नोएडा में 'स्लीपर सेल' की बड़ी साजिश का भंडाफोड़: Gen-Z की फौज तैयार कर देश में बवाल करने की थी तैयारी।

दिल्ली से सटे नोएडा में पुलिस और जांच एजेंसियों ने एक ऐसे नेटवर्क का पर्चाफाश किया है जो आधुनिक तकनीक में माहिर 'जेनरेशन-जी'

Apr 24, 2026 - 12:00
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नोएडा में 'स्लीपर सेल' की बड़ी साजिश का भंडाफोड़: Gen-Z की फौज तैयार कर देश में बवाल करने की थी तैयारी।
नोएडा में 'स्लीपर सेल' की बड़ी साजिश का भंडाफोड़: Gen-Z की फौज तैयार कर देश में बवाल करने की थी तैयारी।
  • 28 पन्नों की डायरी ने खोला राज: बांग्लादेश की तर्ज पर भारत में सत्ता परिवर्तन और हंगामे की रची गई थी रूपरेखा
  • हाई-प्रोफाइल आरोपितों का खतरनाक नेटवर्क: इंजीनियर, पीएचडी स्कॉलर और पत्रकारों के जरिए युवाओं के ब्रेनवॉश का खेल

दिल्ली से सटे नोएडा में पुलिस और जांच एजेंसियों ने एक ऐसे नेटवर्क का पर्चाफाश किया है जो आधुनिक तकनीक में माहिर 'जेनरेशन-जी' यानी Gen-Z को ढाल बनाकर देश में बड़ी अराजकता फैलाने की फिराक में था। जांच के दौरान बरामद हुई एक महत्वपूर्ण डायरी से यह तथ्य सामने आए हैं कि कुछ अराजक तत्व सरकार और देश की नीतियों के खिलाफ वैचारिक विरोध रखने वाले युवाओं को चिह्नित कर रहे थे। इन युवाओं को 'स्लीपर सेल' की तर्ज पर प्रशिक्षित किया जा रहा था ताकि भविष्य में किसी भी बड़े आंदोलन या विरोध प्रदर्शन के दौरान इनका उपयोग विध्वंसक गतिविधियों के लिए किया जा सके। इस साजिश के तार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) से लेकर देश के अन्य हिस्सों तक फैले हुए हैं, जहां युवाओं की एक ऐसी टोली तैयार की जा रही थी जो इंटरनेट और सोशल मीडिया के माध्यम से नैरेटिव सेट करने में सक्षम हो।

पुलिस को इस पूरे प्रकरण में मुख्य आरोपित हिमांशु के पास से 28 पन्नों की एक डायरी मिली है, जिसमें दर्ज जानकारियां सुरक्षा एजेंसियों के होश उड़ाने वाली हैं। इस डायरी में लगभग 18 से 20 ऐसे नाम दर्ज हैं जो Gen-Z पीढ़ी से ताल्लुक रखते हैं और इंटरनेट मीडिया पर लगातार देश विरोधी या व्यवस्था विरोधी विचार साझा करते रहे हैं। जांच में यह पाया गया है कि आरोपितों की एक टीम विशेष रूप से ऐसे युवाओं की प्रोफाइलिंग करती थी जो कैंपस या शैक्षणिक संस्थानों में उग्र भाषणबाजी में शामिल होते थे। एक बार पहचान होने के बाद, दूसरी टीम इन युवाओं से संपर्क साधती थी और उन्हें अपने संगठन की विचारधारा से जोड़कर उनका ब्रेनवॉश शुरू कर देती थी। इस पूरी प्रक्रिया का उद्देश्य एक ऐसी संगठित 'फौज' खड़ा करना था जो किसी भी समय सड़क पर उतरकर व्यवस्था को ठप कर सके।

इस साजिश की भयावहता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि आरोपितों ने बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल जैसे पड़ोसी देशों में हाल के वर्षों में हुए सत्ता परिवर्तनों और आंदोलनों का गहन अध्ययन किया था। वहां जिस तरह से छात्रों और युवाओं (Gen-Z) ने तकनीक का उपयोग कर सरकारों को झुकने पर मजबूर किया, उसी मॉडल को भारत में दोहराने की योजना बनाई गई थी। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई यह पीढ़ी इंटरनेट और डिजिटल संचार में अत्यंत दक्ष है, जिससे इनके माध्यम से किसी भी सूचना या अफवाह को तेजी से फैलाना और भीड़ को एकत्रित करना आसान हो जाता है। नोएडा पुलिस इसी तकनीकी पहलू को ध्यान में रखकर जांच को आगे बढ़ा रही है ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस नेटवर्क को सीमा पार से या किसी विदेशी मॉड्यूल से तो सहायता नहीं मिल रही थी।

क्या है Gen-Z और इनकी ताकत?

