सरकारी बैंकों ने मिनिमम बैलेंस न रखने पर 5 साल में वसूले 8,500 करोड़ रुपये, वित्त राज्य मंत्री ने दी जानकारी। 

UP News: पिछले पांच सालों (2020-21 से 2024-25) के दौरान भारत के सरकारी बैंकों ने अपने ग्राहकों से बचत खातों में न्यूनतम बैलेंस न रखने की वजह से ...

Jul 31, 2025 - 15:32
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सरकारी बैंकों ने मिनिमम बैलेंस न रखने पर 5 साल में वसूले 8,500 करोड़ रुपये, वित्त राज्य मंत्री ने दी जानकारी। 
सरकारी बैंकों ने मिनिमम बैलेंस न रखने पर 5 साल में वसूले 8,500 करोड़ रुपये, वित्त राज्य मंत्री ने दी जानकारी। 

पिछले पांच सालों (2020-21 से 2024-25) के दौरान भारत के सरकारी बैंकों ने अपने ग्राहकों से बचत खातों में न्यूनतम बैलेंस न रखने की वजह से करीब 8,500 करोड़ रुपये की पेनल्टी वसूली है। यह जानकारी वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने 30 जुलाई 2025 को संसद में एक सवाल के जवाब में दी। यह आंकड़ा तब सामने आया, जब देश के सबसे बड़े सरकारी बैंक, भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) ने 2020-21 से इस तरह की पेनल्टी वसूलना बंद कर दिया था। इसके बावजूद, अन्य 11 सरकारी बैंकों ने पेनल्टी के जरिए भारी कमाई की, जिसमें पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) सबसे आगे रहा।

  • न्यूनतम बैलेंस और पेनल्टी का क्या मतलब है?

बचत खातों में न्यूनतम बैलेंस वह राशि है, जो बैंक अपने ग्राहकों से खाते में बनाए रखने की अपेक्षा करता है। यह राशि बैंक और खाते के प्रकार (शहरी, अर्ध-शहरी, या ग्रामीण) के आधार पर अलग-अलग होती है। उदाहरण के लिए, पंजाब नेशनल बैंक में शहरी क्षेत्रों के लिए न्यूनतम तिमाही औसत बैलेंस 2,000 रुपये, कस्बों के लिए 1,000 रुपये, और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए 500 रुपये है। अगर ग्राहक इस राशि को बनाए नहीं रखता, तो बैंक पेनल्टी वसूलता है। यह पेनल्टी ग्रामीण क्षेत्रों में 100 रुपये, कस्बों में 150 रुपये, और शहरी क्षेत्रों में 250 रुपये तक हो सकती है।

वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने संसद में बताया कि बैंकों को खाता खोलते समय ग्राहकों को न्यूनतम बैलेंस की आवश्यकता और पेनल्टी के बारे में स्पष्ट रूप से बताना चाहिए। लेकिन कई बार ग्राहकों को इसकी पूरी जानकारी नहीं दी जाती, जिसके कारण वे अनजाने में पेनल्टी का सामना करते हैं।

  • पांच साल में 8,500 करोड़ रुपये की वसूली

वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने संसद में बताया कि 2020-21 से 2024-25 के बीच 12 सरकारी बैंकों ने न्यूनतम बैलेंस न रखने की पेनल्टी के रूप में कुल 8,494 करोड़ रुपये वसूले। यह आंकड़ा साल-दर-साल इस प्रकार है:

2020-21: 1,142 करोड़ रुपये

2021-22: 1,429 करोड़ रुपये

2022-23: 1,855 करोड़ रुपये

2023-24: 2,331 करोड़ रुपये

2024-25: (अनुमानित, क्योंकि पूरा डेटा उपलब्ध नहीं है, लेकिन कुल राशि में शामिल)

2023-24 में यह राशि सबसे ज्यादा थी, जब सरकारी बैंकों ने 2,331 करोड़ रुपये की पेनल्टी वसूली। यह पहली बार था, जब किसी एक वित्त वर्ष में पेनल्टी से कमाई 2,000 करोड़ रुपये के पार गई। यह आंकड़ा इस बात का सबूत है कि पिछले पांच सालों में पेनल्टी की राशि में 38% की बढ़ोतरी हुई है।

  • कौन से बैंकों ने की सबसे ज्यादा वसूली?

पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) ने इस अवधि में सबसे ज्यादा पेनल्टी वसूली। 2020-21 से 2024-25 तक पीएनबी ने 1,538 करोड़ रुपये की पेनल्टी जमा की। इसके बाद अन्य बैंकों का योगदान इस प्रकार रहा:

बैंक ऑफ बड़ौदा: 387 करोड़ रुपये (2023-24 में)

इंडियन बैंक: 369 करोड़ रुपये (2023-24 में)

केनरा बैंक: 284 करोड़ रुपये (2023-24 में)

बैंक ऑफ इंडिया: 194 करोड़ रुपये (2023-24 में)

इन बैंकों ने न्यूनतम तिमाही औसत बैलेंस (क्यूएबी) या मासिक औसत बैलेंस (एएमबी) न रखने पर पेनल्टी लगाई। छह बैंकों ने तिमाही आधार पर और चार बैंकों ने मासिक आधार पर पेनल्टी वसूली।

  • एसबीआई ने क्यों बंद की पेनल्टी?

देश का सबसे बड़ा सरकारी बैंक, भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई), पहले न्यूनतम बैलेंस न रखने पर पेनल्टी वसूलता था। 2019-20 में एसबीआई ने इस मद में 640 करोड़ रुपये की कमाई की थी। लेकिन नकारात्मक प्रचार और ग्राहकों की शिकायतों के बाद, बैंक ने 2020-21 से इस पेनल्टी को बंद कर दिया। इसके बावजूद, अन्य सरकारी बैंकों ने पेनल्टी वसूलना जारी रखा, जिसके कारण कुल राशि में कमी नहीं आई।

कुछ अन्य सरकारी बैंकों ने भी न्यूनतम बैलेंस की आवश्यकता को हटा दिया है। उदाहरण के लिए, बैंक ऑफ इंडिया ने हाल ही में घोषणा की कि वह बचत खातों में न्यूनतम बैलेंस न रखने पर कोई शुल्क नहीं लगाएगा। इसी तरह, चार अन्य सरकारी बैंकों ने भी इस नियम को हटा दिया है। ये बैंक हैं:

यूनियन बैंक ऑफ इंडिया

सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया

यूको बैंक

इंडियन ओवरसीज बैंक

इन बैंकों ने ग्राहकों की सुविधा के लिए न्यूनतम बैलेंस की अनिवार्यता खत्म कर दी, जिससे ग्राहकों को राहत मिली है।

  • नए नियम और बदलाव

1 अप्रैल 2025 से कई बैंकों ने न्यूनतम बैलेंस के नियमों में बदलाव किए हैं। अब न्यूनतम बैलेंस की सीमा ग्राहक के स्थान (शहरी, अर्ध-शहरी, या ग्रामीण) के आधार पर तय की जाएगी। कुछ उदाहरण:

एसबीआई: बचत खाते में न्यूनतम 5,000 रुपये (पहले 3,000 रुपये)

पंजाब नेशनल बैंक: 3,500 रुपये (पहले 1,000 रुपये)

केनरा बैंक: 2,500 रुपये (पहले 1,000 रुपये)

इन नए नियमों के तहत, अगर ग्राहक न्यूनतम बैलेंस बनाए नहीं रखते, तो उन्हें जुर्माना देना होगा। जुर्माने की राशि भी स्थान के आधार पर अलग-अलग है। उदाहरण के लिए, शहरी क्षेत्रों में 600 रुपये तक, अर्ध-शहरी क्षेत्रों में 300 रुपये तक, और ग्रामीण क्षेत्रों में 150 रुपये तक पेनल्टी लग सकती है।

न्यूनतम बैलेंस की पेनल्टी ने कई ग्राहकों, खासकर निम्न और मध्यम आय वर्ग के लोगों, को प्रभावित किया है। ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां आय सीमित होती है, 500 रुपये का न्यूनतम बैलेंस बनाए रखना भी मुश्किल हो सकता है। कई बार ग्राहकों को बिना सूचना के पेनल्टी काट ली जाती है, जिससे उनका बैंक पर भरोसा कम होता है।

