Lucknow : 2027 में बसपा क्या सत्ता का खेल बदल पाएगी? राजनीतिक जानकारों की राय में रणनीति बदलनी होगी

बसपा अब सिर्फ बाहर की चुनौतियों से नहीं लड़ रही बल्कि अंदरूनी कलह भी उसे कमजोर कर रही है। मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को बसपा का उत्तराधिकारी बनाया था। उन्हें युवा चे

Jan 15, 2026 - 22:03
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Lucknow : 2027 में बसपा क्या सत्ता का खेल बदल पाएगी? राजनीतिक जानकारों की राय में रणनीति बदलनी होगी
Lucknow : 2027 में बसपा क्या सत्ता का खेल बदल पाएगी? राजनीतिक जानकारों की राय में रणनीति बदलनी होगी

बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने अपने जन्मदिन पर प्रेस कॉन्फ्रेंस में विरोधी दलों पर हमला किया और 2027 विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी की योजना स्पष्ट की। उन्होंने ब्राह्मण समाज की स्थिति पर चिंता जताई और दावा किया कि भाजपा, सपा और कांग्रेस से जुड़े ब्राह्मण नेताओं ने उनसे मिलकर अपनी उपेक्षा का दर्द बताया है। मायावती ने कहा कि बसपा ने हमेशा ब्राह्मण समाज को सम्मान और प्रतिनिधित्व दिया है। उन्होंने 2007 के समय को याद किया जब दलित और ब्राह्मण की सामाजिक इंजीनियरिंग से बसपा ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि बसपा सरकार में हर जाति और धर्म का ख्याल रखा जाएगा। साथ ही क्षत्रिय और जाट समाज का भी पूरा ध्यान रखा जाएगा।

चुनावी योजना पर बात करते हुए मायावती ने गठबंधन की संभावना को पूरी तरह नकार दिया। उन्होंने कहा कि बसपा सभी चुनाव अकेले लड़ेगी क्योंकि गठबंधन से हमेशा नुकसान हुआ है। उन्होंने कार्यकर्ताओं से अपील की कि विरोधियों के दांव का जवाब दें और उत्तर प्रदेश में पांचवीं बार बसपा सरकार बनाने का संकल्प लें। उन्होंने दावा किया कि बसपा पूर्ण बहुमत से सरकार बनाएगी। उन्होंने भाजपा, कांग्रेस और सपा को दलितों तथा पिछड़ों का धोखेबाज बताया और बसपा को एकमात्र विकल्प कहा।

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान शॉर्ट सर्किट से धुआं फैल गया लेकिन सुरक्षाकर्मियों ने स्थिति संभाल ली। मायावती ने उत्तर प्रदेश में मेट्रो, जेवर हवाई अड्डा और एक्सप्रेसवे जैसे बड़े कामों की योजना अपनी सरकार में बनी बताई। उन्होंने अपनी नीली किताब का 21वां संस्करण भी जारी किया जो बसपा आंदोलन की यात्रा पर आधारित है।

हालांकि बसपा की जमीनी पकड़ कमजोर दिख रही है और जनता में पुराने शासन की यादें हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बसपा अब मुख्य रूप से लखनऊ केंद्रित हो गई है। चुनाव नजदीक आने पर मायावती बैठकें तेज करती हैं और कार्यकर्ताओं को गांवों में प्रचार करने के निर्देश देती हैं लेकिन जमीन पर सक्रिय कार्यकर्ता कम बचे हैं। 2022 के बाद बसपा के अधिकतर कार्यकर्ता या तो निष्क्रिय हो गए या अन्य दलों में चले गए। जानकारों का मानना है कि अगर बसपा 2027 में वापसी चाहती है तो गांवों में जाकर लोगों से जुड़ना होगा अन्यथा पार्टी का उद्धार मुश्किल है। बुंदेलखंड में पार्टी की स्थिति इतनी कमजोर है कि 2022 में एक भी सीट नहीं मिली जबकि भाजपा ने सभी सीटें जीतीं। अगर रणनीति नहीं बदली तो 2027 में हालत और खराब हो सकती है।

