सम्भल के इस गांव में कई पीढ़ियों से नहीं मनाते रक्षाबंधन, परंपरा टूटी तो जमीदारी गई – अलीगढ़ के गांव की अनोखी कहानी सम्भल को करती है प्रभावित।

Sambhal : देशभर में भाई-बहन के पवित्र प्रेम का पर्व रक्षाबंधन धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन सम्भल के एक गांव में यह त्योहार बीते कई पीढ़ियों से नहीं ....

Aug 6, 2025 - 17:46
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सम्भल के इस गांव में कई पीढ़ियों से नहीं मनाते रक्षाबंधन, परंपरा टूटी तो जमीदारी गई – अलीगढ़ के गांव की अनोखी कहानी सम्भल को करती है प्रभावित।
सम्भल के इस गांव में कई पीढ़ियों से नहीं मनाते रक्षाबंधन, परंपरा टूटी तो जमीदारी गई – अलीगढ़ के गांव की अनोखी कहानी सम्भल को करती है प्रभावित।

उवैस दानिश, सम्भल 

देशभर में भाई-बहन के पवित्र प्रेम का पर्व रक्षाबंधन धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन सम्भल के एक गांव में यह त्योहार बीते कई पीढ़ियों से नहीं मनाया जा रहा है। यहां यादव परिवार ने रक्षाबंधन मनाना पूरी तरह से त्याग दिया है। इस परंपरा के पीछे छिपी कहानी भावनाओं और सामाजिक मर्यादाओं से जुड़ी हुई है, जो आज भी लोगों के लिए चर्चा का विषय बनी हुई है।

यह मामला अलीगढ़ के एक गांव का है, जहां यादव और ठाकुर परिवारों के बीच रिश्तों की मिसाल मानी जाती थी। दोनों परिवारों की बेटियां एक-दूसरे के भाइयों को राखी बांधती थीं और त्योहार प्रेमपूर्वक मनाया जाता था। लेकिन एक बार इस प्रेम-भरे त्योहार पर विवाद की चिंगारी भड़क उठी। कहा जाता है कि रक्षाबंधन के दिन यादव परिवार की लड़की ने अपने ठाकुर 'राखी भाई' से एक घोड़ी की मांग कर दी। इसके जवाब में ठाकुर परिवार की लड़की ने यादव के यहां राखी बांधते हुए पूरी जमींदारी मांग ली। मर्यादा निभाने के लिए यादव परिवार को अपनी पुश्तैनी जमींदारी देनी पड़ी और उन्हें गांव छोड़कर सम्भल जिले के बेनीपुर चक गांव में बसना पड़ा। इस घटना के बाद यादव परिवार में रक्षाबंधन मनाने की परंपरा समाप्त हो गई। वर्षों बीत गए, लेकिन जमींदारी गंवाने का यह घाव आज भी ताजा है।

अब यह परंपरा तीसरी पीढ़ी तक आ चुकी है। इस परिवार की नई बहुएं भी इस त्योहार से दूरी बनाए रखती हैं और बच्चों को भी इसकी जानकारी देकर परंपरा निभा रही हैं। गांव के बुजुर्गों का मानना है कि यह घटना भले ही पुरानी हो, लेकिन इससे जुड़े आत्मसम्मान और संस्कार आज भी जीवित हैं। रक्षाबंधन जैसे पावन पर्व को त्याग देना कोई आसान बात नहीं, लेकिन यादव परिवार की यह अनोखी परंपरा आज भी लोगों को सोचने पर मजबूर करती है।

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