नौकरी छोड़ गांव लौटे, चीकू पर प्रयोग कर बन गए करोड़पति, महिलाओं को रोजगार देकर गांव में क्रांति लाई।

महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव से ताल्लुक रखने वाले महेश चूरी ने अपनी कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर गांव वापसी का फैसला किया, जो आज करोड़पति

By INA News Desk
Mar 13, 2026 - 16:32
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नौकरी छोड़ गांव लौटे, चीकू पर प्रयोग कर बन गए करोड़पति, महिलाओं को रोजगार देकर गांव में क्रांति लाई।
नौकरी छोड़ गांव लौटे, चीकू पर प्रयोग कर बन गए करोड़पति, महिलाओं को रोजगार देकर गांव में क्रांति लाई।
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  • महेश चूरी ने छोड़ी कॉर्पोरेट जिंदगी, शुरू किया 'चीकू पार्लर' बिजनेस, अब टर्नओवर करोड़ों में

महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव से ताल्लुक रखने वाले महेश चूरी ने अपनी कॉर्पोरेट नौकरी छोड़कर गांव वापसी का फैसला किया, जो आज करोड़पति बनने की प्रेरक कहानी बन चुका है। महेश ने शहर की भागदौड़ भरी जिंदगी और अच्छी सैलरी वाली जॉब को अलविदा कहकर अपने पैतृक गांव में लौट आए, जहां उन्होंने चीकू की खेती और प्रोसेसिंग पर फोकस किया। शुरू में उन्होंने पारंपरिक तरीके से चीकू उगाने की बजाय कुछ अलग प्रयोग शुरू किए, जैसे चीकू को विभिन्न फ्लेवर्स में प्रोसेस करके 'चीकू पार्लर' नाम से ब्रांडेड उत्पाद बनाना। यह उत्पाद चीकू से बने जूस, शेक, आइसक्रीम, कैंडी और अन्य वैल्यू एडेड आइटम्स शामिल हैं, जो बाजार में तेजी से लोकप्रिय हुए। उनकी इस पहल ने न केवल उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाया बल्कि स्थानीय महिलाओं को भी रोजगार प्रदान किया, जिससे गांव की अर्थव्यवस्था में सुधार आया। महेश की कहानी दिखाती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी इनोवेटिव बिजनेस से बड़ी सफलता हासिल की जा सकती है।

महेश चूरी की शुरुआत काफी चुनौतीपूर्ण रही, क्योंकि गांव में चीकू की खेती तो होती थी लेकिन उसका वैल्यू एडिशन और मार्केटिंग का कोई सिस्टम नहीं था। उन्होंने सबसे पहले चीकू की क्वालिटी सुधारने पर ध्यान दिया, आधुनिक सिंचाई और ऑर्गेनिक तरीकों को अपनाया। फिर उन्होंने छोटे स्तर पर चीकू को प्रोसेस करके लोकल मार्केट में बेचना शुरू किया। धीरे-धीरे उन्होंने 'चीकू पार्लर' की दुकानें खोलीं, जहां ग्राहक चीकू आधारित ताजा और पैकेज्ड प्रोडक्ट्स खरीद सकते थे। इस बिजनेस मॉडल ने उन्हें अलग पहचान दी, क्योंकि बाजार में चीकू मुख्य रूप से ताजा फल के रूप में उपलब्ध था, लेकिन वैल्यू एडेड प्रोडक्ट्स की कमी थी। महेश ने महिलाओं को ट्रेनिंग देकर प्रोडक्शन में शामिल किया, जिससे घरेलू स्तर पर रोजगार बढ़ा। आज उनके बिजनेस में दर्जनों महिलाएं काम करती हैं, जो परिवार की आय बढ़ाने में मदद कर रही हैं।

बिजनेस को स्केल करने के लिए महेश ने ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स और लोकल डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क का सहारा लिया। उन्होंने चीकू पार्लर को ब्रांडेड बनाया, पैकेजिंग पर फोकस किया और क्वालिटी कंट्रोल सुनिश्चित किया। शुरूआती निवेश कम था लेकिन लगातार प्रयोग और कस्टमर फीडबैक से प्रोडक्ट्स में सुधार हुआ। अब उनका टर्नओवर करोड़ों में पहुंच चुका है, और वे कई राज्यों में सप्लाई कर रहे हैं। यह सफलता महज किस्मत नहीं बल्कि मेहनत, इनोवेशन और बाजार समझ का नतीजा है। महेश ने साबित किया कि गांव में रहकर भी बड़े स्तर का बिजनेस चलाया जा सकता है, बशर्ते सही दिशा और लगन हो। उनकी कहानी युवाओं को प्रेरित करती है कि नौकरी छोड़कर भी आत्मनिर्भर बनना संभव है।

महेश की इस यात्रा में महिलाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने गांव की महिलाओं को स्किल ट्रेनिंग दी, जिससे वे घर बैठे प्रोडक्शन में योगदान दे सकीं। चीकू पार्लर के माध्यम से महिलाओं को नियमित आय मिल रही है, जो परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही है। यह बिजनेस मॉडल सामाजिक प्रभाव भी डाल रहा है, क्योंकि महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता बढ़ने से गांव में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में सुधार आ रहा है। महेश ने स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके सस्टेनेबल बिजनेस मॉडल बनाया, जो पर्यावरण के अनुकूल भी है। चीकू की खेती पानी की कम जरूरत वाली फसल है, और वैल्यू एडिशन से वेस्टेज कम होता है।

आज महेश चूरी न केवल करोड़पति हैं बल्कि एक सफल उद्यमी के रूप में जाने जाते हैं। उनका बिजनेस लगातार बढ़ रहा है, और वे नए प्रोडक्ट्स लॉन्च कर रहे हैं। गांव में उनकी सफलता से अन्य युवा भी प्रेरित हो रहे हैं, कई ने छोटे स्तर पर वैल्यू एडेड फार्मिंग शुरू की है। महेश अक्सर गांव के युवाओं को मार्गदर्शन देते हैं कि कैसे पारंपरिक खेती को आधुनिक बिजनेस में बदला जा सकता है। उनकी कहानी बताती है कि शहर की चमक-दमक के पीछे भागने की बजाय जड़ों से जुड़कर भी सफलता पाई जा सकती है।

यह सफलता महेश के फैसले की ताकत दिखाती है, जब उन्होंने नौकरी छोड़कर कुछ अलग करने का जोखिम लिया। शुरू में परिवार और समाज से विरोध हुआ लेकिन लगातार मेहनत से सब कुछ बदल गया। अब वे गांव में रहकर बड़े पैमाने पर बिजनेस चला रहे हैं और कई परिवारों की जिंदगी सुधार रहे हैं। महेश की कहानी आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार करती है, जहां ग्रामीण क्षेत्रों से भी बड़े उद्यम उभर सकते हैं।

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