउस था। अब बोडिंग हाउस की विस्तृत इमारत बन गई है। इस स्कूल और बोडिंग हाउस के मुख्य संस्थापक तो स्वर्गवासी ठाकुर उमराव  सिंह  कोटला थे । परन्तु जो उन्नति इस स्कूल और बोर्डिंग  हाउस की आज हम देख रहे हैं वह स्वर्गवासी राजा साहब  बलवन्त सिंह अवागढ़ के साढ़े दस लाख रुपये के दान से हुई है। 

5- राजा सूर्यपाल सिंह- 

 सन 1885 मे दोनों भाइयों , ठाकूर उमराव सिंह और कुँवर नौनिहाल सिंह  कोटला ने अपने निवास स्थान बाग फरजाना आगरा में बोडिंग हाउस स्थापित किया । इस संस्था के स्थापक उपरोक्त महानुभाव थे, परन्तु उनके उद्देश्यों में सहायक मुख्य-मुख्य राजपूत जिमीदार थे जिनमें एक मेरे पितृव्य अवागढ़ के राज बलदेव सिंह जी भी थे ।

राजा बलवन्त सिंह की सहायता का सीमांकन करते हुए आपने लिखा है-आरम्भ से स्वर्गीय राजा बलवन्त सिंह जो सी.आई.ई. इस बोडिंग हाउस के मुख्य सहायक रहे हैं। अपने भ्राता राजा बलदेव सिंह जी के जीवन काल में (जिसका अर्थ हुआ- राजा बलदेव सिंह की मृत्यु  मार्च सन 1992  ई० तक) वह इस छात्रालय के लिये जो कुछ कर सके करते रहे और उनकी कोशिशों का ही नतीजा था कि यह १०० रुपये मासिक की स्थिर सहायता देते रहे। 

6- राजा लक्ष्मण सिंह बजीरपुरा-

एक बार ठाकुर उमराव सिंह ने  बोडिंग हाउस  के लिये राजा साहब लक्ष्मण सिंह बजीरपुरा जो उनके ससुर भी थे , से एक हजार रुपये मांगे । राजा लक्ष्मण सिंह जी केवल पाँच सौ रुपये देने को तैयार थे, इस पर ठाकुर साहब ने राजा साहब से कहा कि पांच सौ रुपये दान दे दीजिये और पांच सौ रुपये उधार।

राजा साहब ने यह बात स्वीकार नहीं की। उन्होंने  कुँवर कन्हीसिंह को लिख दिया कि ठाकुर उमराव सिंह राजपूत कॉलेज छात्रावास के लिये पाँच सौ रुपये दान और पाँच सौ रुपये उधार मांग रहे हैं। हमारी सामर्थ्य  केवल पाँच सौ रुपये दान देने की है, हम उधार नहीं दे सकते ।

7- मि. फोरसाइथ- 

ठा. उमराव सिंह की आश्रन्त चेष्ठा से सन 1899 मे आगरा कमिश्नरी के कमिश्नर मि. इम्पी द्वारा स्कूल खोला गया। स्कूल कई वर्षों तक चन्दे से चलता रहा। पीछे केवल अवा रियासत की आर्थिक सहायता से चलने लगा।

8- राजा बलवन्त सिंह जीवन परिचय-

श्रध्देय पं. मदन मोहन मालवीय जी और राजा कुशल पाल सिंह के पिता ठाकूर उमराव सिंह के परामर्श से यह स्कूल सन 1898 में स्थापित किया गया ।

9- डॉ० रामकरण सिंह- 

महारानी विक्टोरिया की रजत जयन्ती वर्ष 1887 में जुबली राजपूत बोडिंग हाउस जैसा कि यह कहलाता था, पूर्ण किया गया और संयुक्त प्रान्त के स्वर्गीय लैफ्टीनैण्ट गवर्नर सर आकलण्ड कालविन द्वारा औपचारिक रूप से खोला गया। दो वर्ष पश्चात राजा बलवन्त सिंह एवं राजा रामपाल सिंह कालाकांकर के प्रयास स्वरुप स्कूल स्थापित किया । जुबली राजपूत बोडिंग हाउस राजपूत हाई स्कूल बन गया । 