जेनरेशन-जी (Gen-Z) उस पीढ़ी को कहा जाता है जो पूरी तरह से डिजिटल युग में पली-बढ़ी है। तकनीक पर इनकी पकड़ और सोशल मीडिया के जरिए वैश्विक मुद्दों पर इनकी सक्रियता इन्हें पिछली पीढ़ियों से अलग बनाती है। साजिशकर्ताओं ने इसी 'डिजिटल नेटिव' स्वभाव का फायदा उठाकर इन्हें एक अदृश्य हथियार की तरह इस्तेमाल करने का खाका खींचा था, ताकि कानूनी एजेंसियों की नजरों से बचते हुए बड़े स्तर पर लामबंदी की जा सके।

गिरफ्तार किए गए आरोपितों की पृष्ठभूमि ने जांच एजेंसियों को और अधिक सतर्क कर दिया है, क्योंकि इनमें समाज के अलग-अलग बौद्धिक वर्गों के लोग शामिल हैं। पकड़े गए लोगों में इंजीनियर, पीएचडी शोधार्थी, कलाकार और पत्रकार जैसे पेशेवर शामिल हैं, जो समाज में अपनी एक अलग साख रखते हैं। उदाहरण के तौर पर, पकड़े गए आरोपितों में से एक आदित्य पेशे से इंजीनियर है, जबकि आकृति और हिमांशु जैसे लोग उच्च शिक्षा (पीएचडी) प्राप्त कर रहे हैं। सत्यम वर्मा जैसे लोग पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़े रहे हैं और जटिल ग्रंथों के अनुवाद में विशेषज्ञता रखते हैं। यह स्पष्ट करता है कि यह कोई साधारण आपराधिक गिरोह नहीं था, बल्कि बौद्धिक रूप से सक्षम लोगों का एक ऐसा समूह था जो वैचारिक आधार पर युवाओं को गुमराह करने की क्षमता रखता था।

नोएडा की पुलिस आयुक्त लक्ष्मी सिंह ने इस मामले की पुष्टि करते हुए कहा है कि हिंसा और साजिश में शामिल सभी आरोपितों के खिलाफ सबूतों के आधार पर कठोर कार्रवाई सुनिश्चित की जा रही है। पुलिस अब संगठित अपराध की धाराओं के साथ-साथ इस बात की भी पड़ताल कर रही है कि इन गतिविधियों के लिए फंडिंग कहां से आ रही थी। डायरी में दर्ज 18-20 नामों के अलावा उन कड़ियों को भी जोड़ा जा रहा है जो इन युवाओं को रसद और तकनीकी सहायता प्रदान कर रहे थे। जांच टीम का मानना है कि बरामद डायरी महज एक सिरा है, इसके पीछे एक बहुत बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा है जो समाज के विभिन्न वर्गों में घुसपैठ कर चुका है। आने वाले दिनों में कुछ और बड़ी गिरफ्तारियां संभव हैं क्योंकि जांच का दायरा अब एनसीआर से बाहर भी बढ़ाया जा रहा है।

अधिवक्ताओं और कानूनी जानकारों के अनुसार, इस समूह के सदस्य खुद को समाज के सामने एक अलग रूप में पेश करते थे। जैसे रूपेश नाम का आरोपित खुद को ऑटो चालक बताता था, लेकिन असल में वह एक सक्रिय सोशल वर्कर के रूप में युवाओं के बीच पैठ बना रहा था। मनीषा जैसी महिलाएं, जो साधारण फैक्ट्रियों में काम करती थीं, वे भी इस नेटवर्क का हिस्सा थीं, जो यह दर्शाता है कि यह संगठन समाज के हर तबके तक पहुंच बनाने की कोशिश में था। सृष्टि जैसी कलाकार, जिन्हें प्रतिष्ठित संस्थानों से प्रमाणपत्र प्राप्त है, उनका उपयोग संभवतः सांस्कृतिक कार्यक्रमों या नाटकों के माध्यम से प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए किया जाना था। इस प्रकार की बहुआयामी पहुंच सुरक्षा एजेंसियों के लिए एक बड़ी चुनौती पेश करती है।

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