असम चुनाव से पहले सरमा कैबिनेट में बड़ी बगावत, मंत्री नंदिता गरलोसा ने छोड़ी बीजेपी, कांग्रेस में शामिल
नंदिता गरलोसा के कांग्रेस में शामिल होने के बाद पार्टी ने एक कड़ा आधिकारिक बयान जारी किया है। कांग्रेस ने कहा कि गरलोसा पिछले पांच वर्षों से दीमा हसाओ की बुलंद आवाज रही हैं और उन्होंने हमेशा अपने सिद्धांतों के साथ समझौता किए बिना काम किया है। पार्टी ने बीजेपी नेतृत्व
- टिकट कटने से नाराज नंदिता गरलोसा अब हाफलोंग से लड़ेंगी कांग्रेस का चुनाव, निर्मल लंगथासा ने छोड़ी अपनी दावेदारी
- आदिवासियों की आवाज दबाने का आरोप: कांग्रेस ने गरलोसा का किया स्वागत, जमीन सौदों पर घेरी बीजेपी सरकार
असम में विधानसभा चुनाव की सरगर्मियां तेज होते ही पाला बदलने का खेल शुरू हो गया है। इस कड़ी में सबसे बड़ा झटका बीजेपी को तब लगा जब उसकी मौजूदा कैबिनेट मंत्री नंदिता गरलोसा ने पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। गरलोसा पिछले पांच वर्षों से दीमा हसाओ जिले के हाफलोंग निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रही थीं। वर्ष 2021 के चुनाव में बीजेपी के टिकट पर बड़ी जीत हासिल करने के बाद उन्हें सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं। हालांकि, 2026 के चुनाव के लिए जारी की गई बीजेपी की पहली सूची में जब उनका नाम गायब मिला और उनकी जगह एक नए चेहरे, रुपाली लांगथासा को उम्मीदवार बनाया गया, तो गरलोसा का धैर्य जवाब दे गया। उन्होंने इसे स्थानीय जनता और अपने काम का अपमान करार देते हुए पाला बदलने का निर्णय लिया।
कांग्रेस ने इस राजनीतिक अवसर का लाभ उठाते हुए तत्काल नंदिता गरलोसा को पार्टी में शामिल किया और उन्हें हाफलोंग सीट से अपना आधिकारिक उम्मीदवार घोषित कर दिया। दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस ने इस सीट के लिए पहले ही अपने प्रदेश महासचिव निर्मल लंगथासा के नाम का ऐलान कर दिया था। लेकिन जैसे ही गरलोसा के कांग्रेस में आने की खबर पक्की हुई, निर्मल लंगथासा ने स्वेच्छा से अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली। पार्टी के भीतर इस तालमेल को 'व्यापक जनहित' में लिया गया फैसला बताया जा रहा है। कांग्रेस का मानना है कि गरलोसा के आने से दीमा हसाओ और आसपास के पहाड़ी जिलों में पार्टी की स्थिति काफी मजबूत होगी, क्योंकि वह इस क्षेत्र की एक प्रभावशाली आदिवासी नेता मानी जाती हैं।
नंदिता गरलोसा के कांग्रेस में शामिल होने के बाद पार्टी ने एक कड़ा आधिकारिक बयान जारी किया है। कांग्रेस ने कहा कि गरलोसा पिछले पांच वर्षों से दीमा हसाओ की बुलंद आवाज रही हैं और उन्होंने हमेशा अपने सिद्धांतों के साथ समझौता किए बिना काम किया है। पार्टी ने बीजेपी नेतृत्व पर सीधा हमला करते हुए कहा कि गरलोसा को उनकी निष्ठा और आदिवासियों के अधिकारों के लिए खड़े होने की कीमत चुकानी पड़ी है। आरोप लगाया गया है कि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली सरकार का ध्यान जन कल्याण के बजाय आदिवासियों की बेशकीमती जमीनें बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों को सौंपने पर अधिक केंद्रित है। कांग्रेस ने गरलोसा के पक्ष में माहौल बनाते हुए कहा कि वह एक ऐसी नेता हैं जो सत्ता के लालच में अपनी जड़ों को नहीं भूलतीं। नंदिता गरलोसा का राजनीतिक सफर काफी प्रभावशाली रहा है। 