मिडिल ईस्ट के तनाव के बीच पाकिस्तान को तगड़ा झटका, यूएई ने 2 अरब डॉलर का कर्ज तुरंत वापस लौटाने का सुनाया फरमान।

इस्लामाबाद और अबू धाबी के बीच दशकों पुराने 'ब्रदरली रिलेशंस' यानी भाईचारे के रिश्तों में उस समय कड़वाहट और तनाव की स्थिति पैदा हो गई,

Apr 4, 2026 - 15:13
 0  5
मिडिल ईस्ट के तनाव के बीच पाकिस्तान को तगड़ा झटका, यूएई ने 2 अरब डॉलर का कर्ज तुरंत वापस लौटाने का सुनाया फरमान।
मिडिल ईस्ट के तनाव के बीच पाकिस्तान को तगड़ा झटका, यूएई ने 2 अरब डॉलर का कर्ज तुरंत वापस लौटाने का सुनाया फरमान।
  • 'दोस्ती अपनी जगह, कर्ज अपनी जगह', आर्थिक तंगी से जूझ रहे पाकिस्तान की बढ़ी मुश्किलें, यूएई ने तोड़ी 'रोलओवर' की पुरानी परंपरा
  • विदेशी मुद्रा भंडार में भारी गिरावट की आशंका, शहबाज सरकार के लिए अग्निपरीक्षा बना संयुक्त अरब अमीरात का सख्त रुख

इस्लामाबाद और अबू धाबी के बीच दशकों पुराने 'ब्रदरली रिलेशंस' यानी भाईचारे के रिश्तों में उस समय कड़वाहट और तनाव की स्थिति पैदा हो गई, जब संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने पाकिस्तान को दिए गए 2 अरब डॉलर के भारी-भरकम कर्ज को तुरंत वापस करने की मांग कर दी। यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब मिडिल ईस्ट यानी मध्य पूर्व में इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध जैसी स्थितियां बनी हुई हैं। पाकिस्तान, जो पहले से ही अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की कड़ी शर्तों और घरेलू महंगाई से जूझ रहा है, उसके लिए यूएई का यह फैसला किसी बड़े आर्थिक धमाके से कम नहीं है। सूत्रों के अनुसार, यूएई ने स्पष्ट कर दिया है कि उसे अपनी पूंजी की तुरंत आवश्यकता है, जिसके बाद पाकिस्तानी वित्त मंत्रालय में हड़कंप मचा हुआ है।

यह 2 अरब डॉलर की राशि पाकिस्तान के भुगतान संतुलन (Balance of Payment) को स्थिर रखने के लिए 'सेफ डिपॉजिट' के तौर पर स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान (SBP) में रखी गई थी। आमतौर पर यूएई इस कर्ज को हर साल 'रोलओवर' कर देता था, यानी इसे चुकाने की अवधि को आगे बढ़ा देता था। लेकिन हाल के महीनों में यह अवधि साल से घटकर महीनों और फिर हफ्तों पर सिमट गई थी। फरवरी 2026 में अंतिम बार इसे केवल 60 दिनों के लिए बढ़ाया गया था, जिसकी समय सीमा 17 अप्रैल 2026 को समाप्त हो रही है। इस बार यूएई ने इसे और आगे बढ़ाने से साफ इनकार कर दिया है, जिससे पाकिस्तान के पास इस महीने के अंत तक इसे लौटाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है।

मिडिल ईस्ट की जंग और यूएई की रणनीति

कूटनीतिक गलियारों में यह चर्चा गर्म है कि यूएई ने यह मांग अचानक क्यों की। विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य संघर्ष ने खाड़ी देशों को अपनी वित्तीय सुरक्षा के प्रति सतर्क कर दिया है। यूएई अपनी लिक्विडिटी यानी नकदी के भंडार को मजबूत करना चाहता है ताकि किसी भी क्षेत्रीय अस्थिरता की स्थिति में वह खुद को सुरक्षित रख सके।