सामाजिक कार्यकर्ता चंद्रशेखर गौड़, जिन्होंने सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत पीएनबी से जानकारी मांगी थी, ने बताया कि 2020-21 में बैंक ने 170 करोड़ रुपये की पेनल्टी वसूली। उन्होंने कहा कि बैंकों को ग्राहकों को पेनल्टी के बारे में पहले से स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए।

  • बैंकों की कमाई का स्रोत

न्यूनतम बैलेंस पेनल्टी बैंकों के लिए एक बड़ा आय स्रोत बन गया है। 2023-24 में पंजाब नेशनल बैंक ने 633 करोड़ रुपये, बैंक ऑफ बड़ौदा ने 387 करोड़ रुपये, और इंडियन बैंक ने 369 करोड़ रुपये की पेनल्टी वसूली। यह राशि बैंकों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत है, जो उनके परिचालन खर्चों को पूरा करने में मदद करती है। लेकिन यह ग्राहकों के लिए बोझ बनता है, खासकर उन लोगों के लिए जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं।

वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने संसद में कहा कि बैंकों को न्यूनतम बैलेंस और पेनल्टी के बारे में ग्राहकों को स्पष्ट जानकारी देनी चाहिए। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने भी बैंकों को निर्देश दिए हैं कि वे ग्राहकों को पेनल्टी लगाने से पहले सूचित करें। लेकिन कई बार बैंक इन नियमों का पालन नहीं करते, जिसके कारण ग्राहकों को परेशानी होती है।

आरबीआई ने 1 अप्रैल 2025 से लागू होने वाले नए नियमों में बैंकों को डिजिटल बैंकिंग को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहित किया है। इसमें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित चैटबॉट्स और टू-फैक्टर ऑथेंटिकेशन जैसे सुरक्षा उपाय शामिल हैं। लेकिन न्यूनतम बैलेंस पेनल्टी को पूरी तरह खत्म करने का कोई निर्देश नहीं दिया गया है।

ग्राहकों को न्यूनतम बैलेंस पेनल्टी से बचने के लिए निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए:

खाते की जानकारी: अपने बैंक खाते की न्यूनतम बैलेंस आवश्यकता को समझें और उसे बनाए रखें।

सूचनाएं चालू करें: मोबाइल अलर्ट या ईमेल के जरिए बैलेंस कम होने की सूचना प्राप्त करें।

जीरो बैलेंस खाते: ऐसे बैंकों में खाता खोलें, जो न्यूनतम बैलेंस की शर्त नहीं रखते, जैसे बैंक ऑफ इंडिया या यूनियन बैंक ऑफ इंडिया।

डिजिटल बैंकिंग: ऑनलाइन लेनदेन को प्राथमिकता दें, ताकि एटीएम शुल्क और अन्य चार्ज से बचा जा सके।

न्यूनतम बैलेंस पेनल्टी ने न केवल ग्राहकों की जेब पर बोझ डाला है, बल्कि यह बैंकिंग प्रणाली पर भरोसे को भी प्रभावित करता है। कई ग्राहकों का मानना है कि बैंक उनकी छोटी-छोटी बचत पर भी पेनल्टी लगाकर अनुचित लाभ कमा रहे हैं। खासकर ग्रामीण और निम्न आय वर्ग के ग्राहकों के लिए यह एक बड़ी समस्या है।

सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने इस मुद्दे पर नाराजगी जताई। एक यूजर ने X पर लिखा, “बैंक छोटे खाताधारकों से पेनल्टी वसूलकर अमीर हो रहे हैं। यह गरीबों के साथ अन्याय है।” एक अन्य यूजर ने कहा, “एसबीआई ने पेनल्टी बंद की, तो बाकी बैंक क्यों नहीं ऐसा करते?”

पिछले पांच सालों में सरकारी बैंकों ने न्यूनतम बैलेंस न रखने की पेनल्टी के रूप में 8,494 करोड़ रुपये वसूले, जो ग्राहकों के लिए एक बड़ा आर्थिक बोझ रहा। पंजाब नेशनल बैंक जैसे बैंकों ने इस मद में सबसे ज्यादा कमाई की, जबकि एसबीआई ने 2020-21 से इस प्रथा को बंद कर दिया।

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