लुंबिनी में बुद्ध जयंती पर भारत-नेपाल की सांस्कृतिक संगम की झलक, भव्य आयोजन में शांति और समरसता का संदेश।
लुंबिनी (नेपाल): भगवान बुद्ध की जन्मस्थली लुंबिनी में बुद्ध जयंती के अवसर पर एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें
लुंबिनी (नेपाल): भगवान बुद्ध की जन्मस्थली लुंबिनी में बुद्ध जयंती के अवसर पर एक भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें भारत और नेपाल के बीच सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और शैक्षिक सहयोग की मजबूत झलक देखने को मिली। यह आयोजन भारतीय दूतावास और लुम्बिनी विकास कोष के संयुक्त सहयोग से संपन्न हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत स्कूली छात्रों द्वारा आयोजित चित्रकला प्रदर्शनी से हुई, जिसमें बुद्ध के जीवन, करुणा और शांति के संदेशों को रंगों के माध्यम से सजीव रूप में प्रस्तुत किया गया। इसके बाद भारत और नेपाल के भिक्षुओं द्वारा संयुक्त मंत्रोच्चारण और प्रार्थना की गई, जिससे पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत हो उठा। शाम के सांस्कृतिक कार्यक्रम ने आयोजन को और अधिक आकर्षक बना दिया।इंडियन काउंसिल फॉर कल्चरल रिलेशंस (ICCR) के कलाकार दल ने दीप्ति गुप्ता के नेतृत्व में बौद्ध विषय पर आधारित कथक नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति दी। इस प्रस्तुति में बुद्ध के जीवन और उनके उपदेशों को शास्त्रीय नृत्य के माध्यम से प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त किया गया। वहीं नेपाल की ओर से प्रसिद्ध सरोद वादक सुरेश बज्राचार्य के नेतृत्व में एक संगीत बैंड ने पारंपरिक और आधुनिक संगीत का सुंदर संगम प्रस्तुत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। इस अवसर पर लुंबिनी प्रदेश के प्रदेश प्रमुख कृष्ण बहादुर धर्ती मगर मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। उन्होंने अपने संबोधन में बुद्ध के उपदेशों की वर्तमान वैश्विक संदर्भ में प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि शांति, सहिष्णुता और सह-अस्तित्व की भावना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। कार्यक्रम में भारतीय दूतावास के उप प्रमुख (DCM) डॉ. राकेश पांडेय और पीआईसी प्रमुख बसिष्ठ नन्दन भी उपस्थित रहे।
इसके अतिरिक्त लुंबिनी बौद्ध विश्वविद्यालय में “बुद्ध के उपदेशों की प्रासंगिकता : शांति, समरसता और सतत विकास के मार्ग” विषय पर एक अकादमिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में भारत और नेपाल के विद्वानों ने अपने विचार साझा करते हुए कहा कि बुद्ध के सिद्धांत आज भी वैश्विक चुनौतियों जैसे संघर्ष, असमानता और पर्यावरणीय संकट के समाधान में मार्गदर्शक साबित हो सकते हैं। यह पूरा आयोजन न केवल भगवान बुद्ध के सार्वभौमिक संदेशों को पुनर्स्थापित करने में सफल रहा, बल्कि भारत और नेपाल के बीच सांस्कृतिक कूटनीति, धार्मिक विरासत और शैक्षिक सहयोग को भी नई दिशा और ऊर्जा प्रदान करने में महत्वपूर्ण साबित हुआ।
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