पाकिस्तान इस कर्ज पर करीब 6 प्रतिशत से लेकर 6.5 प्रतिशत तक का भारी ब्याज चुका रहा था। आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कर्ज पाकिस्तान के लिए वैसे भी काफी महंगा साबित हो रहा था, लेकिन विदेशी मुद्रा भंडार को कागजों पर मजबूत दिखाने के लिए इसे बनाए रखना मजबूरी थी। अब जब इसे वापस करना पड़ रहा है, तो पाकिस्तान के विदेशी मुद्रा भंडार पर इसका सीधा और नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। वर्तमान में पाकिस्तान का कुल विदेशी मुद्रा भंडार लगभग 21 अरब डॉलर के करीब है, जिसमें से 2 अरब डॉलर की निकासी इसके बफर स्टॉक को 10 प्रतिशत से अधिक कम कर देगी। इससे पाकिस्तानी रुपये की वैल्यू में गिरावट आने और आयात की लागत बढ़ने का गंभीर खतरा पैदा हो गया है।

शहबाज शरीफ सरकार के लिए यह स्थिति इसलिए भी जटिल है क्योंकि पाकिस्तान वर्तमान में आईएमएफ के 7 अरब डॉलर के 'एक्सटेंडेड फंड फैसिलिटी' (EFF) कार्यक्रम के तीसरे रिव्यू की तैयारी कर रहा है। आईएमएफ की एक प्रमुख शर्त यह है कि पाकिस्तान को अपने मित्र देशों—चीन, सऊदी अरब और यूएई—से करीब 12 अरब डॉलर के कर्ज का रोलओवर सुनिश्चित करना होगा। यूएई द्वारा हाथ खींच लेने से आईएमएफ के साथ होने वाली अगली किश्त की बातचीत खटाई में पड़ सकती है। यदि आईएमएफ को लगा कि पाकिस्तान का बाहरी वित्तपोषण (External Financing) अनिश्चित है, तो वह अगली किश्त रोकने का कड़ा फैसला ले सकता है, जो पाकिस्तान को डिफॉल्ट की ओर धकेल सकता है।

राजनीतिक रूप से भी यह मामला पाकिस्तान में तूल पकड़ रहा है। विपक्षी दल इसे सरकार की कूटनीतिक विफलता बता रहे हैं। सत्ता पक्ष की ओर से यह दलील दी जा रही है कि देश की 'राष्ट्रीय गरिमा' और स्वाभिमान के लिए कर्ज चुकाना जरूरी है और इसे वित्तीय बोझ के बजाय एक जिम्मेदारी के रूप में देखा जाना चाहिए। हालांकि, हकीकत यह है कि पाकिस्तान के पास इस समय कोई बड़ा आर्थिक बैकअप नहीं है। चीन और सऊदी अरब पर भी कर्ज के रोलओवर के लिए दबाव बढ़ गया है। यदि उन देशों ने भी यूएई की राह पकड़ी, तो पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था ताश के पत्तों की तरह ढह सकती है।

यूएई का यह सख्त रवैया पाकिस्तान के लिए एक चेतावनी की तरह है कि अब 'खैरात' और 'सॉफ्ट लोन' के दिन लद रहे हैं। खाड़ी देश अब पाकिस्तान को केवल एक भाई के तौर पर नहीं, बल्कि एक आर्थिक साझेदार के तौर पर देख रहे हैं जो अपने वादे पूरे करने में अक्सर विफल रहता है। पाकिस्तान के उप-प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक डार ने यूएई के वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क साधकर स्थिति को संभालने की कोशिश की थी, लेकिन इस बार कूटनीति के बजाय कड़े वित्तीय हितों को प्राथमिकता दी गई है। यह स्पष्ट हो चुका है कि यूएई अब अपनी पूंजी को उन जगहों पर निवेश करना चाहता है जहाँ उसे सामरिक या आर्थिक लाभ मिले, न कि केवल 'पार्किंग' के लिए किसी दूसरे देश के केंद्रीय बैंक में छोड़ना चाहता है।

Also Read- बिहार की सियासत में बड़े उलटफेर की सुगबुगाहट: मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दिए पद छोड़ने के संकेत, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के फैसले पर टिकी निगाहें।

What's Your Reaction?

like

dislike

love

funny

angry

sad

wow

INA News_Admin आई.एन. ए. न्यूज़ (INA NEWS) initiate news agency भारत में सबसे तेजी से बढ़ती हुई हिंदी समाचार एजेंसी है, 2017 से एक बड़ा सफर तय करके आज आप सभी के बीच एक पहचान बना सकी है| हमारा प्रयास यही है कि अपने पाठक तक सच और सही जानकारी पहुंचाएं जिसमें सही और समय का ख़ास महत्व है।