13 मई 1977 को हाफलोंग में जन्मी गरलोसा ने एम.एससी (प्राणीशास्त्र) तक शिक्षा प्राप्त की है। 2021 में पहली बार विधायक बनने के बाद उन्हें बिजली, सहकारिता, खान और खनिज जैसे भारी-भरकम विभागों के साथ-साथ 'स्वदेशी और जनजातीय विश्वास व संस्कृति' विभाग की जिम्मेदारी भी दी गई थी। उनका अचानक पार्टी छोड़ना बीजेपी के लिए पहाड़ी क्षेत्रों में एक बड़ा रणनीतिक नुकसान माना जा रहा है।
राजनीतिक गलियारों में इस बात की भी चर्चा है कि बीजेपी ने इस बार कई मौजूदा विधायकों के टिकट काटे हैं, जिसके पीछे पार्टी का उद्देश्य 'एंटी-इंकम्बेंसी' को कम करना और नए चेहरों को मौका देना है। हालांकि, नंदिता गरलोसा के मामले में यह दांव उल्टा पड़ता दिखाई दे रहा है। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने रविवार को खुद गरलोसा के आवास पर जाकर उनसे मुलाकात की थी और उन्हें मनाने की कोशिश की थी। लेकिन नामांकन की समय सीमा नजदीक होने और पार्टी द्वारा टिकट देने से साफ इनकार करने के बाद, यह बैठक बेनतीजा रही। मुख्यमंत्री ने बाद में अपनी प्रतिक्रिया में हैरानी जताते हुए कहा कि उन्हें उम्मीद नहीं थी कि एक कैबिनेट मंत्री इस तरह अंतिम समय में विपक्षी खेमे में चली जाएंगी।
हाफलोंग विधानसभा सीट अब असम चुनाव की सबसे 'हॉट सीट' बन गई है। यहाँ अब बीजेपी की रुपाली लांगथासा और कांग्रेस की नंदिता गरलोसा के बीच सीधा मुकाबला होगा। स्थानीय विश्लेषकों का मानना है कि गरलोसा के पास अपना एक मजबूत व्यक्तिगत वोट बैंक है, जो पार्टी के बजाय उनके व्यक्तित्व और पिछले पांच वर्षों में किए गए विकास कार्यों से जुड़ा है। विशेष रूप से जनजातीय समुदायों के बीच उनकी पकड़ बीजेपी के लिए चिंता का सबब बन सकती है। वहीं कांग्रेस इस मौके को 'आदिवासी स्वाभिमान' से जोड़कर पेश कर रही है। पार्टी का दावा है कि बीजेपी के भीतर आदिवासी नेताओं को केवल रबर स्टैंप की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है और जो आवाज उठाता है, उसे किनारे लगा दिया जाता है।
दीमा हसाओ जिले की राजनीति में यह फेरबदल आने वाले दिनों में अन्य निर्वाचन क्षेत्रों पर भी असर डाल सकता है। नंदिता गरलोसा के समर्थकों ने कई स्थानों पर बीजेपी के झंडे उतारकर कांग्रेस का हाथ थाम लिया है। यह स्थिति तब पैदा हुई है जब असम में एक ही चरण में 9 अप्रैल को सभी 126 सीटों पर मतदान होना है। समय की कमी को देखते हुए बीजेपी के पास डैमेज कंट्रोल के लिए बहुत कम अवसर बचे हैं। दूसरी तरफ, कांग्रेस ने गरलोसा को चुनावी मैदान में उतारकर यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह बीजेपी के असंतुष्ट लेकिन कद्दावर नेताओं के लिए एक विश्वसनीय विकल्प है। इस दलबदल ने असम के चुनावी मुकाबले को और भी रोमांचक और अनिश्चित बना दिया है।
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