नीलगिरी के जंगलों में 10 दिनों से धधक रही भीषण आग, 5000 एकड़ वन क्षेत्र हुआ खाक, वन्यजीवों पर मंडराया संकट

तमिलनाडु के नीलगिरी जिले में प्रकृति का स्वर्ग कहे जाने वाले हरे-भरे जंगल इन दिनों भीषण अग्नि की चपेट में हैं। नीलगिरी रेंज के अंतर्गत

Apr 28, 2026 - 12:40
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नीलगिरी के जंगलों में 10 दिनों से धधक रही भीषण आग, 5000 एकड़ वन क्षेत्र हुआ खाक, वन्यजीवों पर मंडराया संकट
नीलगिरी के जंगलों में 10 दिनों से धधक रही भीषण आग, 5000 एकड़ वन क्षेत्र हुआ खाक, वन्यजीवों पर मंडराया संकट
  • पार्सन्स वैली और पाइकारा में आग का तांडव जारी, 500 से अधिक कर्मचारी और वायुसेना के हेलीकॉप्टर मोर्चा संभालने में जुटे
  • तेज हवाओं ने बढ़ाई अग्निशमन कर्मियों की मुश्किलें, नीलगिरी रेंज के दुर्लभ पौधों और जीव-जंतुओं के अस्तित्व को बड़ा खतरा

तमिलनाडु के नीलगिरी जिले में प्रकृति का स्वर्ग कहे जाने वाले हरे-भरे जंगल इन दिनों भीषण अग्नि की चपेट में हैं। नीलगिरी रेंज के अंतर्गत आने वाले पार्सन्स वैली और पाइकारा के जंगलों में पिछले दस दिनों से अधिक समय से धधक रही आग ने अब एक भयावह रूप धारण कर लिया है। इस विनाशकारी आग में अब तक लगभग 5,000 एकड़ से अधिक की वन संपदा जलकर राख हो चुकी है। पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील इस क्षेत्र में आग पर काबू पाने के लिए 500 से अधिक कर्मचारी और स्थानीय स्वयंसेवक दिन-रात संघर्ष कर रहे हैं, लेकिन दुर्गम पहाड़ियाँ और प्रतिकूल मौसम उनकी राह में बड़ी बाधा बनकर खड़े हैं। तमिलनाडु के नीलगिरी जिले में लगी यह आग पिछले एक दशक की सबसे भीषण घटनाओं में से एक बताई जा रही है। 15 अप्रैल के आसपास शुरू हुई यह आग धीरे-धीरे पार्सन्स वैली, पाइकारा और ग्लेनमोर्गन जैसे महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों में फैल गई। वर्तमान में स्थिति यह है कि आग ने लगभग 5,000 एकड़ के विशाल भूभाग को अपनी चपेट में ले लिया है। इस क्षेत्र में मौजूद घास के मैदान और प्राचीन शोला जंगल, जो कई दुर्लभ वनस्पतियों का घर हैं, अब धुएं और राख के ढेर में तब्दील हो रहे हैं। भीषण गर्मी और सूखे की वजह से जंगलों की घास पूरी तरह सूखी हुई है, जो आग को तेजी से फैलने के लिए ईधन का काम कर रही है। आग बुझाने के अभियान में तमिलनाडु वन विभाग, राज्य आपदा मोचन बल (SDRF) और अग्निशमन सेवा के 500 से अधिक कर्मियों को तैनात किया गया है। इन टीमों में कोयंबटूर, ईरोड, तिरुपुर और सलेम जैसे पड़ोसी जिलों के कर्मचारी भी शामिल हैं। बचाव अभियान की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारतीय वायुसेना के सुलूर स्टेशन से दो एमआई-17 वी5 हेलीकॉप्टरों को भी मदद के लिए बुलाया गया है। ये हेलीकॉप्टर 'बम्बी बाकेट' तकनीक के जरिए पास के एमराल्ड और मोयार बांधों से पानी भरकर आग पर डाल रहे हैं। हालांकि, पहाड़ियों के ऊपरी हिस्सों में चल रही तेज हवाओं के कारण हवाई परिचालन में काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।