10- शिव प्रसाद दुबे -

राजपूत बालकों की शिक्षा हेतु श्रद्धेय पं. मदन मोहन मालवीय और कोटला नरेश राजा कुशलपाल सिंह के पिता ठाकूर उमराव सिंह जी के परामर्श से राजपूत स्कूल सन 1898 ई. में स्थापित किया गया। 

11- डॉ० तुलसीराम शर्मा-

यद्यपि राजा बलवन्त सिंह साहब स्वयं शिक्षित नहीं थे, परन्तु उनकी शिक्षा में गहरी रुचि का प्रतीक थी - पं. मदन मोहन मालवीय एवं ठाकूर उमराव सिंह के सक्रिय सहयोग से सन १८६८ में राजपूत स्कूल की स्थापना हुई।

ठा० उमराव सिंह ही ऐसे व्यक्ति थे, जो राजपूत बोर्डिंग हाउस को जीवित बनाये रखने के लिये विविध जुगाड़ें फिट करने में लगे हुए रहते थे। इसका ध्वन्यार्थ है कि बलवन्त सिंह साहब इस समय तक संस्था संचालन हित में खुलकर सामने नहीं आये थे। " राजा साहब बलवन्तसिंह जी अवागढ़ केवल 'बोडिंग हाउस' कोष में १०० रुपये मासिक देते थे, स्कूल कोष में कुछ नहीं। "

'राजपूत बोडिंग हाउस ' व्यापक एवं व्यावहारिक अर्थ में 'बोडिंग हाउस' था, जिसमें राजपूतेतर छात्रों के साथ-साथ हर क्लास के छात्र रहा करते थे --रह सकते थे। भले ही वे राजपूत हाईस्कूल के अतिरिक्त नगर के किसी भी स्कूल और कॉलेज के विद्यार्थी क्यों न रहे हों। यह उदार व्यवस्था 30 जून 1910 ई. तक ही चल पाई।

इसके उपरान्त राजपूत बोडिंग हाउस में रहने की पात्रता केवल स्कूल में पढ़नेवाले छात्रों तक सीमित रह गई क्यों कि तत्कालीन इलाहाबाद यूनिवर्सिटी ने ऐसा नया एक्ट लागू कर दिया। अतः अनुदारता एवं संकुचित भावना नियमवस  स्वीकारनी पड़ी । अब समस्या थी-कालेज विद्यार्थियों को रखने की, फलतः राजपूत शिक्षा के कर्णधारों को जुलाई सन् 1910 ई. से आगरा नगर में क्षत्रिय कालेज बोडिग हाउस खोलने का निर्णय करना पड़ा, जिसकी व्यवस्था का दायित्व कुँवर ध्यानपाल सिंह बी. ए. कोटला हाउस आगरा को  सौंपा गया था। 

कोटला परिवार के विषय में ये एक कवि की कविता-

।। कवित्त ।।

करत सदैव प्रतिपाल देख दीनन की, 
सुकविन की चाह चित राखत हमेस हैं। 
न्याय पन्थ आने लोभ ईरसा न माने रंच,
 राज काज देख होय राजी माधवेस हैं।।
  कहै परसाद करें कामिल मुसाहिबी हैं, 
  साफ इनसाफ देत सब को विसेस हैं।
परम् प्रतापी श्री महीप उमराव सिंह  ,
देश पै दयालु रह कोटला नरेस है ।।

जादव जसीलो ठोक ठाकुर ठसकदार, 
परम उदार सरदार बीर बांको है ।
जान गुनवान सनमान देत सुकविन कों, बुद्धिमान मन्त्री सुख्य सचिव सभा को है।
 कहे परसाद श्री प्रतापी उमरावसिंह,
न्याय निपुनाई नीति रीति रस छाको है। 
सुमति सुधाको जम छाय रह्यो जाको जग, सुकृति को नाको या महीप कोटला को है ॥२

