Trending: भोपाल में संस्कृति बचाओ मंच ने बकरीद पर मिट्टी के बकरों से दी प्रतीकात्मक कुर्बानी, पशु बलि के खिलाफ जागरूकता अभियान। 

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में, 4 जून 2025 को, हिंदू संगठन संस्कृति बचाओ मंच ने बकरीद (ईद-उल-अढ़ा) के अवसर पर एक अनोखा और ....

Jun 5, 2025 - 15:20
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Trending: भोपाल में संस्कृति बचाओ मंच ने बकरीद पर मिट्टी के बकरों से दी प्रतीकात्मक कुर्बानी, पशु बलि के खिलाफ जागरूकता अभियान। 

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में, 4 जून 2025 को, हिंदू संगठन संस्कृति बचाओ मंच ने बकरीद (ईद-उल-अढ़ा) के अवसर पर एक अनोखा और विचारोत्तेजक प्रदर्शन किया। इस संगठन ने पशु बलि के खिलाफ जागरूकता फैलाने के लिए मिट्टी से बने बकरों की प्रतीकात्मक कुर्बानी दी। यह आयोजन टीटी नगर क्षेत्र में हुआ, जहां संगठन के कार्यकर्ताओं ने मिट्टी के बकरों को सजाकर उनकी पूजा की और प्रतीकात्मक रूप से कुर्बानी की रस्म अदा की। इस पहल का उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण और पशु क्रूरता को रोकने की दिशा में एक सकारात्मक संदेश देना था। संगठन ने मुस्लिम समुदाय से अपील की कि वे बकरीद पर पशु बलि के बजाय मिट्टी के बकरों का उपयोग करें, जैसा कि हिंदू त्योहारों जैसे होली, दीवाली, और गणेश उत्सव में पर्यावरण-अनुकूल प्रथाओं को अपनाया गया है। इस आयोजन ने स्थानीय लोगों का ध्यान आकर्षित किया और सोशल मीडिया पर व्यापक चर्चा का विषय बन गया, हालांकि कुछ लोगों ने इसे धार्मिक भावनाओं से जोड़कर विवादास्पद करार दिया।

संस्कृति बचाओ मंच, जो पिछले चार वर्षों से पर्यावरण-अनुकूल बकरीद मनाने की वकालत कर रहा है, ने इस बार भोपाल के टीटी नगर में एक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया। संगठन के संयोजक चंद्रशेखर तिवारी ने इस अवसर पर मिट्टी से बने बकरों को प्रदर्शित किया, जिनकी कीमत 1,000 रुपये प्रति बकरे रखी गई। इन मिट्टी के बकरों को कुर्बानी के प्रतीक के रूप में पेश किया गया, ताकि पशु बलि की प्रथा को कम किया जा सके। तिवारी ने समाचार एजेंसी ANI से बातचीत में कहा, "हम पिछले चार साल से मिट्टी के बकरे बना रहे हैं। जब हमने पर्यावरण-अनुकूल दीवाली, होली और गणेश उत्सव की बात की, तो बकरीद को भी पर्यावरण-अनुकूल क्यों नहीं बनाया जा सकता? पशु बलि के दौरान हजारों गैलन पानी खून साफ करने में बर्बाद होता है।"

इस आयोजन में संगठन के कार्यकर्ताओं ने मिट्टी के बकरों को सजाया, उनकी पूजा की, और प्रतीकात्मक कुर्बानी की। यह प्रदर्शन स्थानीय लोगों और सोशल मीडिया पर चर्चा का केंद्र बन गया। X पर @news24tvchannel ने इस आयोजन को साझा करते हुए लिखा, "भोपाल में हिंदू संगठन ने बकरीद पर मिट्टी के बकरों से प्रतीकात्मक कुर्बानी दी। पशु बलि के विरोध में जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से आयोजन हुआ।" इसी तरह, @aajtak ने इस पहल को "इको-फ्रेंडली बकरीद" की मांग के रूप में प्रचारित किया।

  • संगठन का तर्क और अपील

संस्कृति बचाओ मंच के संयोजक चंद्रशेखर तिवारी ने इस पहल के पीछे पर्यावरण संरक्षण और पशु क्रूरता को रोकने का तर्क दिया। उन्होंने कहा कि हिंदू त्योहारों जैसे होली में गाय के गोबर से होलिका दहन, दीवाली में बिना पटाखों के उत्सव, और गणेश उत्सव में मिट्टी की मूर्तियों का उपयोग जैसे पर्यावरण-अनुकूल उपाय अपनाए गए हैं। इसी तरह, बकरीद पर भी पशु बलि के बजाय प्रतीकात्मक कुर्बानी को अपनाने की अपील की गई। तिवारी ने जोर देकर कहा कि पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी हिंदुओं, मुस्लिमों, सिखों और ईसाइयों—भारत माता के चार सैनिकों—की साझा है।