मायावती का एक्स पर भाजपा, कांग्रेस और सपा पर हमला अब मुख्य योजना बन गया है लेकिन यूपी जैसे बड़े राज्य में चुनाव सिर्फ पोस्ट से नहीं जीते जाते। जनता चाहती है कि नेता उनके बीच आएं, समस्याएं सुनें और हल करें। भाजपा के कई नेता लगातार लोगों के बीच रहते हैं। सपा के अखिलेश यादव भी इलाकों का दौरा करते रहते हैं लेकिन मायावती चुनाव के समय भी बड़ी सभाओं से दूर रहती हैं। इससे लोग मान रहे हैं कि बसपा अब सिर्फ बयान देने वाली पार्टी बन गई है।

मायावती का ओम प्रकाश राजभर, संजय निषाद, अनुप्रिया पटेल और चंद्रशेखर आजाद पर दलित-पिछड़ों को बांटने का आरोप सही है। भाजपा ने जातीय दलों को साथ लेकर ओबीसी-दलित वोटों में सेंध लगाई। 2022 में बसपा को सिर्फ 12.88 प्रतिशत वोट मिले जबकि भाजपा को 41.29 प्रतिशत और सपा को 32.06 प्रतिशत। यह दिखाता है कि बसपा का पुराना दलित-पिछड़ा समीकरण टूट गया है। आरोप सही होने पर भी बसपा खुद अपने वोट बैंक को बनाए रखने में असफल रही है।

मायावती का कांग्रेस और सपा को मुस्लिम विरोधी बताना मुस्लिम वोटरों को अपनी ओर खींचने का संकेत है। 2022 में मुसलमानों ने सपा को खूब वोट दिए जिससे सपा को 111 सीटें मिलीं जबकि बसपा सिर्फ एक सीट जीत सकी। यह बताता है कि मुस्लिम वोट बैंक मायावती को पहले ही छोड़ चुका है। अब मुस्लिम वोटरों को साधना आसान नहीं है।

बसपा अब सिर्फ बाहर की चुनौतियों से नहीं लड़ रही बल्कि अंदरूनी कलह भी उसे कमजोर कर रही है। मायावती ने अपने भतीजे आकाश आनंद को बसपा का उत्तराधिकारी बनाया था। उन्हें युवा चेहरा बनाकर पार्टी को मजबूत करने की कोशिश की गई लेकिन पिछले साल में दो बार उन्हें हटाया गया। अब सवाल है कि अगर आकाश बसपा का भविष्य नहीं हैं तो पार्टी का वारिस कौन होगा। मायावती के बाद बसपा का नेतृत्व किसके हाथ आएगा या पार्टी बिना स्पष्ट उत्तराधिकारी के संघर्ष करती रहेगी। यह नेतृत्व संकट बसपा के लिए बड़ा खतरा है क्योंकि मजबूत चेहरे के बिना 2027 में पकड़ और कमजोर हो सकती है।

मायावती का 2027 में सत्ता वापसी का दावा असलियत से दूर लगता है। बसपा की मौजूदा स्थिति से लगता है कि सिर्फ बयान और आरोपों से जनता का विश्वास नहीं जीता जा सकता। मायावती को अपनी योजना पूरी तरह बदलनी होगी। उन्हें 2007 की तरह जमीन पर उतरना होगा और गांवों में जाकर लोगों से मिलना होगा। बसपा को नए ऊर्जावान और लड़ाकू नेताओं को आगे लाना होगा अन्यथा 2027 में भी हाल 2022 जैसा रहेगा सिर्फ एक सीट। सवाल है कि क्या मायावती अब वैसी मेहनत करेंगी जो 2007 में की थी। क्या वे एक्स छोड़कर गांवों और गलियों में संघर्ष करने को तैयार होंगी या बसपा सिर्फ पोस्ट करती रह जाएगी और जनता उसे नकार देगी।

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