जमीनी स्तर पर काम कर रहे कर्मियों के लिए यह मिशन किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। पार्सन्स वैली की खड़ी पहाड़ियाँ और संकरे रास्ते ऐसे हैं जहाँ आधुनिक दमकल गाड़ियां नहीं पहुँच सकतीं। ऐसी स्थिति में वन कर्मी और स्थानीय ग्रामीण अपनी जान जोखिम में डालकर पैदल ही पहाड़ियों पर चढ़ रहे हैं। वे पारंपरिक तरीकों जैसे पेड़ों की टहनियों से आग को पीटना और 'फायर ट्रेंच' (आग को रोकने के लिए खोदी गई खाइयां) बनाकर लपटों को आगे बढ़ने से रोकने की कोशिश कर रहे हैं। लंबे समय तक आग के बीच रहने और धुएं के कारण कई कर्मचारी शारीरिक रूप से थक चुके हैं और उन्हें निर्जलीकरण (Dehydration) की समस्या का सामना करना पड़ रहा है। नीलगिरी का यह हिस्सा बाघों, हाथियों और दुर्लभ पक्षियों का महत्वपूर्ण गलियारा माना जाता है। वन विभाग के अनुसार, बड़े जानवर जैसे हाथी और बाघ आग की गंध पाकर सुरक्षित क्षेत्रों की ओर पलायन कर गए हैं, लेकिन छोटे रेंगने वाले जीव, कीड़े-मकोड़े और पक्षियों के घोंसले इस त्रासदी में पूरी तरह नष्ट हो गए हैं। शोला घास के मैदानों का विनाश इस क्षेत्र के जल स्रोतों के लिए भी भविष्य में संकट पैदा कर सकता है, क्योंकि ये घास के मैदान वर्षा जल को संरक्षित करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।

प्रशासनिक स्तर पर नीलगिरी की जिला कलेक्टर लक्ष्मी भव्या तनेरू और पर्यावरण सचिव सुप्रिया साहू स्थिति की बारीकी से निगरानी कर रहे हैं। अधिकारियों का कहना है कि आग के नए क्षेत्रों में फैलने का मुख्य कारण अचानक बदलने वाली हवा की दिशा और बढ़ता तापमान है। सोमवार को मसिनागुडी और मरवकंडी बांध के पास भी आग की नई घटनाएं सामने आईं, जिसने राहत कार्यों के दबाव को और बढ़ा दिया। प्रशासन ने संवेदनशील इलाकों में सात विशेष फॉरेस्ट फायर रिस्पांस वाहन भी तैनात किए हैं, जो सड़क के किनारे वाले हिस्सों में आग को नियंत्रित करने का काम कर रहे हैं। वन विभाग अब इस बात की भी जांच कर रहा है कि क्या यह आग प्राकृतिक कारणों से लगी है या इसके पीछे मानवीय लापरवाही या शरारत शामिल है। जंगल की इस आग ने पर्यटन पर भी असर डालना शुरू कर दिया है। नीलगिरी का यह क्षेत्र अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन धुएं के गुबार और बढ़ते तापमान के कारण कई पर्यटन स्थलों पर आवाजाही सीमित कर दी गई है। स्थानीय पर्यावरणविदों ने चेतावनी दी है कि यदि आग पर जल्द पूरी तरह काबू नहीं पाया गया, तो इसका दीर्घकालिक प्रभाव नीलगिरी के सूक्ष्म जलवायु (Micro-climate) पर पड़ेगा। प्राचीन हाथी गलियारों का जल जाना मानव-वन्यजीव संघर्ष को भी बढ़ावा दे सकता है, क्योंकि भोजन और पानी की तलाश में जानवर अब इंसानी बस्तियों की ओर रुख कर सकते हैं।

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