संगठन ने मुस्लिम धार्मिक नेताओं को पत्र लिखकर इस पहल का समर्थन करने की अपील की। तिवारी ने कहा, "हमने मुस्लिम धार्मिक गुरुओं को पत्र लिखा है, ताकि वे इस बारे में सकारात्मक संदेश दें। हमारा उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है, बल्कि एक पर्यावरण-अनुकूल समाज की दिशा में काम करना है।" उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि यदि पशु बलि के दौरान नियमों और कानूनों का उल्लंघन हुआ, तो संगठन कानूनी कार्रवाई करेगा।

  • विवाद और मुस्लिम समुदाय की प्रतिक्रिया

इस आयोजन को जहां कुछ लोगों ने पर्यावरण संरक्षण और पशु कल्याण की दिशा में एक सकारात्मक कदम माना, वहीं कुछ ने इसे धार्मिक भावनाओं के साथ छेड़छाड़ के रूप में देखा। जमीअत उलमा-ए-हिंद, उत्तर प्रदेश के कानूनी सलाहकार सैयद काब रशीदी ने इस पहल की कड़ी निंदा की। उन्होंने कहा, "ऐसी पहल केवल इस्लामी त्योहारों से पहले ही क्यों उभरती हैं? भारत मांस निर्यात से करोड़ों रुपये कमाता है, चमड़ा बेचता है, और दवाइयों में पशु हड्डियों का उपयोग होता है। तब कोई पर्यावरण की बात क्यों नहीं करता?" रशीदी ने इसे मुस्लिम समुदाय और इस्लाम के खिलाफ भ्रम फैलाने की कोशिश करार दिया।

महाराष्ट्र के मत्स्य और बंदरगाह विकास मंत्री नितेश राणे ने भी इस मुद्दे पर अपनी राय रखी। उन्होंने पशु अधिकार कार्यकर्ताओं और पर्यावरणविदों पर सवाल उठाते हुए कहा कि हिंदू त्योहारों जैसे होली और दीवाली पर पर्यावरण की चिंता जताने वाले बकरीद पर चुप क्यों रहते हैं। उन्होंने कहा, "भारत एक हिंदू राष्ट्र है। यदि संविधान हिंदुओं पर लागू होता है, तो यह मुस्लिमों पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए। शरिया कानून यहां लागू नहीं होगा।"

  • पशु बलि और पर्यावरण पर प्रभाव

बकरीद, जिसे ईद-उल-अढ़ा के रूप में भी जाना जाता है, पैगंबर इब्राहिम की भक्ति और बलिदान की याद में मनाया जाता है। इस्लामी परंपरा के अनुसार, कुरबानी एक सुन्नत प्रथा है, जिसमें आर्थिक रूप से सक्षम मुस्लिम परिवार एक बकरे, भेड़, या अन्य पशु की बलि देते हैं। कुरबानी का मांस तीन हिस्सों में बांटा जाता है—एक हिस्सा परिवार, एक हिस्सा रिश्तेदारों, और एक हिस्सा गरीबों के लिए। हालांकि, इस प्रथा पर पर्यावरण और पशु अधिकारों के दृष्टिकोण से सवाल उठाए गए हैं।

संस्कृति बचाओ मंच ने तर्क दिया कि पशु बलि के दौरान हजारों गैलन पानी खून साफ करने में बर्बाद होता है, और इससे पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। इसके अलावा, PETA इंडिया जैसे संगठनों ने भी बकरीद पर पशु बलि के खिलाफ अभियान चलाए हैं। PETA ने सुझाव दिया कि मुस्लिम समुदाय शाकाहारी विकल्प अपनाकर "क्रूरता-मुक्त" बकरीद मना सकता है। उदाहरण के लिए, 2024 में, PETA इंडिया के शाकाहारी मुस्लिम समर्थकों ने बचाए गए बकरों के साथ बकरीद मनाई और दान, स्वयंसेवा, और शाकाहारी भोजन के माध्यम से बलिदान का संदेश दिया।

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यह आयोजन धार्मिक और सामाजिक संवेदनशीलता के बीच एक जटिल संतुलन को दर्शाता है। एक ओर, संस्कृति बचाओ मंच का तर्क है कि पर्यावरण संरक्षण सभी धर्मों की साझा जिम्मेदारी है, और उनकी पहल का उद्देश्य किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। दूसरी ओर, कुछ मुस्लिम नेताओं का मानना है कि यह पहल उनकी धार्मिक प्रथाओं में हस्तक्षेप है और इसे भेदभावपूर्ण माना जा सकता है।

भारत में पशु बलि को लेकर कानूनी स्थिति भी जटिल है। पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 की धारा 28 के तहत, धार्मिक उद्देश्यों के लिए पशु बलि की अनुमति है। हालांकि, केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, और पुडुचेरी जैसे राज्यों में मंदिरों में पशु बलि पर प्रतिबंध है। बकरीद के संदर्भ में, कुरबानी को नियंत्रित और नैतिक तरीके से करने के लिए दिशानिर्देश हैं, जैसे कि तेज चाकू का उपयोग और पशुओं को कम से कम पीड़ा देना।

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