      अवलम्बन 
     ।। दोहा।।

जय जय जय जशवेश्वरी, जय जयपुर अवलम्ब |
 जय आमेर निवासिनी, सिलादेवि जगदम्ब ॥1॥
 हे कोटला आदि बहु, जो जादव सब धाम| है टीकायत सबन में, उम्मरगढ अभिराम ॥2॥ उम्मरगढ़ में हुए हैं, सिरो राव बुधपाल । 
 पुत्र तीन तनुजा सु इक, हुई सु बुद्धि विसाल ||3|| 
 सोही श्री जादवनजी, माधवेन्द्र वर पाय।
 राज महीसी जयनगर, हुई सुजस अधिकाय ||4||
महारानी जादवनजी, श्री माधव महिपाल । गये पाहुने कोटला, हरषित हिये विसाल ||5 करन कुवंरि के व्याह की, ईसरदाको ठानि । परनाई जेठूत के, निज अनुजा मन मोनि ||6|| पुन्य लता जिन की जगत, प्रकट प्रफुल्लित आज ।
 लसत मान महाराज के सकल सुखद युवराज ॥7॥ 
 जादव जालमसिंह भौ, जाटउ भुवन मझार । परम साहसी सील गुन, भूषित जगत अपार ॥8॥ 
 तीन तनय तिनके हुए, विद्या वीर विनीत ।
 गुन सम्पन्न प्रसन्न सब, राखत प्रीति पुनीत ॥9॥ 
 करनसिंह सब से बड़े, तिन सों लघु उमराव । नव निहाल लघु तिनहु से, राखत सतचित भाव ।। 10।। 
 करनसिंहजी के हुई, तनया श्री जादोंन । ध्यानपाल सुत गोद तिन, लीनें अपने भौन ॥11॥ 
 श्री ठाकुर उमराव के सत्र सुत परम उदार । विद्यावान विसाल अब, कोटलेस सरदार ॥12॥ 
 अग्रज राजत कोटला, राजा कुशलपाल । ऐल. ऐल. बी . सदिस हे, एसेम्बली विसाल ॥13॥ 
 अन्य अनुज तिनके सकल, विद्या वृत्ति समाज ।
  सब भारत सरकार के पद भूषित है आज ॥ 14 ॥ 
  ध्यानपालजी के सुवन, तीन जाटऊ घाम ।
  बड़े जु तोषनपाल हैं, चन्द्रपाल मधि नाम ॥15॥ 
  उक्त दोउन से परम लघु, बुद्धपाल कुल कंज । 
  भ्राता तीनों प्रेम रत, रहत परम सुख पुंज ॥16॥ 


      ॥ कवित्त ॥ 

करन की जाई यदु कुल की उद्योत कला ईसरदा ईसी वर वरने सवाई हैं । 
ऐसी भाग्यशीला संसार में कहां है कोई
जानत जगत जैसी पुन्य प्रभुताई हैं । 
मोहन बखानै जादोंनजी सु वृद्धि करी 
जाटउ की और नगर की बड़ाई हैं । 
जन्म लियो जाकी सुभ कूँख में सवाई मान, भानु कुल भानु की सु घातरी सुहाई हैं ॥17॥

यादव करन की सु ख्याति विख्यात करन, जदुकुल जाई हुई पातिव्रतवान हैं ।
पुन्य में प्रमानै परमात्मा में आनै चित,
 दीन जन जानै बड़ी दया की निधान हैं। 
 मोहन बखानें जादूनजी जगत बीच, 
 जन्म हुयो रावरोही धन्य सुखदान हैं ।
  धारिनी प्रतिष्ठा अवतारिनी सवाई मान, 
  परिनी प्रतिज्ञा राम राज की महान हैं ॥18॥

कौन्सिल मैम्बरी के शासन काल में यह कविता ठाकुर उमरावसिंह और उनके परिवार के यशोगान में तत्कालीन सवाई जयपुर राज्य की श्रीमान सुजस -चन्द्रविलास नामक काव्य रचना में कवीश्वर मोहनलाल शर्मा ने लिखी थी। 


लेखक:- प्रोफेसर डॉ0 धीरेन्द्र सिंह जादौन 
गांव:- लाढोता ,सासनी 
जिला:- हाथरस ,उत्तरप्रदेश
प्राचार्य:- राजकीय कन्या महाविद्यालय, सवाईमाधोपुर, राजस्थान

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