जज पर जमानत के लिए 1-1 करोड़ की रिश्वत मांगने का आरोप, HC ने किया ट्रांसफर, Rouse Avenue Court में रिश्वत कांड के बाद न्याय पर उठे सवाल
जस्टिस अमित महाजन की बेंच के समक्ष सुनवाई के दौरान, स्टेट के अतिरिक्त वकील ने बताया कि जनवरी 2025 में ही संबंधित सामग्री दिल्ली के कानून विभाग के प्रधान सचिव को भेज दी गई ...
दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट (Rouse Avenue Court) में एक सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसमें एक विशेष जज (PC एक्ट) पर 2023 में दर्ज एक जीएसटी से संबंधित मामले में जमानत देने के लिए रिश्वत मांगने का गंभीर आरोप लगा है। इस मामले ने न केवल न्यायिक व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठाए हैं, बल्कि यह भी दर्शाता है कि भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हो सकती हैं। दिल्ली हाईकोर्ट ने त्वरित कार्रवाई करते हुए इस जज का तबादला राउज एवेन्यू कोर्ट (Rouse Avenue Court) से नॉर्थ-वेस्ट, रोहिणी कोर्ट में कर दिया। इस घटना ने सामाजिक और न्यायिक हलकों में व्यापक चर्चा को जन्म दिया है, और लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि जब न्याय बिकने लगे, तो इंसाफ कहां से मिलेगा?
क्या है मामला?
यह पूरा मामला 2023 में दर्ज एक जीएसटी से संबंधित केस से जुड़ा है, जिसमें राउज एवेन्यू कोर्ट (Rouse Avenue Court) के विशेष जज के कोर्ट स्टाफ (अहलमद/रिकॉर्ड कीपर) पर रिश्वत मांगने का आरोप लगा। 29 जनवरी 2025 को दिल्ली सरकार की एंटी-करप्शन ब्रांच (ACB) ने इस संबंध में कानून, न्याय और विधायी मामलों के प्रधान सचिव को पत्र लिखकर जज और उनके अहलमद के खिलाफ जांच शुरू करने की अनुमति मांगी थी। इस पत्र में कोर्ट स्टाफ और जज के खिलाफ शिकायतों का जिक्र था, जिसमें रिश्वत मांगने से संबंधित ऑडियो रिकॉर्डिंग भी शामिल थी।
हालांकि, 14 फरवरी 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट ने ACB की जज के खिलाफ जांच शुरू करने की मांग को खारिज कर दिया, क्योंकि उनके पास जज के खिलाफ "पर्याप्त सबूत" नहीं थे। कोर्ट ने ACB को जांच जारी रखने और जज के खिलाफ कोई ठोस सबूत मिलने पर दोबारा आवेदन करने को कहा। इसके बाद, 16 मई 2025 को ACB ने कोर्ट के अहलमद के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत एक FIR दर्ज की। इस FIR में यह भी उल्लेख किया गया कि जज ने ACB के जॉइंट कमिश्नर को नोटिस जारी कर पूछा था कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए, क्योंकि जॉइंट कमिश्नर ने कथित तौर पर कोर्ट स्टाफ को धमकी दी थी।
20 मई 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट ने प्रशासनिक आदेश के तहत विशेष जज का तबादला राउज एवेन्यू कोर्ट (Rouse Avenue Court) से रोहिणी कोर्ट में कर दिया। इस तबादले को कई लोग भ्रष्टाचार के आरोपों से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि कुछ का मानना है कि यह केवल प्रशासनिक निर्णय है।
अहलमद का दावा: जज को फंसाने की साजिश
इस मामले में एक नया मोड़ तब आया, जब अहलमद ने राउज एवेन्यू कोर्ट (Rouse Avenue Court) में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन दायर किया। अहलमद ने दावा किया कि ACB ने जज के साथ "पुराने स्कोर सेटल करने" के लिए उसे झूठे रिश्वत मामले में फंसाया है। उसने विशेष जज दीपाली शर्मा के समक्ष दायर अपने आवेदन में कहा कि वह निर्दोष है और उसे बदनाम करने के लिए यह FIR दर्ज की गई। अहलमद ने यह भी कहा कि जज द्वारा ACB के जॉइंट कमिश्नर को अवमानना नोटिस जारी करने के बाद यह कार्रवाई की गई। उसने हाईकोर्ट से मांग की कि इस मामले की जांच एंटी-करप्शन ब्रांच से लेकर सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (CBI) को सौंपी जाए, ताकि निष्पक्ष जांच हो सके।
