Deoband: बिना महरम हज पर जाने वाली महिलाओं के सफ़र पर मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा का एतराज़, शरई पहलू पर उठाए सवाल। 

जमीयत दावतुल मुस्लिमीन के संरक्षक और देवबंद के जाने माने मशहूर देवबंदी उलेमा मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा ने बिना महरम

Apr 24, 2026 - 14:40
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Deoband: बिना महरम हज पर जाने वाली महिलाओं के सफ़र पर मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा का एतराज़, शरई पहलू पर उठाए सवाल। 
बिना महरम हज पर जाने वाली महिलाओं के सफ़र पर मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा का एतराज़, शरई पहलू पर उठाए सवाल। 

देवबंद: जमीयत दावतुल मुस्लिमीन के संरक्षक और देवबंद के जाने माने मशहूर देवबंदी उलेमा मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा ने बिना महरम के हज पर जाने वाली महिलाओं के सफ़र पर एतराज़ जताया है।

शुक्रवार को जारी एक वीडियो बयान में उन्होंने कहा कि “हज 2026 का सफ़र शुरू हो चुका है और बड़ी तादाद में हाजी साहिबान मुक़द्दस सरज़मीन पर पहुँच भी चुके हैं। लेकिन इस साल, पिछले कई सालों की तरह, यह बात सामने आ रही है कि काफ़ी संख्या में महिलाएँ बिना महरम के हज के लिए रवाना हो रही हैं। ऐसे में यह सवाल पैदा होता है कि जब यह सफ़र शरीयत के अहकाम के ख़िलाफ़ हो, तो इस हज की क़ुबूलियत किस तरह मुमकिन होगी, जबकि शरीयत महिलाओं को बिना महरम के सफ़र से रोकती है।”

उन्होंने अपने बयान में आगे कहा कि हज जैसी अज़ीम इबादत के लिए रवाना होने से पहले हर मुसलमान को, ख़ासकर महिलाओं को, शरीयत की हिदायतों को समझना बेहद ज़रूरी है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या हज पर जाने वाली महिलाओं ने इस अहम मसले में किसी मुफ़्ती या आलिम-ए-दीन से रहनुमाई हासिल की है? क्या उन्होंने अपने सफ़र के शरई पहलू पर ग़ौर किया है?

मौलाना क़ारी इसहाक़ गोरा ने इस बात पर ज़ोर दिया कि इस्लाम में इबादत सिर्फ़ नीयत का नाम नहीं, बल्कि सही तरीक़े से अदा करना भी उतना ही अहम है। अगर कोई अमल शरीयत के दायरे से बाहर हो जाए, तो उसकी क़ुबूलियत पर सवाल खड़े हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि आज के दौर में सहूलतों और इंतज़ामात के बावजूद, शरीयत के उसूलों को नज़रअंदाज़ करना किसी भी सूरत में सही नहीं ठहराया जा सकता।

उन्होंने मुसलमानों को नसीहत करते हुए कहा कि जज़्बात में आकर या समाजी रुझान देखकर फ़ैसले लेने के बजाय, इल्म और दीन की रोशनी में कदम उठाना चाहिए। हज जैसे फ़र्ज़ की अदायगी के लिए यह और भी ज़रूरी हो जाता है कि हर अमल शरई उसूलों के मुताबिक़ हो, ताकि इबादत न सिर्फ़ अदा हो, बल्कि अल्लाह की बारगाह में मक़बूल भी हो। अंत में उन्होंने तमाम हाजियों के लिए दुआ की कि अल्लाह तआला उनके सफ़र को आसान बनाए, उनकी इबादतों को क़ुबूल फ़रमाए और उन्हें सही समझ और अमल की तौफ़ीक़ अता करे।

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