हाईकोर्ट की भूमिका
20 मई 2025 को जस्टिस अमित महाजन की बेंच के समक्ष सुनवाई के दौरान, स्टेट के अतिरिक्त वकील ने बताया कि जनवरी 2025 में ही संबंधित सामग्री दिल्ली के कानून विभाग के प्रधान सचिव को भेज दी गई थी, जिसे रजिस्ट्रार जनरल के माध्यम से हाईकोर्ट की प्रशासनिक समिति के सामने रखा गया। वकील ने यह भी कहा कि FIR में लगाए गए आरोपों को सही ठहराने के लिए पर्याप्त सामग्री मौजूद है, जिसकी जांच जरूरी है। दूसरी ओर, याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील मोहित माथुर ने तर्क दिया कि यह FIR 16 मई 2025 को जज द्वारा अवमानना नोटिस जारी करने के बाद दर्ज की गई, जो संदेह पैदा करता है।
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हाईकोर्ट ने इस मामले में त्वरित कार्रवाई करते हुए जज का तबादला कर दिया, लेकिन इस तबादले को सजा के रूप में देखने के बजाय कई लोग इसे केवल प्रशासनिक कदम मान रहे हैं। इस घटना ने न्यायिक स्वतंत्रता और भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती को उजागर किया है।
इस घटना ने न केवल राउज एवेन्यू कोर्ट (Rouse Avenue Court), बल्कि पूरे देश की न्यायिक व्यवस्था पर सवाल उठाए हैं। सोशल मीडिया पर इस मामले को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। एक यूजर ने लिखा, “जज ने 1-1 करोड़ की रिश्वत मांगी, और हाईकोर्ट ने सिर्फ तबादला कर दिया? यह तो सजा नहीं, बल्कि पोस्टिंग बदलने जैसा है।” दूसरी ओर, कुछ लोगों का मानना है कि बिना ठोस सबूत के जज पर कार्रवाई करना उचित नहीं होगा, क्योंकि इससे न्यायिक स्वतंत्रता पर आघात हो सकता है।
यह मामला न्यायिक प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत को रेखांकित करता है। भ्रष्टाचार के आरोप, चाहे वे सिद्ध हों या न हों, न केवल न्यायिक संस्थानों की विश्वसनीयता को प्रभावित करते हैं, बल्कि आम लोगों के विश्वास को भी कम करते हैं। इस घटना ने यह भी सवाल उठाया है कि क्या कोर्ट स्टाफ और जजों के बीच जवाबदेही का अभाव भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है।
दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट (Rouse Avenue Court) के एक विशेष जज पर 2023 के जीएसटी मामले में जमानत के लिए रिश्वत मांगने का आरोप लगा है। दिल्ली हाईकोर्ट ने 20 मई 2025 को जज का तबादला रोहिणी कोर्ट में कर दिया। यह मामला न्यायिक प्रणाली की पारदर्शिता पर सवाल उठाता है।
- आरोप: विशेष जज और उनके अहलमद पर जीएसटी मामले में रिश्वत मांगने का आरोप।
- ACB की कार्रवाई: 29 जनवरी 2025 को जांच की अनुमति मांगी, 16 मई 2025 को अहलमद के खिलाफ FIR दर्ज।
- हाईकोर्ट का फैसला: 14 फरवरी 2025 को जज के खिलाफ जांच खारिज, 20 मई को तबादला।
अहलमद का दावा
- अहलमद ने दावा किया कि ACB ने जज को फंसाने के लिए उसे झूठे मामले में फंसाया।
- अग्रिम जमानत याचिका में CBI जांच की मांग।
इस मामले की जांच अभी जारी है। ACB को जज के खिलाफ ठोस सबूत जुटाने की जिम्मेदारी दी गई है, जबकि अहलमद की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई हो रही है। हाईकोर्ट ने इस मामले में निष्पक्षता बनाए रखने की कोशिश की है।
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